27 मार्च 2020 - 12:57
सीरियाई चरमपंथी, ख़ुद को क्रांतिकारी समझते समझते बन गए किराए के टट्टू, लीबिया जाकर लड़ रहे हैं तुर्की की जंग

सोशल मीडिया पर आजकल उन सीरियाई चरमपंथियों की वीडियो वायरल हो रही है जो तुर्क सरकार के कार्यक्रम के तहत लीबिया गए हैं और वहां जारी युद्ध का हिस्सा बने हैं।

तुर्की ने पांच हज़ार सीरियाई चरमपंथियों को लीबिया भेजा है। पहले तो इस्तांबूल में सरकार की ओर से खोले गए कार्यालयों के माध्यम से इनकी भर्ती की गई और इन्हें मासिक 2000 डालर वेतन और उन्हें तथा उनके परिवारों को तुर्की की नागरिकता देने का वादा किया गया इसके बाद उन्हें लड़ने के लिए लीबिया भेज दिया गया। यह लड़ाके लीबिया में सेराज सरकार के लिए लड़ रहे हैं जिनका राजधानी त्रिपोली पर नियंत्रण है।

दूसरी ओर ख़लीफ़ हफ़तर की फ़ोर्स है जिसने मिसराता पर नियंत्रण कर रखा है और त्रिपोली पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश में है। सेराज सरकार के साथ तुर्की ने तेल और गैस के कई समझौते किए हैं और लीबिया के पुनरनिर्माण में भी तुर्की को भागीदारी मिलने वाली है लेकिन अगर सेराज की सरकार ख़त्म हो जाती है और ख़लीफ़ हफ़तर त्रिपोली पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं तो तुर्की की अर्दोग़ान सरकार के हाथ कुछ नहीं लगेगा।

सोशल मीडिया पर जो वीडियो वायरल हो रहा है उसमें ख़लीफ़ हफ़तर के लड़ाकों ने सीरियाई चरमपंथियों को पकड़ रखा है और क़ैदी बनाए गए यह चरमपंथी बता रहे हैं कि वह सीरिया के किस शहर के रहने वाले हैं और किस तरह उन्हें तुर्क सरकार की ओर से स्थापित किए गए केन्द्रों में भर्ती किया गया और फिर लीबिया भेज दिया गया। यह चरमपंथी पछता रहे हैं और माफ़ी मांग रहे हैं।

जनरल हफ़तर ने भी इसी तरह किराए के सैनिक मंगाए हैं जिनमें सूडान, चाड और कुछ अन्य देशों के सैनिक हैं।

सोचने की बात यह है कि सीरिया में शांतिपूर्ण जीवन गुज़ारने वाले आम नागरिकों को पहले देश के भीतर क्रांति का नाम लेकर झांसा दिया गया उन्हें यह समझाया गया कि वह क्रांतिकारी हैं और हथियार उठाकर देश के लिए लड़ना उनका मिशन है। इसमें तुर्क सरकार आगे आगे थी लेकिन अमरीका, फ़्रांस, ब्रिटेन, इस्राईल, सऊदी अरब, क़तर और इमारात भी पीछे नहीं थे। मगर सीरियाई सरकार के ख़िलाफ़ यह अंतर्राष्ट्रीय साज़िश नाकाम हुई तो बाक़ी ताक़तों ने तो किनारा कर लिया लेकिन वह सारे सीरियाई संगठन जिन्हें ट्रेनिंग और हथियार दिए गए थे तुर्की की गोद में बैठ गए। तुर्की ने इन संगठनों को अपने आर्थिक हितों के लिए लड़ाना शुरू कर दिया अतः यह लड़ाके अब लीबिया भेजे जा रहे हैं कि वहां तुर्की के आर्थिक हितों की रक्षा करें।

यही काम सऊदी अरब और इमारात भी कर रहे हैं, वह भी किराए के सैनिक लीबिया भिजवा रहे हैं।

इस सारे ड्रामे का दर्दनाक पहलू यह है कि क्रांति के नाम पर पहले सीरिया की जनता को धोखा दिया गया और इस देश को बर्बाद कर दिया गया और अब अलग अलग बहानों से लीबिया में वही लड़ाई चल रही है। ताक़तें वही हैं लेकिन क़ुरबानी चढ़ने वाले लोग बदल गए हैं। सीरिया में इस देश के आम नागरिकों की क़ुरबानी दी गई और अब लीबिया में वहां की जनता ख़मियाज़ा भुगत रही है।

इसलिए जब भी विश्व शक्तियां किसी भी देश में लोकतंत्र और आज़ादी लाने की बातें करें और वहां मानवाधिकार की स्थिति का राग अलापें तो हरगिज़ धोखे में नहीं आना चाहिए। फ़ौरन यह देखना चाहिए कि वह कौन से आर्थिक हित हैं जहां विश्व शक्तियों की निगाहें टिकी हुई हैं क्योंकि आर्थिक हितों के अलावा उन्हें किसी चीज़ की फिक्र नहीं है।