31 जनवरी 2020 - 17:10
अगर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का बलिदान न होता तो क्या भारत आज़ाद होता? इस बारे में स्वयं महात्मागांधी कहते हैं" मैंने इमाम हुसैन स

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का अमर बलिदान महात्मागांधी की आज़ादी के आंदोलन का प्रेरणास्रोत है

दोस्तो हर साल 30 जनवरी को भारत के राष्ट्रपिता महात्मागांधी की पुण्यतिथि मनाई जाती है और बहुत से लोग राजघाट जाकर उनकी समाधि पर पुष्पांजलि भी अर्पित करते हैं।

भारत को अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ादी दिलाने में समस्त जातियों और धर्मों के लोगों ने अपने- अपने दायित्वों का निर्वाह किया परंतु उनमें महात्मागांधी का नाम सर्वोपरि है और उन्हें भारत के राष्ट्रपिता या बापू नाम से पुकारा जाता है।  

अंग्रेज़ों को भारत से निकालने के लिए महात्मागांधी ने बहुत सारे काम किये परंतु उनके दो कार्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रथम एकता और दूसरे अहिंसा। महात्मागांधी के “भारत छोड़ो आंदोलन” में हिन्दू- मुसलमान सहित सभी जातियों और धर्मों के लोग शामिल थे।

अंग्रेज़ों ने भारत के कुछ लोगों को कुछ सुविधायें दे रखी थी ताकि इस बहाने से उनकी ज़बानों पर ताले लगा सकें जैसे आज भी बहुत सी सरकारें अपने विरोधियों की आवाज़ दबाने और लोगों में फूट हालने के लिए इसी हथकंडे का प्रयोग करती हैं और इस प्रकार के तत्व सरकारों की ग़ैर कानूनी व अमानवीय कार्यवाहियों का औचित्य दर्शाने प्रयास करते हैं।

महात्मागांधी ने अंग्रेज़ों को भारत से निकालने के लिए हिंसा नहीं बल्कि अहिंसा का रास्ता अपनाया था और 200 सालों यानी 1746 से अंग्रेज़ों की चली आ रही तानाशाही सरकार का 15 अगस्त  1947 को अंत हो गया और भारत में आज़ादी का सूरज निकला और समूचे भारत में खुशियां मनाई गयीं।

अगर हम भारत को हमेशा- हमेशा के लिए आज़ाद कराना चाहते हैं तो भारत के राष्ट्रपिता महात्मागांधी के रास्तों पर चल कर यह काम कर सकते हैं। हमें लोगों को अधिक से अधिक जागरुक बनाने का प्रयास करना चाहिये। आज भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जो सरकार के काले कानून के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं वे इसी जागरुकता और बेदारी के ही परिणाम हैं। अगर लोगों में बेदारी न होती तो भारत का संविधान विरोधी कानून लोगों पर थोप दिया जाता और लोग चुप रहते।

कितनी अजीब बात है कि भारतीय सांसद देश के संविधान की क़सम खाते हैं और उसी के खिलाफ़ प्रस्ताव पारित करते हैं और जो लोग इसका विरोध करते हैं उन्हें देशद्रोही और गद्दार कहा जाता है और जो संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं उन्हें देशभक्त और देशप्रेमी कहा जा रहा है।

यही नहीं जब राजनेताओं को लोगों से वोट लेने थे तब वोटरकार्ड भारतीय नागरिकता के प्रमाण थे और जब वोट मिल गये तब वोटरकार्ड नागरिकता के प्रमाण नहीं रह गये और अब नागरिकता सिद्ध करने के लिए 70 साल पहले के सबूत मांगे जा रहे हैं।

कोई यह सवाल नहीं करता है कि जो लोग सत्तासुख भोग रहे हैं उनमें से कितने लोगों ने 70 साल पहले के रिकार्ड और दस्तावेज़ जमा कराये हैं? बहरहाल जिस तरह भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एकता और अहिंसा के हथियार से अंग्रेज़ों की 200 साला सरकार की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी उसी तरह भारत का जागरुक समाज एकता व एकजुटता के ज़रिये और शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन जारी रख कर भारत को हमेशा- हमेशा के लिए आज़ाद करा सकता है।

बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि जिस महात्मागांधी ने भारत की आज़ादी के लिए अनथक प्रयास किया था, हिन्दू मुसलमान, सिख, ईसाई सबको एकजुट करके अंग्रेज़ों को भारत से निकाला था उसी आज़ादी के महानायक महात्मागांधी को नाथूराम गोड्से ने 30 जनवरी 1948 को गोलियों से भून दिया और आज भी भारतीय समाज में कुछ एसे लोग हैं जो स्वतंत्रता के महानायक के हत्यारे को आतंकवादी नहीं बल्कि प्रेमी कहते हैं।

इस प्रकार के लोगों से पूछा जाना चाहिये कि अगर नाथूराम गोड्से देशप्रेमी है तो फिर महात्मागांधी क्या हैं? क्या क़ातिल और मक़तूल दोनों देशप्रेमी हैं? कुछ लोग महात्मागांधी के हत्यारे को आतंकवादी कहने में क्यों संकोच से काम ले रहे हैं? उसने महात्मागांधी की हत्या क्यों की? उसका संबंध किस दल से था? जिस दल से उसका संबंध था उसकी सोच क्या है? कहीं वही दल तो भारत और भारतीय समाज पर कब्ज़ा करने की जुगत में नहीं है?

बहरहाल मेरे विचार में जो लोग महात्मागांधी को सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं वे गांधीजी के बताये गये मार्गों पर चल कर उन्हें भावभीनी श्रृद्धांजलि दे सकते हैं। गाँधीजी ने अपने सम्पूर्ण जीवन में अहिंसा और सत्य का मार्ग अपनाया तथा देशवाशियों को भी इसी मार्ग पर चलने का आग्रह किया और उनके मार्ग पर चलकर भारत को आज़ादी दिलाई जा सकती है।