5 मार्च 2020 - 14:23
इस्राईल से सांठ-गांठ करने वाले अरब, नेतनयाहू की कमज़ोर जीत से ख़ुश न होंः रायुल यौम

मशहूर अरबी समाचारपत्र रायुल यौम ने अपने एक लेख में लिखा है कि जिन अरब सरकारों ने फ़िलिस्तीन पर अवैध क़ब्ज़ा करने वाली ज़ायोनी शासन के साथ काफ़ी समय से अपने संबंध सामान्य बनाने की प्रक्रिया शुरू कर रखी है और जो इस्राईल के संसदीय चुनाव में नेतनयाहू की कमज़ोर जीत से ख़ुश हो रहे हैं, उन्हें ज़्यादा आशावान नहीं रहना चाहिए।

रायुल यौम ने लिखा है कि बड़ी हैरत की बात है कि नेतनयाहू जैसा राजनीतिज्ञ, जिस पर भ्रष्टाचार, घूस लेने और सार्वजनिक संपत्ति को तबाह करने का आरोप है और उसका गठजोड़ संसदीय चुनाव में बहुमत भी हासिल नहीं कर सका है, 11 महीने से कम समय में ज़ायोनी शासन के तीसरे चुनाव में अपनी जीत का जश्न मना रहा है। इससे भी घिनौनी बात यह है कि कुछ अरब सरकारें, जिन्होंने इस्राईल से संबंधी बहाली की कोशिशें शुरू कर रखी हैं, नेतनयाहू की ख़ुशी में शामिल हो गई हैं।

 

2 मार्च को आयोजित होने वाले ज़ायोनी शासन के संसदीय चुनाव में लिकुड पार्टी के गठजोड़ को सिर्फ़ 58 सीटें मिली हैं जबकि उसके प्रतिस्पर्धी गठजोड़ ने 55 सीटें हासिल की हैं। अगर एविगडर लेबरमैन की पार्टी, जिसने 7 सीटें हासिल की हैं, इन दोनों गठबंधनों में से किसी का साथ न दिया तो कोई भी धड़ा सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटों के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकेगा और फिर चौथी बार चुनावों का आयोजन कराना पड़ेगा। इस स्थिति से ज़ायोनी शासन में जारी राजनैतिक संकट की जटिलता का पता चलता है। अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने नेतनयाहू को जो "तोहफ़े" दिए थे, वे भी इस चुनाव में नेतनयाहू को जीत नहीं दिलवा सके। ट्रम्प ने डील आफ़ द सेंचुरी जैसे फ़िलिस्तीन विरोधी षड्यंत्र और पश्चिमी तट की 30 प्रतिशत धरती इस्राईल में जोड़ने की घोषणा के माध्यम से इस चुनाव में नेतनयाहू को जिताने की पूरी कोशिश की थी।

 

रायुल यौम का कहना है कि जिन देशों ने नेतनयाहू की जीत पर ख़ुशी मनाना शुरू कर दिया है और समझ रहे हैं कि वे ट्रम्प, बोरिस जाॅन्सन और स्वयं को मिला कर एक जातिवादी त्रिकोण बनाएंगे और फ़िलिस्तीन समस्या को समाप्त कर देंगे, उन्हें प्रतीक्षा करनी होगी क्योंकि उनकी यह आरज़ू कभी भी पूरी नहीं होगी क्योंकि जातिवाद कभी भी जीत नहीं सका है। नेतनयाहू, पहली बात तो यह है कि सरकार बनाने योग्य जीत हासिल नहीं कर पाए हैं और दूसरी बात यह कि अवैध अधिकृत इलाक़े पूरी तरह से फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध की रेंज में हैं। अरब जगत में परिवर्तन की लहर तेज़ी से बढ़ती जा रही है और अवैध क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ फ़िलिस्तीनी राष्ट्र की क्रांति निश्चित है और अगर नेतनयाहू ने पश्चिमी तट और जाॅर्डन घाटी के इलाक़े भी इस्राईल में मिला लिए, तब भी वे अपने नस्लवादी शासन के अंत को विलंबित नहीं कर पाएंगे।

 

जब फ़िलिस्तीन पर अवैध क़ब्ज़ा करने वाला ज़ायोनी शासन दस साल से कम के फ़िलिस्तीनी बच्चों को गिरफ़्तार करता है और उसके सैनिक साहस और विजय के संकल्प से भरी उनकी आंखों से आंखें नहीं मिला पाते इससे पता चलता है कि फ़िलिस्तीनियों की विजय निकट है और उसके सामने आने में ज़्यादा समय नहीं बचा है।