समाचार चैनल अलजज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक़, हालिया दिनों में तेल को लेकर पूरी दुनिया में जो तनावपूर्ण स्थिति सऊदी अरब ने पैदा की है, इससे रियाज़ और वॉशिंग्टन दोनों के हितों को ज़ोरदार झटका लगा है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि, सऊदी अरब और अमेरिका के बीच तेल की क़ीमतों को लेकर टकराव इस स्तर तक चला गया है कि अगर कोरोना वायरस के फैलाव से दुनिया जूझ न रही होती तो अब तक इन दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ गया होता। अमेरिका की प्रसिद्ध वेबसाइट मॉडर्न डिप्लोमेसी के लेखक जेम्स एम डोरसी ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि, सऊदी अरब के अड़ियल और ढीठ रवैय ने अमेरिका को क्रोधित कर दिया है जबकि संयुक्त अरब इमारात, जो रियाज़ और मास्को के ही स्टैंड का समर्थन कर रहा है, लेकिन अमेरिका के क्रोध से बचने में कामयाब हुआ है।
लेकिन अब यहां पर यह सवाल उठता है कि आख़िर यूएई, अमेरिका के ग़ुस्से से कबतक बच सकता है? इस सवाल के जवाब में अपनी रिपोर्ट में डोरसी ने लिखा है कि, 12 अप्रैल को हुए तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक के सदस्यों और ग़ैर सदस्यों के बीच हुए समझौते के अनुसार 1 कोरड़ बैरल तेल प्रतिदिन कम किया जाएगा। अगर यह समझौता व्यवहारिक होता है तो किसी हद तक तेल को लेकर जारी तनाव कम हो सकता है। लेकिन इस समझौते के एक दिन बाद अमेरिकी कांग्रेस में मौजूद 13 रिपब्लिकन सीनेटरों ने तेल उत्पादक देशों को प्रतिनिधि करते हुए सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री अब्दुल अज़ीज़ बिन सलमान से दो घंटे टेलीफ़ोनी वार्ता के ज़रिए रियाज़ को चेतावनी दी है। इस बीच नॉर्थ डकोटा के सीनेटर केनेथ क्रेमर का कहना था कि, सऊदी अरब अमेरिका के तेल उत्पादकों के साथ एक महीने से तेल को लेकर जंग छेड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब ऐसी स्थिति में अमेरिकी हितों के ख़िलाफ़ गतिविधियां अंजाम दे रहा है कि जब वॉशिंग्टन अपनी पूरी ताक़त और क्षमता के साथ लगातार रियाज़ का समर्थन करता आया है।
जेम्स एम डोरसी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि, कांग्रेस के सदस्यों द्वारा दी जा रही प्रतिक्रिया इस बात को दर्शाती है कि, पिछले दो वर्षों के दौरान सऊदी अरब और अमेरिकी कांग्रेस के बीच संबंध ख़राब हुए हैं और अपने निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प सऊदी अरब द्वारा आरंभ किए गए तेल विवाद को लेकर काफ़ी ग़ुस्से में दिखाई दे रहे हैं। हालिया दिनों में सऊदी अरब द्वारा की गई कार्यवाहियों के कारण अमेरिका के शेल उद्योग को काफ़ी नुक़सान पहुंचा है। इस बीच रियाज़ सरकार वॉशिंग्टन के हितों और आक्रोश की अन्देखी करते हुए केवल अपने हितों को साधते हुए आगे बढ़ता जा रहा है। साथ ही यह भी दावा किया जा रहा है कि सऊदी अरब के अड़ियल रैवेय के कारण अमेरिका में बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी की समस्या पैदा हो सकती है। अंतर्राष्ट्रीय तेल बाज़ार में लगातार गिरती तेल की क़ीमतों के कारण अमेरिका की शेल कंपनियों की स्थिति ठीक नहीं है। जहां एक ओर अमेरिका में कोरोना वायरस के व्यापक स्तर पर फैलने के कारण लोगों को अपनी जान बचाना मुश्किल हो रहा है वहीं दूसरी ओर तेल की गिरती क़ीमत के कारण अब जान के साथ-साथ माल भी इस देश की जनता के हाथों से निकलता दिख रहा है।
कुल मिलाकर कोरोना वायरस के कारण अमेरिका समेत पूरे विश्व की हालत ख़राब है। इससे एनर्जी सेक्टर बुरी तरह प्रभावित है। फैक्ट्री में कामकाज घटा है और एविएशन सेक्टर में मंदी के कारण तेल की डिमांड काफ़ी गिर गई है जिससे क़ीमत पर दबाव बढ़ गया है। अमेरिकी तेल कंपनियों पर कर्ज़ का बोझ बैंकिंग और फाइनैंशल सेक्टर के लिए भी ख़तरा है। अगर कोई भी कंपनी दिवालिया होती है तो इससे अमेरिका की पूरी इकॉनमी पर असर होगा। इस बीच इसी वर्ष नवंबर महीने में अमेरिका में राष्ट्रपति पद का चुनाव होना है और ट्रम्प जो कुछ महीनों पहले तक अपनी जीत को लेकर आश्वस्त दिखाई दे रहे थे, वहीं कोरोना वायरस और अब तेल के खेल ने ट्रम्प की सारी गठित के फेल कर दिया है। जानकारों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी हार की संभावना से जितना चिंतित नज़र आ रहे हैं उससे कहीं ज़्यादा क्रोधित हैं और सऊदी अरब ने ट्रम्प के ग़ुस्से की आग में तेल डालकर इस आग को और अधिक भड़का दिया है। जानकारों के मुताबिक़, ट्रम्प कोरोना वायरस की आग में जल रहे अमेरिकी राष्ट्र को सऊदी अरब के ख़िलाफ़ कोई बड़ी कार्यवाही करके कुछ हद तक शांत करने पर विचार कर रहे हैं।