25 जनवरी 2020 - 13:38
यूं कर रही है ईरानी जनरल की आत्मा अमरीका को परेशान, दूसरे विश्व युद्ध के बाद कैसे पहली बार ईरान ने मारा अमरीका को तमांचा, स्पूतन

रूसी न्यूज़ एजेन्सी स्पूतनिक ने ईरान व अमरीका के संबंध और इलाक़े के हालात के बारे में रोचक रिपोर्ट प्रकाशित की है।

जैसे जैसे दिन गुज़र रहे हैं यह अधिक साबित होता जा रहा है कि अमरीका की यह सोच कि ईरान के जनरल क़ासिम सुलैमानी की हत्या के बाद इलाक़े में अमरीका के खिलाफ मोर्चा खत्म हो जाएगा, गलत थी और जनरल सुलैमानी की आत्मा, अमरीका का पीछा छोड़ने वाली नहीं है। इसी तरह अगर अमरीका को यह लगता है कि इराक़ में उसकी छावनी पर मिसाइली हमले के रूप में एक तमांचे से मामला रफा दफा हो जाएगा तो यह भी उसकी बहुत बड़ी गलती है। मिसाइल से तमांचा को ईरान के बदले का आरंभ था।

इराक़ में कई वर्षों से यह कोशिश की जा रही थी कि देश से अमरिकयों को निकालने का कानून संसद में पारित हो जाए मगर विभिन्न कारणों और अमरीकी दबाव की वजह से इस प्रकार के बिल पर संसद में एकमत नहीं बन पाता था लेकिन सब ने देखा कि जनरल क़ासिम सुलैमानी और अबू मेहदी अल मुहंदिस की शहादत के बाद किस तरह से एक झटके में इराक़ी संसद में सर्व सम्मति से अमरीकियों के देश से निकालने का बिल पास हो गया।

इसी प्रकार दूसरे विश्व युद्ध और जापान द्वारा पर्ल हार्बर पर हमले के बाद पहली बार दुनिया के किसी देश ने अमरीका के दबदबे को अनदेखा करके युद्ध के हालात के बिना ही अमरीकी सैन्य छावनियों पर मिसाइल बरसाए और बड़ी संख्या में अमरीकी सैनिकों को हताहत व घायल कर दिया। हालांकि अमरीकी अधिकारियों ने झूठ बोल कर मारे जाने वाले अपने सैनिकों की संख्या छुपाने की कोशिश की है और धीरे धीरे और कई चरण में ईरान के हमले से होने वाले नुक़सानों को स्वीकार कर रहा है लेकिन साक्ष्यों और प्रत्यक्षदर्शियों से पता चलता है कि बड़ी संख्या में अमरीकी सैनिक और  अफसर ईरान के मिसाइल हमले में मारे गये हैं।

     वैसे भी ईरान का मक़सद अमरीकी दबदबे को खत्म करना था और वह मक़सद पूरा हो गया ईरान ने यह साबित कर दिया कि वह अमरीका से टकराने में संकोच से काम नहीं लेगा। निश्चित रूप से अगर जनरल सुलैमानी को शहीद न किया गया होता तो ईरान इस प्रकार का काम नहीं कर सकता था और न ही अमरीकी ईरान के इस प्रकार के हमले पर चुप बैठे रहते। दूसरी तरफ ईरान को यह भी फायदा हुआ कि जब इलाक़े में अमरीका के घटक देशों ने यह हालत देखी तो अब वह बौखलाहट में ईरान के साथ अपने मुद्दों के समाधान के लिए हाथ पैर मार रहे हैं।

एक सैनिक विशेषज्ञ का कहना है कि अगर अमरीकियों को यह पता होता कि उन पर हमला होने वाला है तो फिर वह एक भी ईरानी मिसाइल को रोक और तबाह क्यों नहीं कर सके? और अगर उन्हें पता नहीं था तो फिर यह क्यों हल्ला कर रहे हैं कि उन्हें पहले से पता चल गया था और उन्होंने अपने सैनिकों को वहां से हटा लिया था। अस्ल बात यह है कि अपनी छावनी पर ईरान के सीधे हमले के बाद अमरीकी यह नहीं समझ पा रहे थे कि क्या कहना बेहतर होगा? यही वजह है कि अमरीकी राष्ट्रपति को हमले पर पहला बयान देने के लए 18 घंटे सोच विचार की ज़रूरत पड़ी।

यही वजह है कि इलाक़े में मौजूद अमरीकी घटकों के होश भी ठिकाने आ गये और वह समझ गये कि जब अमरीका अपना बचाव नहीं कर पाया तो वह कैसे ईरान के किसी संभावित हमले से उन्हें बचा पाएगा ?  

इराक़ में तो सब कुछ अमरीका के लिए घाटे का सौदा रहा। अमरीका कई महीनों से अपने एजेन्टों की मदद से इस देश में उपद्रव फैलाए है लेकिन शुक्रवार को पूरी दुनिया ने देखा किस तरह से दसियों लाख इराक़ियों ने मिलयन मार्च करके " अमरीका निकल जा " के नारे लगाए। अमरीक एजेन्ट शुक्रवार को चूहों ती तरह अपनी बिलों में घुस गये थे। अगर जनरल क़ासिम सुलैमानी को अमरीका शहीद न करता तो शायद इराक़ में बड़े पैमाने पर उपद्रव कराने वाले एजेन्टों को सड़कों से हटाना इराक़ी सरकार के लिए संभव नहीं होता और न ही इराक़ के विभिन्न धड़ों से संबंध रखने वाले इराक़ के इतिहास में पहली बार इस प्रकार से एक मंच पर नज़र आते।

ईरान के जनरल क़ासिम सुलैमानी और इराक़ के अबू मेहदी अलमुहंदिस का खून एक दूसरे में मिल गया ताकि अमरीका को क्षेत्र से निकालने के लिए ईरान व इराक की जनता एक दूसरे का हाथ थाम कर आगे बढ़े। अगर अमरीकी यह समझते हैं कि इस बार भी धौंस व धांधली से इराक़ या इलाक़े में अपनी उपस्थिति बचा ले जाएंगे तो यह उनकी बहुत बड़ी गलती होगी क्योंकि अब कोई अमरीकी अफसर इस इलाक़े के किसी भी देश की सड़क पर बाडीगार्ड के साथ भी टहलने का साहस नहीं कर सकता।

हालांकि ईरान ने कहा है कि शहीद कासिम सुलैमानी का बदला, अमरीका को इस इलाक़े से भगा कर लिया जाएगा लेकिन मिस्टर ट्रम्प और उनके सलाहकारों को यह मालूम होना चाहिए शहीद सुलैमानी और उनके साथियों की आत्मा फिलहाल उनका पीछा छोड़ने वाली नहीं है।