भारत के केरल में सबरीमला मंदिर और कर्नाटक में बाबाबुडनगिरी दरगाह के बाद इस देश के हिंदू चरमपंथी गुट आरएसएस की नज़रें अब हज़रत ईसा मसीह की मूर्ति पर है। कर्नाटक राज्य की पिछली कांग्रेस सरकार ने बेंगलुरु से 65 किलोमीटर दूर कनकपुरा में ईसा मसीह की 114 फुट लंबी मूर्ति बनवाने के लिए 10 एकड़ ज़मीन देने का प्रस्ताव रखा था लेकिन अब जब इस राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है तो हिंदू संगठन यह मांग कर रहे हैं कि वह इस प्रस्ताव को वापस ले। चरमपंथी हिंदू संगठनों ने ईसा मसीह की प्रस्तावित मूर्ति के ख़िलाफ़ कनकपुरा में एक विशाल रैली का आयोजन भी किया। कनकपुरा रैली के महत्व को बताने के लिए भारत के कट्टरपंथी हिंदू सगंठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने कल्लडका प्रभाकर भट्ट जैसे नेता को आगे किया है। लगभग दो दशक पहले कर्नाटक के तटीय ज़िलों को 'हिंदुत्व की प्रयोगशाला' में परिवर्तित करने का श्रेय कल्लडका को ही दिया जाता है।
हिंदू संगठनों का कहना है कि किसी की भी मूर्ती को सरकारी ज़मीन पर नहीं बनाया जा सकता है। यह ऐसी स्थिति में है कि जब भारत के अधिकतर भागों में लाखों की संख्या में मूर्तियां मौजूद हैं और वह भी सरकारी संपत्तियों पर। लेकिन इन सभी प्रश्नों से इतर बीजेपी और आरएसएस के नेताओं का कहना तो कुछ और ही है। आरएसएस नेता कल्लडका का कहना है कि, "मुझे सबसे ज़्यादा दुख इस बात का है कि उन्होंने मुन्नेश्वर पहाड़ी पर 'क्रॉस' रख दिया है। यह वो जगह है जहां मुनि पूजा होती है। क्या उन्हें ईसा मसीह की मूर्ति बनाने के लिए कोई और जगह नहीं मिली? वह हमें अपमानित करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? और सरकारी ज़मीन को धार्मिक उद्देश्य के लिए कैसे दिया जा सकता है? उनके इरादे क्या हैं?"
हिंदू कट्टरपंथी आरएसएस के नेता के जवाब में चर्च के सदस्य और स्थानीय निवासी संध्यागप्पा चिन्नाराज ने कहा कि, "हम मुन्नेश्वरा पहाड़ी पर क्रॉस कैसे रख सकते हैं जबकि यह स्थान (कपालबेट्ट पहाड़ी) वहां से तीन किलोमीटर दूर है?" चिन्नाराज का कहना है कि ईसाई समुदाय उस इलाक़े में साल 1906 से रह रहा है। वह बताते हैं, "हमारी कुल आबादी लगभग 3500 लोगों की है। चिन्नाराज ने कहा कि, हमने कपालबेट्टा को चुना क्योंकि गुड फ़्राइडे को हम जीसस क्राइस्ट को सूली पर चढ़ाए जाने का नाट्य रूपांतरण यहीं पर करते हैं। उन्होंने बताया कि, कपालबेट्टा डेवलपमेंट ट्रस्ट के सदस्यों ने सस्ती क़ीमत में ज़मीन मांगने में देरी इसलिए की क्योंकि ईसाई समुदाय सरकार को देने के लिए पूरे पैसे नहीं जुटा सका।
वहीं कल्लडका प्रभाकर भट्ट का कहना है कि, "वह ईसाइयों की सेवा करके समाज सेवा करें, लेकिन वह हमारे हिंदू समाज में ऐसा क्यों कर रहे हैं? जो कुछ हो रहा है वह संविधान के ख़िलाफ़ है। उन्हें वह काम करना चाहिए जिसकी इजाज़त संविधान में हो।" भट्ट ने कनकपुरा में आयोजित रैली में ईसा मसीह की मूर्ति के निर्माण में सहयोग देने की वजह से इस क्षेत्र के कांग्रेस विधायक शिवकुमार को 'देशद्रोही' तक घोषित कर दिया। इस बारे में पूछे जाने पर कांग्रेस विधायक शिवकुमार ने कहा, "मैंने राम मंदिर बनवाया है, शिव मंदिर बनाया है और इसके अलावा सैकड़ों अन्य मंदिर बनवाए हैं, वह जो करना चाहते हैं, करने दीजिए क्योंकि वह सरकार में हैं।"
इस बीच कई जानकारों का कहना है कि, जिस भारत के संविधान में सभी धर्म के लोगों को अपने-अपने धर्म के अनुसार अपने धार्मिक कार्यों को पूरी आज़ादी के साथ अंजाम देने की अनुमित दी गई है उसी भारत में चरमपंथी हिंदू गुट नया संविधान लागू करने का प्रयास कर रहे हैं। जानकारो के अनुसार, अगर किसी सरकारी संपत्ति पर मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च नहीं बन सकता है तो कैसे उस संपत्ति पर मंदिर या किसी भगवान की मूर्ती का निर्माण हो सकता है? इस बीच कई राजनीतिक टीकाकारों का भी कहना है कि जबसे भारत में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है तबसे इस तरह के विवादों में वृद्धि देखने को मिली है। राजनीतिक टीकाकारों के मुताबिक़, एक ओर तो भारत के गृह मंत्री चीख़-चीख़ कर कह रहे हैं कि हम नागरिकता संशोधन क़ानून के तहत हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख और ईसाईयों को भारत की नागरिकता देंगे वहीं दूसरी ओर उनके चरमपंथी सहयोगी संगठन लगातार भारत के अलग-अलग धर्मों के लोगों और उनके पवित्र स्थलों को निशाना बना रहे हैं और साथ भारतीय समाज में साम्प्रदायिकता का ज़हर घोलने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। (RZ)