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'मोहम्मद रसूल-अल्लाह' नामक फ़िल्म बनाने वालों के ख़िलाफ़ फ़तवा।

  • News Code : 710480
  • Source : एरिब.आई आर
Brief

मुम्बई में वहाबी धर्मगुरूओं के एक गुट रज़ा एकेडमी ने अंतिम ईश्वरीय दूत पैग़म्बरे इस्लाम के जीवन पर ‘मोहम्मद रसूल-अल्लाह’ नामक फ़िल्म बनाने के लिए फ़िल्म डॉयरेक्टर मजीद मजीदी और ऑस्कर विजेता ए आर रहमान के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी किया है।

मुम्बई में वहाबी धर्मगुरूओं के एक गुट रज़ा एकेडमी ने अंतिम ईश्वरीय दूत पैग़म्बरे इस्लाम के जीवन पर ‘मोहम्मद रसूल-अल्लाह’ नामक फ़िल्म बनाने के लिए फ़िल्म डॉयरेक्टर मजीद मजीदी और ऑस्कर विजेता ए आर रहमान के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी किया है।
27 अगस्त को ईरान और कनाडा में एक साथ रिलीज़ होने वाली ईरान की अब तक की सबसे बड़े बजट की फ़िल्म को लेकर रज़ा एकेडमी ने यह फ़तवा ऐसी स्थिति में जारी किया है कि जब आलोचकों और और दर्शकों ने फ़िल्म निर्माता के प्रयासों को काफ़ी सराहा है और उनका कहना है कि इस फ़िल्म द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम के जीवन की सही तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई है।
ख़ुद मजीदी ने कहा था कि पश्चिम में पैग़म्बरे इस्लाम के ख़िलाफ़ अपमानजनक फ़िल्में बनने और सामग्री प्रकाशित करने के जवाब में उन्होंने यह फ़िल्म बनाने का फ़ैसला किया था और वरिष्ठ मुस्लिम धर्मगुरूओं द्वारा इस फ़िल्म की कहानी की पुष्टि के बाद ही उन्होंने यह क़दम उठाया है।
मोहम्मद रसूल-अल्लाह फ़िल्म में पैग़म्बरे इस्लाम के जन्म से 12 वर्ष की आयु तक की घटनाओं को दर्शाया गया है। जिसके अभी दो भाग और आने बाक़ी हैं। फ़िल्म बनाने पर लगभग 253 करोड़ रुपए ख़र्च किए गए हैं।
रज़ा एकेडमी ने पिछले सप्ताह भी भारत के गृह मंत्री को एक पत्र लिखकर इस फ़िल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। एकेडमी का कहना है कि इस फ़िल्म द्वारा इस्लाम का मज़ाक़ उड़ाया है और इसमें प्रोफ़ेशनल एक्टर्स ने रोल किए हैं, जिनमें कुछ ग़ैर मुस्लिम भी हैं। इसलिए जिन मुसलमानों ने इसमें भूमिका निभाई है, विशेष रूप से मजीदी और रहमान, काफ़िर हो गए हैं और उन्हें फिर से कलमा पढ़ने और निकाह करने की ज़रूरत है। हालांकि,  इस फ़्लिम में पैग़म्बरे इस्लाम (स) का रोल करने वाले एक्टर का चेहरा नहीं दिखाया गया है। सिर्फ़ परछाई ही दिखाई गई है।
जानकार सूत्रों का कहना है कि इस प्रकार के फ़तवे सऊदी अरब और उसके वफ़ादार कट्टरपंथी विचारधारा रखने वाले गुटों की ओर से दिए जा रहे हैं, ताकि ईरान की ओर से उठाए जाने वाले हर क़दम का विरोध किया जा सका।
यह ऐसी स्थिति में है कि जब कई मुस्लिम विद्वानों ने फ़िल्म का विरोध करने वालों से यह भी पूछा है कि जब पैग़म्बरे इस्लाम या इस्लाम विरोधी फ़िल्में बनाई जाती हैं, तो वे कहां छुपे बैठे होते हैं और वे इसके मुक़ाबले के लिए कौन से क़दम उठाते हैं?


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