पूरी दुनिया में पहली बार तेल का मूल्य शून्य से भी नीचे चला गया है और ज़ाहिर सी बात है तेल के मूल्य में इस गिरावट के बाद पूरी दुनिया नये आर्थिक संकट के मुहाने पर है।
मौजूदा हालात में तेल के मूल्यों में भारी गिरावट और कोरोना से उपजे संकट की वजह से पश्चिम और अरब जगत के बहुत से टीकाकारों का कहना है कि इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट के समाधान के लिए एक भयानक युद्ध की ज़रूरत है ताकि आर्थिक समीकरण बदल जाएं और विश्व व्यवस्था में पूरी तरह से बदलाव आ जाए।
लेकिन सवाल यह है कि क्या दुनिया इस तरह के किसी युद्ध को सहन कर पाएगी? क्योकि इतने बड़े युद्ध का बहुत बड़ा आर्थिक और जानी नुक़सान होगा क्योंकि बड़ा युद्ध विश्व की बड़ी शक्तियों के बीच होगा और उन सब के पास बड़े बड़े और विनाशक हथियार हैं और फिर अगर अमरीका और चीन के बीच युद्ध होता है तो वह विश्व युद्ध में भी बदल सकता है। वैसे भी अमरीकी राष्ट्रपति किसी लंबी लड़ाई में व्यस्त नहीं होना चाहेंगे। इसके अलावा चीन और पश्चिमी देशों के बीच बहुत बड़े पैमाने पर आर्थिक लेन-देन है जो युद्ध की दशा में खत्म हो जाएगा इससे दोनों पक्षों को भारी नुकसान होगा। इस लिए यह कहा जा रहा है कि इन कारणों की वजह से चीन के साथ अमरीका के युद्ध की संभावना बहुत कम है तो फिर अमरीका तेल के संकट से बचने के लिए किस से युद्ध कर सकता है?
कुछ टीकाकारों का मानना है कि चीन के खिलाफ युद्ध के भयानक परिणामों की वजह से अमरीका ईरान के साथ सुनियोजित और नियंत्रण युद्ध का रास्ता अपना सकता है क्योंकि चीन से युद्ध की तुलना में ईरान के साथ युद्ध का नुक़सान काफी कम होगा।
इसी संदर्भ में न्यूयार्क टाइम्ज़ ने गत 27 मार्च को अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि पेंटागन ईरान से संबंधित इराक़ी सशस्त्र संगठनों पर कोरोना के बावजूद हमला करने का इरादा रखता है। हालांकि पेंटागन के बड़े अधिकारियों द्वारा इस प्रकार के किसी कदम के भयानक परिणामों की ओर से चेतावनी के बाद अमरीकी सरकार ने इराक़ में सशस्त्र गुटों को निशाना बनाने का अपना इरादा बदल दिया लेकिन इससे यह साबित हो गया कि अगर ईरान से तनाव बढ़ा और अमरीकी सरकार को यह लगा कि उसके हितों की रक्षा हो सकती है तो वह ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ सकता है।
लेकिन सवाल यह है कि कोरोना के संकट और तेल के मूल्यों में भारी गिरावट के बीच ईरान के खिलाफ युद्ध के ट्रम्प के जुनूनी फैसले का अमरीकी सरकार को क्या फायदा हो सकता है?
अमरीकी सरकार का मानना है कि ईरान के खिलाफ सीमित युद्ध, सन 1991 में इराक़ के खिलाफ की गयी कार्यवाही की तरह हो सकता है और उससे अमरीकी सरकार के बहुत से हित पूरे हो सकते हैं लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार के सीमित युद्ध का अमरीका को उसी वक्त फायदा मिल सकता है जब वह सुनियोजित और नियंत्रित हो और ईरान में व्यवस्था बदलना उसका उद्देश्य न हो क्योंकि अमरीका के अनुभवों से पता चलता है कि जब भी उसने किसी देश की व्यवस्था बदलने के लिए कार्यवाही की है तो उसके भयानक परिणाम सामने आए हैं।
हालांकि अमरीका ने अभी तक खुल कर यह नहीं कहा है कि वह ईरान के खिलाफ युद्ध का मन बना रहा है लेकिन बहुत से संकेत हैं जिनसे यह अनुमान लगाया जा रहा है।
अमरीका को लगता है कि अचानक शुरु की गयी लड़ाई से ईरान कमज़ोर होगा और फिर उसपर अधिक कड़े प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं जैसा कि सन 1991 में इराक़ के साथ अमरीका ने यही किया था।
दूसरी बात यह है कि इस प्रकार के किसी भी युद्ध की दशा में तेल की कीमत बढ़ जाएगी खास तौर पर इस लिए भी कि अमरीका द्वारा हमले की दशा में ईरान तेल वाहक जहाज़ों और तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाएगा। इसके अलावा यह भी एक सच्चाई है कि फार्स की खाड़ी में हर प्रकार के तनाव से, तेल के बाज़ार में सप्लाई को लेकर चिंता पैदा होती है जिसके नतीजे में तेल की क़ीमत बढ़ती है।
ईरान के खिलाफ अमरीका के संभावित युद्ध का खर्चा फार्स की खाड़ी के सऊदी अरब और यूएई जैसे देश उठाएंगे और इसके लिए वह यह बहाना पेश करेंगे कि इस युद्ध से उनका संयुक्त दुश्मन यानि ईरान कमज़ोर हुआ है।
इस तरह से अमरीकी हितों की पूर्ति होगी और वह बिना किसी खर्चे के ईरान के खिलाफ एक युद्ध कर लेगा जिससे ईरान कमज़ोर होगा, तेल का मूल्य बढ़ जाएगा और उसके हथियार भी अधिक बिकने लगेंगे। सब से बड़ी बात यह होगी कि अमरीका के तेल की गिरती क़ीमत संभल जाएगी। Q.A.
साभार, अलअरबी 21, पार्स टूडे का लेखक के विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं।