6 मई 2020 - 14:23
नाराज़ मुस्लिम देशों को मनाने में मोदी सरकार फ़िलहाल तो सफल हो गई, लेकिन क्या बीजेपी और आरएसएस अपना एजेंडा त्याग देंगे?

भारत में इस्लामोफ़ोबिया और मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत की उठने वाली लहरों ने दुनिया भर में ख़ासकर पश्चिम एशिया में नई दिल्ली की साख, उपलब्धियों और आर्थिक हितों पर पानी फेरना शुरू कर दिया है।

पिछले कई दशकों के दौरान भारत और फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों के बीच राजनीतिक और आर्थिक रिश्ते काफ़ी मज़बूत हुए हैं, विशेष रूप से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में इन संबंधों में महत्वपूर्ण प्रगति देखने में आई है।

यहां ख़ास बात यह है कि नई दिल्ली ने क्षेत्र में एक दूसरे के धुर विरोधी सऊदी अरब और ईरान तथा ईरान और इस्राईल के साथ संबंधों में एक संतुलन बनाए रखने की कशिश की। लेकिन केन्द्र में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की हिंदू राष्ट्रवादी सरकार के गठन के बाद यह संतुलन किसी हद तक लड़खड़ा रहा है।

ईरान ने जहां भारत में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों के मुद्दे को खुलकर उठाना शुरू कर दिया है, वहीं फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों में भारतीय मुसलमानों के दमन पर चिंताएं बढ़ने लगी हैं।

भारत की पिछली सरकारों द्वारा किए गए प्रयासों से एक समय में पाकिस्तान के निकट सहयोगी माने जाने वाले सऊदी अरब और यूएई जैसे देश, हालिया वर्षों में नई दिल्ली के काफ़ी निकट आ गए थे। नई दिल्ली के लिए यह काफ़ी महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, लेकिन मोदी सरकार ने अब इस उपलब्धि को ख़तरे में डाल दिया है।

यूएई और सऊदी अरब जहां भारत के तीसरे और चौथे सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार हैं, वहीं इन दोनों देशों ने भारत के ऊर्जा और औद्योगिक क्षेत्र के विकास के लिए पांच वर्षों में 170 अरब डॉलर के सहयोग का वादा किया है। 30 लाख से ज़्यादा भारतीय यूएई में तो 20 लाख से ज़्यादा सऊदी अरब में रहते हैं और सालाना अरबों डॉलर भेजकर देश की जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

लेकिन कोरोना वायरस महामारी फैलने का आरोप लगाकर जब भारत में मुसमलानों पर चौतरफ़ा हमले शुरू हो गए तो पश्चिम एशियाई देशों के साथ नई दिल्ली के यह रिश्ते खटाई में पड़ने लगे।

यह देखकर मोदी सरकार के हाथों के तोते उड़ गए और पहुंचने वाले नुक़सान की भरपाई के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज़ कर दिए। सबसे पहले तो प्रधान मंत्री मोदी ने ख़ुद ट्वीट करके इस बात पर ज़ोर दिया कि महामारी किसी जात, धर्म, रंग, भाषा या सीमा को नहीं देखती है।

यूएई में भारतीय राजदूत का भेदभाव के ख़िलाफ़ सचेत करने वाला एक अभूतपूर्व बयान आया। अन्य देशों में भी भारतीय दूतावासों ने भारतीय प्रवासियों से किसी तरह का इस्लामोफ़ोबिक बयान देने के प्रति सतर्क रहने का आग्रह किया। केवल इतना ही नहीं भारत के विदेश मंत्री जयशंकर ने संयुक्त अरब इमारात, क़तर, ओमान और सऊदी अरब के अपने समकक्षों को फ़ोन किया और इस बात का आश्वसन दिया कि मोदी सरकार इस बात का विशेष ध्यान रखेगी कि रमज़ान के पवित्र महीने के दौरान मुसलमानों को किसी तरह की कोई कठिनाई न हो और महामारी से लड़ने के लिए उन्हें हर तरह की चिकित्सा सहायता उपलब्ध करवाई जाएगी।

फ़िलहाल तो ऐसा लगता है कि मोदी सरकार की आपातकालीन कूटनीति ने अपना काम किया है। इसलिए कि फ़ार्स खाड़ी के मुस्लिम देशों ने नई दिल्ली के स्पष्टीकरणों का स्वागत किया है और दोस्ताना संबंधों को बनाए रखने का वादा किया है।

लेकिन सवाल यह है कि नई दिल्ली की सत्ता जिनके हाथों में है बीजेपी और आएसएस, क्या मुसलमानों को देश के लिए ख़तरा समझने, उन्हें दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक बनाने, उनके मूल अधिकारों को छीन लेने और उनके ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाली अपनी नीतियों को त्याग देंगे? अगर नहीं, तो घरेलू स्तर पर कई गंभीर और भयानक परिणाम देखने के अलावा, भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम और अरब देशों के साथ अपने रिश्ते सुरक्षित नहीं रख पाएगा। जिसका सीधा फ़ायदा उसके पारम्परिक दुश्मन पाकिस्तान को पहुंचेगा।