सऊदी अरब के शियों पर हो रहे अत्याचार की एक रिपोर्ट।

  • News Code : 693560
  • Source : अबना
Brief

सऊदी अरब के पूर्वी प्रांत जिसका नाम दम्माम है तेल की दौलत से मालामाल है इसी क्षेत्र में सऊदी अरब की सबसे बड़ी शिया आबादी रखती है। क़तीफ़ जो कि दम्माम प्रांत का सबसे बड़ा शिया क्षेत्र है, सऊदी अरब के तेल भंडार सबसे ज़्यादा क़तीफ में हैं .... यहीं से तेल पाइपलाइन रियाद भी जाती है। दूसरा क्षेत्र अलएहसा है यहां की कुल आबादी में शिया 70% हैं ..... दम्माम शहर में शियों की संख्या बहुत ज़्यादा है।

कुछ समय से सऊदी अरब में रह रहा हूं। सऊदी अरब आने से पहले यहां शियों के रोज़गार ... अर्थव्यवस्था और राजनीतिक हालात के बारे में जानकारी न होने के बराबर थी ... लेकिन यहां आने के बाद करीब से देखा ..... सऊदी अरब के मोमेनीन के साथ काम करने का मौका मिला ... उनकी मजलिसों, महफ़िलों और समारोहों और निजी प्रोग्रामों में हिस्सा लिया तो सच्चाई का पता चला।
सऊदी अरब के पूर्वी प्रांत जिसका नाम दम्माम है तेल की दौलत से मालामाल है इसी क्षेत्र में सऊदी अरब की सबसे बड़ी शिया आबादी रखती है। क़तीफ़ जो कि दम्माम प्रांत का सबसे बड़ा शिया क्षेत्र है, सऊदी अरब के तेल भंडार सबसे ज़्यादा क़तीफ में हैं .... यहीं से तेल पाइपलाइन रियाद भी जाती है। दूसरा क्षेत्र अलएहसा है यहां की कुल आबादी में शिया 70% हैं ..... दम्माम शहर में शियों की संख्या बहुत ज़्यादा है।
तेल की दौलत से मालामाल यह क्षेत्र कहने को तो शिया क्षेत्र है ... लेकिन इस क्षेत्र के शियों और सऊदी अरब के अन्य क्षेत्रों अलएहसा... मदीना और नजरान व जज़ान के शिया इस देश का सबसे गरीब और पिछड़ा वर्ग हैं। बंगाली भारतीय और पाकिस्तानी मजदूरों की तरह कारखानों में काम करते हैं। विदेशों के अधिकारियों और सुपरवाईज़रों की जली कटी सुनते है, उनके साथ जो व्यवहार किया जाता है वह तो बताने के लायक भी नहीं है ... उनके वेतन में और बाहरी मजदूरों के वेतन में आमतौर पर एक या दो हज़ार रियाल तक का ही अंतर पाया जाता है और बस....
शिक्षा के एतबार से भी यहां के शियों की हालत बहुत ख़राब है.... सऊदी अरब में शिया एकमात्र वह वर्ग है जो पढ़ाई लिखाई से मुहब्बत करता है .... लेकिन क़तीफ के एक लाख शिया आबादी के लिए एक यूनिवर्सिटी भी नहीं है। दूसरे क्षेत्रों के विश्वविद्यालयों में भी उन्हें एडमीशन मुश्किल से ही दिया जाता है...
बहुत कम ऐसे क्षेत्र हैं जहां विश्वविद्यालय और कॉलेज न हों मगर क़तीफ में कॉलेज और यूनिवर्सिटी बनना असंभव है। अगर शिया दूसरे क्षेत्र की किसी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने जाएं तो उल्टे सीधे सवाल पूछ कर उन्हें टरख़ा दिया जाता है।
मजबूरन विदेश जाकर पढ़ाई लिखाई करते हैं। मगर जिनकी आर्थिक स्थिति अनुमति नहीं देती वह विदेश भी नहीं जा सकते हैं ... फिर भी दम्माम के सभी सरकारी मुख्य पदों पर क़तीफ़ के मोमेनीन हैं .... आरामको में भी जो कि सऊदी तेल और गैस की संस्था है, शिया अधिकारियों मौजूद हैं लेकिन प्रतिशत व शिया आबादी के हिसाब से उनकी संख्या बहुत कम हैं। बहुत समय तक शिया क्षेत्र जनसुविधाओं से भी वंचित रहे.... सड़कों और गलियों की भी स्थिति बहुत बुरी थी, शाह अब्दुल्लाह के दौर में ही कुछ निर्माण कार्य और सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं।
अलएहसा के शियों की तुलना में क़तीफ के शिया राजनीतिक मामलों में बहुत सक्रिय हैं और सऊदी सरकार के किसी भी अन्याय को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते इसलिए आए दिन शिया जवानों और पुलिस में झड़पें होती रहती हैं लेकिन कभी मीडिया में नहीं आती हैं। हालत यह है की क़तीफ़ के शिया बहुत ही बहादुर और निडर हैं कभी पुलिस और सेना को कुछ नहीं समझते हैं....... क़तीफ का एक छोटा क्षेत्र जिसका नाम अवामिया है बहादुरी और साहस में वही स्थान रखता है जो इमाम मूसा सद्र के दौर में बअलबक के शियों का लेबनान में स्थान था.... अवामिया के शिया पूरे सऊदी अरब में अपनी बहादुरी और साहस के कारण प्रसिद्ध हैं।
