राष्ट्रपति हसन रूहानी ने अमरीकी पेशकश का मज़ाक़ उड़ाया। उन्होंने कहा कि अमरीकी प्रशासन को अगर वाक़ई ईरानी राष्ट्र की चिंता होती और वह इंसानी जज़्बे के तहत मदद करना चाहता था तो उसे ईरान पर लगाया गया प्रतिबंध हटाना चाहिए था जिसके कारण कोरोना वायरस से लड़ने की ईरानी राष्ट्र की ताक़त प्रभावित हो रही है।
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने मदद की जिस पेशकश की बात की थी वह वाक़ई अपमानजनक थी क्योंकि यह 10 करोड़ डालर की मदद थी और यह मदद कई देशों को देने की बात कही गई थी यानी ईरान को कुछ मिलियन डालर शायद दिए जाते और वह भी अमरीका के घटिया चिकित्सा उपकरणों के रूप में होते जिनका कोई उपयोग नहीं है।
ईरान के सुप्रीम लीडर सैयद अली ख़ामेनई ने टीवी पर प्रसारित होने वाले अपने हालिया संबोधन में अमरीका के बारे में बिल्कुल सही कहा कि वह ईरान का सबसे कट्टर और सबसे घटिया दुशमन है और उसकी तरफ़ से दी जाने वाली कोई भी मदद हो सकता है कि कोरोना वायरस को और भी मज़बूत और स्थायी बना दे या फिर उसके प्रसार की गति तेज़ कर दे।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प और उनका प्रशासन जिस घटियापन पर उतारू हो गया है वह हमारे लिए तो आश्चर्यजनक नहीं है इसलिए कि अमरीकी प्रशासन ख़ुद अपने देश के भीतर कोरोना वायरस की रोकथाम में पूरी तरह नाकाम हो गया है और उसके पास ज़रूरी उपकरणों और संसाधनों की भारी कमी है जिसका सुबूत न्यूयार्क सहित कई राज्यों के हालिया एलान हैं जो कोरोना के सामने बेबस होकर रह गए हैं।
हम ईश्वर का शुक्र अदा करते हैं कि कुछ देश हैं जिनके पास इंसानी जज़्बा और वैज्ञानिक क्षमता है जो पीड़ित देशों की मदद कर रहे हैं, यह चीन, रूस और क्यूबा जैसे देश हैं जिन्होंने बहुत तेज़ी से ज़रूरी सामान, डाक्टरों और विशेषज्ञों को कोरोना से जूझ रहे देशों में भेजा है।
रूस ने 9 विमान इटली भेजे हैं और इससे पहले चीन और क्यूबा वहां मदद भेज चुके हैं जबकि अमरीका की हालत यह है कि उसने अपने घटक देशों पर लगे हुए प्रतिबंध तक हटाने का कष्ट नहीं किया। अमरीका का यह रवैया नस्लवादी है और यहीं से उसके बारे में संदेह बढ़ता है और इस विचार को बल मिलता है कि कोरोना वायरस बनाने और उसे दुनिया में फैलाने की भयानक साज़िश हो सकता है कि अमरीका ने रची हो।
स्रोतः रायुल यौम