मिडिलईस्ट-आई ने दोनों देशों के अधिकारियों के हवाले से बताया है कि अमरीका पश्चिमी इराक़ को एक ख़ुदमुख़्तार सुन्नी क्षेत्र बनाने की योजना को आगे बढ़ा रहा है।
कहा जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद, ब्रिटिश साम्राज्य और पश्चिम इराक़, सीरिया और जिन दूसरे अरब देशों को छोटे छोटे टुकड़ों में नहीं बांट सके थे, उस अधूरी योजना को अमरीका और इस्राईल पहले से ही पूरा करने करने के प्रयास कर रहे थे, लेकिन ताज़ा परिस्थितियों में बग़दाद सरकार और संसद द्वारा अमरीकी सैनिकों को तुंरत देश से बाहर निकालने के लिए दबाव बनाने के बाद, वाशिंगटन ने इराक़ के विभाजन की योजना पर अमल तेज़ कर दिया है।
अमरीकी अधिकारियों ने इस बात को स्वीकार किया है कि इराक़ से अमरीकी सैनिकों के निष्कासन पर समस्त राजनीतिक दलों की सहमति के बाद, ट्रम्प प्रशासन ने इस योजना को तेज़ी से आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया है।
भू-राजनीतिक स्थिति और तेल की दृष्टि से मध्यपूर्व का एक महत्वपूर्ण देश है, जो ईरान और उसके सहोगी देशों लेबनान, सीरिया और फ़िलिस्तीन के बीच स्थित है।
इराक़ी अधिकारियों का मानना है कि देश का विभाजन अब अमरीका की प्राथमिकताओं में से एक है। उनका कहना है कि अगर अमरीका के सामने इराक़ से अपने सैनिकों को बाहर निकालने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा तो वह अपनी इस ख़तरनाक योजना को ज़रूर आगे बढ़ायेंगे और शिया बहुल क्षेत्रों को सुन्नी बहुल क्षेत्रों से अलग करने की कोशिश करेंगे, ताकि सुन्नी बहुल क्षेत्र में अपने लिए सुरक्षित स्थान पैदा कर सकें।
इस योजना की जानकारी रखने वाले अमरीका के एक पूर्व अधिकारी ने भी इस बात की पुष्टि की है कि वाशिंगटन ने इस योजना पर अमल करना शुरू कर दिया है।
अपना नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर पूर्व अमरीकी अधिकारी ने बताया कि इराक़ को शिया और सुन्नी इलाक़ों में बांटना अमरीका की पुरानी योजना है। इससे ईरान ज़मीनी रास्ते से भूमध्य-सागर और लेबनान व सीरिया से नहीं जुड़ पाएगा।
अधिकारी का कहना था कि यह योजना अमरीका की है, न कि इराक़ के सुन्नी मुसलमानों की। अगर वाशिंगटन अपने सैनिकों को इराक़ से बाहर निकालने पर मजबूर हो जाता है, तो उसकी यह योजना खटाई में पड़ जाएगी और वह ईरान के प्रभाव को कम करने में असफल हो जाएगा।
अमरीकी अधिकारी ने ज़ोर देकर कहा कि "हम एक अलग स्वाधीन देश की स्थापना की बात कर रहे हैं, न कि केवल एक प्रशासनिक क्षेत्र की।"
अमरीका एक बार फिर एक मुस्लिम और अरब देश के विभाजन की कोशिश ऐसी स्थिति में कर रहा है, जब इससे पहले उसकी इस तरह की हर कोशिश का इराक़ के सुन्नी अरबों ने कड़ा विरोध किया था।
इस तरह न केवल यह ऐतिहासिक अरब देश हमेशा के लिए कमज़ोर पड़ जाएगा, बल्कि सुन्नी मुसमानों को तेल की उस दौलत से भी वंचित होना पड़ेगा, जिसका केन्द्र दक्षिण में शिया बहुल इलाक़े हैं।
इससे पहले 2017 में इराक़ में दाइश की पराजय के तुरंत बाद कुर्दों ने एक जनमत संग्रह का आयोजन करके कुर्दिस्तान को एक स्वाधीन देश बनाने की घोषणा कर दी थी, लेकिन बग़दाद और विश्व समुदाय ने इसे औपचारिकता प्रदान नहीं की, जिसके चलते यह योजना बुरी तरह से नाकाम हो गई।
8 जनवरी को इराक़ में अमरीकी सैन्य ठिकानों पर ईरान के मिसाइल हमलों के 24 घंटों से भी कम समय में अमरीका के उप विदेश मंत्री डेविड शैकनर ने बग़दाद को नज़र अदाज़ करते हुए अरबिल का दौरा किया। अरबिल में उन्होंने कुर्दिस्तान सरकार के पूर्व प्रमुख मसूद बारज़ानी समेत कई कुर्द नेताओं से मुलाक़ात की।
उसी दिन शैकनर ने संयुक्त अरब इमारात की भी यात्रा की, जहां उन्होंने इराक़ के सुन्नी संसद सभापति मोहम्मद अल-हलबूसी से भी मुलाक़ात की, हालांकि इस मुलाक़ात को अचानक होने वाली मुलाक़ात बताया गया।
