दरअस्ल यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और अमरीका के पास इसका रुख़ बदलने के लिए अब मौक़ा नहीं बचा है। शंघाई के क़रीब चीन के केवल एक शिपयार्ड का फ़ोटो दिखाकर फ़ोर्ब्स मैगज़ीन ने अपने पाठकों को बताया है कि चीन बेहद तेज़ रफ़तार से और व्यापक स्तर पर नैवल डिपार्टमेंट का आधुनिकीकरण कर रहा है।
इस एक शिपयार्ट में चीन के 9 डेस्ट्रायर जहाज़ खड़े दिखाई देते हैं जबकि पूरी ब्रिटिश नौसेना के पास इस प्रकार के केवल छह डेस्ट्रायर हैं।
यही शिपयार्ड चीन का आधुनिक एयरक्राफ़्ट कैरियर भी बना रहा है। यह लाइन में तीसरे नंबर पर है। दूसरे नंबर का कैरियर एक हफ़्ता पहले चीनी नौसेना के हवाले किया गया है। चीन का पहला एयरक्राफ़्ट कैरियर 36 जे-15 फ़ाइटर विमान लेकर चलता है।
शंघाई में जिस कैरियर का निर्माण चल रहा है वह अधिक बड़ा और ज़्यादा अच्छा कैरियर होगा। इसमें अमरीका के यूएसएस जेराल्ड आर फ़ोर्ड एयरक्राफ़्ट कैरियर की सारी ख़ूबियां होंगी।
सबसे बड़ी बात यह है कि यह शिपयार्ड चीन की भारी शक्ति का छोटा सा नमूना है क्योंकि चीन के पास इसी तरह के अनेक शिपयार्ड हैं।
फ़ोर्ब्स मैगज़ीन को चीन की जिस ताक़त पर हैरत है वह अमरीकी मीडिया और थिंक टैंक्स की गंभीर चर्चा और चिंता का विषय बनी हुई है।
जून महीने में सेंटर फ़ार ए न्यू अमेरिकान सेक्युरिटी सीएनएएस ने कहा कि चीन की औद्योगिक और तकनीकी क्षमता उसकी मदद करेगी कि वह अमरीकियों को पीछे छोड़ दे।
इस थिंक टैंक ने कहा कि पूर्व सोवियत संघ तो अमरीका के टेक्नालोजिकल वर्चस्व को पीछे नहीं छोड़ सका लेकिन चीन के बारे में यह स्थिति नहीं है, चीन तकनीकी मैदान में वर्चस्व की ओर आगे बढ़ रहा है।
डिप्लोमैट से लेकर नेशनल इंट्रेस्ट तक सारे ही मैगज़ीन अपने पाठकों को यह बता रहे हैं कि चीन की सैनिक आधुनिकीकरण की प्रक्रिया अमरीका के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। हार्वर्ड पोलीसी रिवीव ने तो एक क़दम आगे जाते हुए इस बात पर ताज्जुब ज़ाहिर किया कि वर्तमान स्थिति चीन का वर्चस्व स्थापित कर देगी और चीन उतना आगे चला जाएगा जितना वह चाहेगा।
अमरीका के पास यही रास्ता बचता है कि चीन को आधुनिक तकनीक हासिल करने से रोके लेकिन यह अमरीका के बस की बात नहीं है।
यह सही है कि कुछ सैनिक टेक्नालोजीज़ का मिज़ाज यह है कि उनको डेवलप करने में दशकों का समय लगता है। पनडुब्बियों की तकनीक में चीन अमरीका से पीछे है लेकिन चीन के पास एक रास्ता यह है कि वह अपने क़रीबी घटक रूस की मदद से इस गैप को बहुत जल्दी भर ले।
अब स्थिति यह हो गई है कि अमरीका कुछ क्षेत्रों में चीन की बढ़ती ताक़त की रफ़तार कुछ कम कर सकता है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में अमरीका के लिए इस प्रकार का कोई क़दम उठा पाना असंभव ही लगता है। आने वाले एक दो दशक में समुद्री ताक़त के मैदान में चीन सुपरपावर की सीट पर बैठा नज़र आएगा।
(इनपुट्स रशा टुडे से)