तेहरान मुझे उसी तरह बेहद ख़ूबसूरत नज़र आया जैसे धनवान अरब देशों की राजधानियां हैं। बदलाव केवल इमारतों में नहीं बल्कि इंसानों की सोच में भी साफ़ नज़र आता है। मैंने तेहरान के क़हवा ख़ानों में पूरी रात गुज़ारी और वहां नज़र आने वाली गहमागहमी और अलग अलग विषयों पर होने वाली गर्मा गरम बहस से आनंदित हुआ।
सरकार की ओर से आम जनता को दी जाने वाली सेवाएं अब और बढ़ गई हैं। यह स्थिति देखकर आपके मन में यह सवाल ज़रूर उभरेगा कि फिर आर्थिक प्रतिबंधों का क्या असर हुआ? ईरानी करेन्सी तूमान की क़ीमत डालर के मुक़ाबले में बहु गिर गई है लेकिन एक चीज़ यह भी है कि ज़रूरत की चीज़ों की क़ीमतें भी काफ़ी कम है। सबसे सस्ती तो दवाएं हैं। पानी और बिजली की क़ीमत भी बेहद कम है।
अगर उन मुद्दों की बात की जाए जो क्षेत्र के स्तर के हैं और जिनमें ईरान की केन्द्रीय भूमिका है तो ईरान के राजनैतिक और रक्षा गलियारे एक बात दो टूक शब्दों में कहते हैं कि ईरान हर प्रकार की चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है। ईरानी अधिकारियों और नेताओं की बात से साफ़ लगता है कि उन्हें पूरा विश्वास है कि इस्राईल और अमरीका की धमकियां केवल मनोवैज्ञानिक युद्ध की चालें हैं वरना उनके पास ईरान से भिड़ने की ताक़त नहीं है।
ईरान ने इराक़ में अमरीका, इस्राईल और दाइश के ख़िलाफ़ सक्रिय प्रतिरोधक संगठनों का सपोर्ट बढ़ा दिया है। इन संगठनों में से एक के कमांडर ने साफ़ साफ़ कहा कि हमें संसाधनों की कोई कमी नहीं है। जैसे ही सिग्नल मिला हम अमरीका के ख़िलाफ़ नई शैली में अपने हमले शुरू करेंगे और अमरीका को इराक़ से भागना होगा।
हमने एक सवाल यह भी पूछा कि सीरिया के भीतर अलग अलग ठिकानों और प्रतिष्ठानों पर आए दिन इस्राईल के हमले होते हैं तो ईरान इसका उत्तर क्यों नहीं देता। इस पर ईरान का कहना है कि सीरियाई सेना इन हमलों को बार बार नाकाम बना रही है। इस्राईली मिसाइल अपने निशाने तक नहीं पहुंच पाते। दूसरी बात यह है कि सीरिया में ईरान जिस प्रकार की मोर्चाबंदी करना और इस्राईल की नकेल कसना चाहता है वह प्रक्रिया सुचारू रूप से जारी है। बहुत जल्द इस्राईल को पता चलेगा कि उसके हाथ से सब कुछ निकल चुका है।
अरब देशों के बारे में ईरानियों से बात हुई तो उनका कहना था कि वह अरब देशों को अपना दुशमन नहीं समझते। कुछ अरब देशों जैसे सीरिया, इराक़ और अलजीरिया से उनके दोस्ताना संबंध हैं। ओमान, क़तर और लेबनान के साथ भी बहुत अच्छे संबंध हैं। मिस्र की बात की जाए तो उसके साथ ईरान की न तो दुशमनी है और न दोस्ती। इसका साफ़ मतलब यह है कि अरब देशों में ईरानी ख़तरे का जो प्रोपैगंडा किया जाता है वह पूरी तरह निराधार है।
ईरानियों को इस बात का दुख है कि अरब सरकारें फ़िलिस्तीनियों के साथ धोखा कर रही हैं और इस्राईल से दोस्ती की उनकी रणनीति नाकाम साबित होगी। अरब देशों के साथ ईरान की बातचीत शुरू करने का जहां तक सवाल है तो इसमें सबसे बड़ी रुकावट अमरीका है जो अरब सरकारों के कान मरोड़ रहा है और उन्हें ईरान से दूर रहने पर मजबूर करता है।
मैं एक फ़िलिस्तीनी और अरब होने की हैसियत से सोचता हूं कि ईरानी राष्ट्र से मैं कैसे नफ़रत कर सकता हूं। ईरान तो उस इस्राईल पर अंकुश लगा रहा है जिसकी नज़रें अरब देशों की ज़मीनों पर हैं और जो दिन रात सीमा विस्तार के उपायों में लगा रहता है।