14 जनवरी 2020 - 19:30
क्या अमरीका अपनी सैन्य रणनीति, पश्चिमी एशिया से पूर्वी एशिया की ओर बदलना चाहता है? ईरान व प्रतिरोध के मोर्चे का भय तो कारण नहीं?

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के शासनकाल के अंत में यह विचार पेश किया गया था कि अमरीका ने अपनी नई रणनीति के तहत यह फ़ैसला किया है कि वह पश्चिमी एशिया और फ़ार्स की खाड़ी के क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति कम करेगा और इसके बजाए पूर्वी एशिया में अपने सैनिकों की संख्या और सैन्य उपस्थिति में वृद्धि करेगा।

इस विचार का आधार यह कल्पना थी कि अमरीका के लिए सबसे बड़ा ख़तरा चीन की ओर से है जो संसार की दूसरी बड़ी आर्थिक शक्ति बन चुका है और अगर यही स्थिति जारी रही तो कुछ ही समय बाद वह संसार की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति का स्थान, अमरीका से छीन लेगा। ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद यद्यपि चीन के ख़िलाफ़ अमरीका का आक्रामक रवैया बढ़ गया और कई बार दोनों के बीच भरपूर व्यापारिक युद्ध भी छिड़ चुका है लेकिन सैन्य दृष्टि से देखा जाए तो पूर्वी एशिया में किसी हद तक टकराव व तनाव में कमी आई है। इसके बजाए चीन व जापान जैसी क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धी शक्तियों ने पूर्वाक्रमण जैसी नीति अपना कर झड़प के क्षेत्र को ठीक विपरीत दिशा में और पूर्वी एशिया से पश्चिमी एशिया तक पहुंचाने की कोशिश की है और ख़तरे को अपनी सीमाओं से दूर किया है।

 

इस परिप्रेक्ष्य में चीन ने पश्चिमी एशिया व फ़ार्स की खाड़ी के क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति मज़बूत बनाने के लिए ईरान व रूस के साथ ओमान सागर व हिंद महासागर में संयुक्त सैन्य अभ्यास किए हैं और साथ ही सिल्क रोड की व्यापारिक व्यापारिक परियोजना को और विस्तृत करने की कोशिश की है जबकि जापान ने भी लगभग इसी तरह की रणनीति अपनाई है और वह ही एक युद्धक पोत फ़ार्स की खाड़ी में भेजने की कोशिश कर रहा है। जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने एक उच्च स्तरीय राजनैतिक, आर्थिक और व्यापारिक शिष्टमंडल के साथ सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात की यात्रा की है। यह दोनों ही देश, अमरीका के क्षेत्रीय घटकों में शामिल हैं।

 

यद्यपि चीन व जापान जैसी क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धी शक्तियों के रवैये में परिवर्तन पर कोरिया संकट में अपेक्षाकृत कमी के प्रभाव की अनदेखी नहीं की जा सकती लेकिन इस बात में कोई शक नहीं है कि ट्रम्प सरकार ने पश्चिमी एशिया से अपनी सैन्य उपस्थिति कम करके पूर्वी एशिया में सैन्य उपस्थिति बढ़ाने का जो फ़ैसला किया है उसमें चीन पर लगाम लगाने की आकांक्षा के साथ ही पश्चिमी एशिया में अमरीका के लिए पैदा होने वाले ख़तरों की भी अहम भूमिका है। प्रतिरोध के मोर्चे विशेष कर ईरान ने क्षेत्र के विभिन्न देशों में अमरीका व उसके घटकों विशेष कर आतंकवादियों व चरमपंथियों को करारे झटके दिए हैं उनसे उबरने में अमरीका को समय लगेगा और संभव है कि भविष्य में अधिक ख़तरों से बचने के लिए ही अमरीका इस क्षेत्र से निकलने को प्राथमिकता दे रहा है।

 

अब सवाल यह है कि अमरीका की इस नई रणनीति से उसके क्षेत्रीय घटकों विशेष कर सऊदी अरब और ज़ायोनी शासन पर क्या प्रभाव पड़ेंगे? स्पष्ट सी बात है कि ये दोनों क्षेत्र में भविष्य के संभावित टकराव की आग से अपने आपको सुरक्षित नहीं रख पाएंगे। इस समय क्षेत्र की जो स्थिति है और जो तनाव पाया जाता है उसमें सऊदी अरब और इस्राईल के सिर पर सबसे ज़्यादा ख़तरा मंडरा रहा है और अगर अमरीका इस क्षेत्र से निकल जाता है तो सऊदी अरब और ज़ायोनी शासन के लिए प्रतिरोध के मोर्चे के कड़े प्रहारों से बचना मुश्किल हो जाएगा।