1 फ़रवरी 2020 - 16:26
अमरीका आयतुल्लाह सीस्तानी और आयतुल्लाह ख़ामेनई को समझने में क्यों नाकाम रहा है?

17 जनवरी को जब इराक़ के वरिष्ठ शिया धर्मगुरु आयतुल्लाह सीस्तानी को अस्पताल से डिसचार्ज किया गया तो अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने इंग्लिश, अरबी और फ़ार्सी में 3 ट्वीट किए।

पोम्पियो ने अपने इन ट्वीट्स में आयतुल्लाह सीस्तानी को मार्गदर्शन और प्रेरणा का स्रोत बताते हुए उनके जल्दी स्वस्थ होने की मनोकामना की।

पोम्पियो का यह अंदाज़ बताता है कि ट्रम्प प्रशासन इराक़ में ईरान के प्रभाव का मुक़ाबला करने के लिए आयतुल्लाह सीस्तानी के समर्थन का दिखावा करना चाहता है।

हालांकि इससे ठीक दो हफ़्ते पहले पोम्पियो ने ईरानी और इराक़ी कमांडरों जनरल क़ासिम सुलेमानी और अबू मेहदी अल-मोहंदिस की हत्या के लिए अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की जमकर प्रशंसा की थी।

यह बात भी किसी से ढकी छुपी नहीं है कि पोम्पियो ईरान के ख़िलाफ़ ट्रम्प की अधिकतम दबाव की नीति के चैम्पियन हैं।

लेकिन इराक़ और ईरान के धार्मिक नेताओं के बारे में अलग और परस्पर विरोधी दृष्टिकोण से यह स्पष्ट है कि अमरीकी अधिकारी ईरान और इराक़ को समझने में नाकाम रहे हैं।

आयतुल्लाह सीस्तानी ने जनरल सुलेमानी की हत्या के तुरंत बाद, ईरान के सुप्रीम लीडर को एक अभूतपूर्व पत्र भेजकर संवेदना प्रकट की थी।

इस पत्र में अमरीकी हमले की कड़ी निंदा करते हुए उन्होंने इराक़ में तकफ़ीरी आतंकवादी गुट दाइश के ख़िलाफ़ शहीद जनरल सुलेमानी की असाधारण भूमिका की प्रशंसा की थी।  

पिछले कई वर्षों में आयतुल्लाह सीस्तानी द्वारा आयतुल्लाह ख़ामेनई को भेजा गया यह पत्र अपनी तरह का पहला पत्र है।

पत्र का विषय उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण है। इसके अलावा यह बात भी महत्वपूर्ण है कि शायद ही आयतुल्लाह सीस्तानी ने किसी ग़ैर धर्मगुरु की मौत पर पत्र लिखा हो।

इससे यहां यह सवाल उठता है कि आयतुल्लाह सीस्तानी की नज़र में जनरल सुलेमानी का ऐसा क्या महत्व और स्थान था कि उन्होंने आयतुल्लाह ख़ामेनई के नाम एक सार्वजनिक ख़त भेजा।

इसका सीधा जवाब यह है कि दोनों देशों का धार्मिक नेतृत्व इस बात पर पूरी तरह से सहमत है कि विदेशी हमलावर शक्तियों के ख़तरे का मुक़ाबला करने के लिए इस्लामी प्रतिरोध की ज़रूरत है।

दोनों देशों के नेताओं का मानना है कि दाइश जैसे विदेशी समर्थन प्राप्त आतंकवादी गुट और विदेशी हस्तक्षेप इस क्षेत्र की मूल समस्या है।

2014 में दाइश के आतंकवादियों ने जब इराक़ के एक बड़े इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया था और वे बग़दाद की तरफ़ बढ़ रहे थे, आयतुल्लाह सीस्तानी ने जिहाद का फ़तवा जारी किया।

इससे सौ साल पहले 1914 में भी आयतुल्लाह सैय्यद काज़िम अल-यज़दी ने भी ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी किया था, जो मुस्लिम देशों पर हमले कर रहा था।

आयतुल्लाह सीस्तानी के फ़तवे ने इराक़ में स्वयं सेवी बल हशदुश्शाबी की स्थापना की नींव रखी। फ़ौरन ही जनरल सुलेमानी के नेतृत्व में ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स ने दाइश के ख़िलाफ़ इराक़ के सुन्नियों, शियों और कुर्दों को संगठित और एकजुट करने में मदद की।

आयतुल्लाह सीस्तानी हमेशा एक ऐसे शक्तिशाली इराक़ पर बल देते रहे हैं, जहां शिया और सुन्नी मुसलमान एकता और भाईचारे के साथ जीवन व्यतीत कर सकें। इस दौरान, इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने जनरल सुलेमानी की असाधारण प्रतिभा और हमेशा याद रखी जाने वाली भूमिका को पहचाना।

आयतुल्लाह सीस्तानी ने ईरानी अधिकारियों के साथ मुलाक़ात में हमेशा ही उनसे आयतुल्लाह ख़ामेनई के नेतृत्व में एकजुट रहने की सिफ़ारिश की है।

वक़्त ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अमरीकियों ने शिया धर्मगुरुओं को समझने में ग़लती की है।

इसकी एक दूसरी मिसाल इराक़ी धर्मगुरु मुक़तदा सद्र हैं। आयतुल्लाह सीस्तानी समेत सद्र के कई इराक़ी वरिष्ठ धर्मगुरुओं के साथ वैचारिक मतभेद हैं, लेकिन बात जब इराक़ की संप्रभुता, मुस्लिम एकजुटता और विदेशी हस्तक्षेप की आती है तो वे सभी एक पंक्ति में खड़े नज़र आते हैं।