कोई दिन ऐसा नहीं जाता जिस दिन अवामिया का कोई जवान पुलिस के हाथों शहीद न हो और कोई पुलिस वाला इन जवानों के हाथों जहन्नम में न जाये। उनके रोब का हाल यह है कि क़तीफ में पुलिस स्टेशन न होने के बराबर है। यहां तककि पुलिस क़तीफ और अवामिया के क्षेत्रों में प्रवेश भी नहीं करती है। क्षेत्र के आंतरिक मार्गों पर बख्तरबंद वाहनों के साथ पुलिस मोर्चा बनाकर आने जाने वाले लोगों की जाँच करती है और अगर किसी जवान के साथ पुलिस की मुठभेड़ हो जाए तो यह भूखा नंगा शेर पिस्तौल निकालकर सिर में गोली मार कर निकल जाता है या अगर पुलिस के हाथ लग जाए तो मार दिया जाता है,
वरना पुलिस किसी न किसी जवान को मार के हिसाब बराबर जरूर कर लेती है, जब कभी किसी बड़े मुजाहिद को पकड़ना पड़े तो वाहनों के बजाये हेलिकॉप्टर के माध्यम से कमांडो घर में उतारे जाते हैं और वांटेड जवान को उठाकर ले जाते हैं, ऐसे बहुत से जवान सालों से सऊदी जेलों में बंद हैं या वहीं दम तोड़ चुके हैं जो एक बार गया बस वापस नहीं आया। सऊदी अरब और बहरैन के शियों के बीच गहरे संबंध हैं, उनके बीच रिश्तेदारियां भी हैं, धार्मिक और परिवारिक रिश्तों की वजह से यह सरकारों की ओर से किए जाने वाले अत्याचारों में एक दूसरे का भरपूर साथ भी देते हैं, एक दूसरे के लिए विरोध प्रदर्शन भी करते हैं।
यहां के शियों पर जितने अत्याचार ज़्यादा हो रहे हैं उससे कहीं ज्यादा वह आपस में एकजुट हैं। अज़ादारी, मज़हबी प्रोग्रामों और राजनीतिक मुद्दों में सब एक ज़बान और एक जान हैं। उलमा का बहुत ही सम्मान करते हैं और उलमा भी अपनी क़ौम और ज़िम्मेदारी के प्रति बेहद ईमानदार हैं। किसी भी मामले में उलमा की निगाह पहला और अंतिम फैसला माना जाता है। उलमा के निर्णय और राय पर बच्चे से लेकर बूढ़े तक बिना किसी सवाल जवाब के अमल करते हैं। जहाँ कहीं भी आलिम देख लेंते हैं बढ़कर अमामा चूम लेते हैं।
और उलमा भी अपना अमामा उनके आगे झुका देते हैं ताकि इमाम की निशानी को चूम सकें। हुकूमतों और राजाओं के सताए हुए इस शिया समुदाय पर जो अत्याचार होते चले आ रहे हैं उनमें पिछले दो सप्ताहों में एक नई आपदा, आतंकवाद की आन पड़ी है। बहुत दिनों से यह समाचार आ रहे थे कि इराक़ के बाद आईएस के अत्याचार का निशाना क़तीफ के शिया होंगे, मगर यह निडर क़ौम चिल्ला चिल्ला के कह रही है कि जिस आतंकवादी का जी चाहे वह आ जाए और हमें आज़मा ले, पिछले शुक्रवार को भी क़तीफ की जामा मस्जिद इमाम अली अ. में एक आत्मघाती विस्फोट हुआ जिससे तीस मोमेनीन शहीद हो गए, मोमेनीन के जनाज़ों पर लाखों शिया बहरैन और सऊदी अरब से शरीक हुये जिसमें आईएस के फर्जी इंसानी मॉडल बनाकर गली गली, गले में रस्सियां डालकर फिराया गया।
विस्फोट की जिम्मेदारी आईएस ने स्वीकार करते हुए धमकी दी कि यह तो एक धमाका हुआ है अब और टनों के हिसाब से बारूवी वाहनों के माध्यम से हमले किए जाएंगे, जिसकी वजह से क्षेत्र में भय और दहशत है, मगर शिया मस्जिदों और इमाम बारगाहों में संख्या पहले से ज्यादा होती है, कुछ समय पहले भी दम्माम शहर की जामा मस्जिद के बाहर कार पार्किंग में विस्फोट हुआ जिससे कई मोमेनीन शहीद और कई घायल हुये हैं। सूचना के अनुसार एक कार में बम फिट किया गया था कि समय से पहले ही फट जाने के कारण ज़्यादा लोग हताहत नहीं हुये हैं, मस्जिद में ख़ुत्बा जारी था और बाहर ब्लास्ट हुआ।
मस्जिद में मौजूद सभी नमाज़ी एकसाथ दुरूद पढ़ते हुये और लब्बैक या हुसैन कहते हुये नारे लगाने लगे, इमामे जुमा ने कहा कि आप हुसैन के शिया हैं यह हमारे लिए कोई नई बात नहीं है। बस यह सुनना था कि सब बैठ गए और विस्फोट के चालीस सेकंड बाद फिर से ख़ुत्बा शुरू हो गया, शिया स्वंयसेवी कार विस्फोट की जगह पर प्रशासनिक मामलों में व्यस्त रहे और नमाज़ पढ़ने के बाद इमामे जुमा के आदेशानुसार अपने घरों को भेज दिए गए, मजाल है कोई एक व्यक्ति भी किसी रास्ते या चौराहे पर खड़ा हुआ हो।
इन सभी परिस्थितियों के बावजूद सऊदी अरब के शिया मजबूत इरादे और हौसले के साथ अपने रौज़ाना के कामों में व्यस्त भी हैं और अपनी शरई और राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं। और उन्हें विश्वास है कि जल्द से जल्द उनके मुश्किल दिन ख़त्म होने वाले हैं।


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