10 मई 2020 - 10:41
इराक़ के नए प्रधान मंत्री, जिनका स्वागत ईरान और अमरीका तथा दोस्तों और दुश्मनों दोनों ने किया है

इराक़ में कई महीनों के राजनीतिक संकट के बाद अल-मुस्तफ़ा अल-काज़मी नई सरकार के गठन में सफल हो गए हैं। यहां ख़ास बात यह है कि इराक़ की नई सरकार का देश में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धुर विरोधी शक्तियों ने स्वागत किया है और अपना समर्थन दिया है।

निश्चित रूप से इस घटनाक्रम से इराक़ में राजनीतिक दलों को अपने गहरे मतभेदों को कम करने में मदद मिलेगी। इसका क्षेत्र की शांति व स्थितरता पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा।

दूसरी ओर, ईरान और अमरीका दोनों ने ही अल-काज़मी की सरकार का समर्थन किया है, जो राजनीतिक विश्लेषकों को आश्चर्य में डालने वाली बात है।

अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने अल-काज़मी को फ़ोन करके न केवल उनकी सरकार के प्रति व्हाइट हाउस का समर्थन जताया, बल्कि ईरान से बिजली और गैस आयात के लिए इराक़ को दी गई छूट में चार महीने की और वृद्धि का एलान कर दिया।

ईरानी विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने भी सरकार के गठन पर इराक़ के नए प्रधान मंत्री और इस देश की जनता को मुबारकबाद पेश की।

ज़रीफ़ का कहना था कि ईरान हमेशा इराक़ी जनता और इस देश की चुनी हुई सरकार का समर्थन करता रहेगा।

पिछले साल नवम्बर में इराक़ के पूर्व प्रधान मंत्री आदिल अब्दुल मेहदी ने देश में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हिंसक प्रदर्शनों के बाद अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। उसके बाद राष्ट्रपति बरहम सालेह ने एक के बाद एक तीन नेताओं को प्रधान मंत्री पद के लिए नामित किया, लेकिन वे राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल करने में नाकाम रहे और सरकार का गठन नहीं कर सके।

इराक़ में अमरीका के अपने हित हैं, जिन्हें सुरक्षित रखने के लिए वह हर हाल में इस देश में अपनी सैन्य उपस्थिति को सुनिश्चित करना चाहता है। हालांकि 3 जनवरी को बग़दाद एयरपोर्ट के निकट अमरीकी ड्रोन हमले में आईआरजीसी की क़ुद्स ब्रिगेड के लोकप्रिय कमांडर जनरल क़ासिम सुलेमानी और इराक़ी स्वयं सेवी बलों के डिप्टी कमांडर अल-मोंहदिस की मौत के बाद संसद से सड़कों तक देश से अमरीकी सैनिकों को बाहर निकालने की मांग ने ज़ोर पकड़ लिया।

इस घटना के बाद से इराक़ में अमरीकी सैनिकों पर हमलों में वृद्धि हो गई है और पेंटागन पर काफ़ी दबाव बढ़ गया है। एक दिन पहले ही बग़दाद के इमामे जुमा आयतुल्लाह मूसवी ने चेतावनी दी है कि अगर अमरीकी इराक़ से नहीं निकलते हैं तो उन्हें ज़बरदस्ती निकाल फेंका जाएगा।

ऐसी स्थिति में अनगिनत घरेलू समस्याओं के अलावा इराक़ की नई सरकार पर अमरीकी सैनिकों के देश में बने रहने या उन्हें बाहर निकालने का मुद्दा एक बड़ी चुनौती होगा।

3 जनवरी की घटना के बाद, 8 जनवरी को ईरान ने इराक़ स्थित अमरीकी सैन्य अड्डे अल-असद पर मिसाइल बरसाए थे और कहा था कि वह अमरीकी सैनिकों को इराक़ और क्षेत्र से बाहर निकालकर दम लेगा।

अब देखना यह है कि अल-काज़मी इराक़ी जनता की मांग और अमरीकी वर्चस्ववाद के बीच किस तरह से संतुलन बैठाते हैं या इस तरह की चुनौतियों के सामने घुटने टेककर इराक़ को गहरे राजनीतिक संकट में छोड़कर चले जाते हैं।