शैकनर से मुलाक़ात के बाद, हलबूसी ने यूएई में 9 और 10 जनवरी को कई सुन्नी नेताओं के साथ अलग अलग मुलाक़ात की।
यूएई में इन बैठकों में भाग लेने वाले इराक़ के एक सुन्नी सांसद ने अपना नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर सूत्रों को बताया था कि इराक़ में स्वयं सेवी बलों और सरकार की ओर से अमरीकी सैनिकों को बाहर निकाले जाने के दबाव के बाद, एक स्वाधीन सुन्नी देश की स्थापना के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, हालांकि इसके लिए इराक़ी सुन्नी मुसलमानों से कोई राय नहीं ली गई है।
सांसद का कहना था कि धर्म के आधार पर हमारे प्रांतों को अलग करने का विचार कुछ हज़म नहीं हुआ, लेकिन विकास के लिए हमारे प्रांतों को अलग प्रशासनिक क्षेत्र घोषित करने के विचार पर उपस्थित लोगों ने सहमति व्यक्त की और कहा कि वे इसे उचित समय अपने लोगों के सामने पेश करेंगे।
हालांकि इराक़ में सुन्नी संसदीय धड़े अल-बिना के नेता अल-हलबूसी ने कि जिन्हें ईरान का भरपूर समर्थन हासिल रहा है, इस रिपोर्ट का खंडन करते हुए कहा है कि इस तरह की किसी योजना के समर्थन की बात तो बहुत दूर है, इस पर किसी तरह की कोई बातचीत तक नहीं हुई है।
इस बीच, हलबूसी के गठबंधन के ही कई नेताओं का कहना है कि उनके ऊपर इस योजना को आगे बढ़ाने का अपने राजनीतिक भागीदारों की ओर से दबाव है और इसके लिए उन्हें विभिन्न प्रकार के प्रलोभन भी पेश किए गए हैं।
हलबूसी के एक क़रीबी सहयोगी अब्दुल्ला अल-ख़िरबैत ने कहा है कि इस विषय पर बातचीत लागातर जारी है और समय के साथ ही इसमें वृद्धि हो रही है।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि देश का विभाजन हमें किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
इसके अलावा, इराक़ में किसी को अमरीका की इस योजना की भौगोलिक सीमाओं के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है।
इराक़ के एक वरिष्ठ सुन्नी नेता के अनुसार, इस योजना को सबसे पहले अल-अंबार प्रांत से शुरू किया जाएगा, जिसके बाद इसमें नैनवा, सलाहुद्दीन और दियाला प्रांतों को भी जोड़ दिया जाएगा।
अमरीका के दृष्टिगत सुन्नी क्षेत्र की स्थापना, पहले इराक़ के संविधान के अनुसार की जाएगी, जो कुर्दिस्तान के अलावा भी प्रशासनिक क्षेत्रों की स्थापना की अनुमति देता है।
उसके बाद, किरकुक और अन्य विवादित क्षेत्रों को लेकर सुन्नियों और कुर्दों के बीच लड़ाई से बचने के लिए इस क्षेत्र को अस्थायी रूप से कुर्दिस्तान में जोड़ दिया जाएगा।
उसके बाद, इस क्षेत्र को एक स्वाधीन देश के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने का प्रयास किया जाएगा।
इराक़ के सुन्नी और शिया नेताओं का कहना है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात, अमरीका की इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए वित्तीय रूप से सहायता करेंगे।
उनका कहना है कि इसके लिए फंडिंग शुरू हो चुकी है, अमरीका और पश्चिम ने दबाव बनाना शुरू कर दिया है और हथियारों की आपूर्ति भी की जा रही है।
इस योजना के एक समर्थक का दावा है कि "तेहरान और बग़दाद इस योजना के ख़िलाफ़ खड़े नहीं हो पाएंगे, इसलिए कि इसे अमरीका और अरब देशों का समर्थन हासिल है।"
कुछ जानकारों का मानना है कि 2017 में दाइश की पराजय के बाद, जो अमरीका के लिए बहुत ही चौंकाने वाली और अप्रत्याशित थी, वाशिंगटन ने गंभीर रूप से इस योजना पर अमल करने के लिए भूमि तैयार करना शुरू कर दी थी। 3 जनवरी को आईआरजीसी की क़ुद्स ब्रिगेड के कमांडर जनरल क़ासिम सुलेमानी और इराक़ी स्वयं सेवी बल हशदुश्शाबी के डिप्टी कमांडर की हत्या भी इसके रास्ते से सबसे बड़ी रुकावट को हटाने के तौर पर की गई थी।