यूरोप और उत्तरी अमेरिकी देशों के युवाओं के नाम, आयतुल्लाह ख़ामेनई का संदेश।

इस्लाम को इस्लामी स्रोतों से पहचानिये।

  • News Code : 667326
  • Source : abna
Brief

फ्रांस की हालिया घटनाओं और कुछ अन्य पश्चिमी देशों में घटित होने वाली ऐसी ही घटनाओं ने मुझे इस नतीजे पर पहुंचाया कि आपसे डायरेक्ट बातचीत करना चाहिए। मैं आप जवानों को संबोधित कर रहा हूँ,इसलिए नहीं कि आपके माँ, बाप की उपेक्षा कर रहा हूँ,बल्कि इसलिए कि आपके देश और राष्ट्र का भविष्य आपके हाथों में देख रहा हूं तथा आपके दिलों मैं वास्तविकता को समझने की जिज्ञासा बहुत ज़्यादा है और आपमें अधिक जागरूक पाई जाती है। इस संदेश में मेरा सम्बोधन आपके राजनीतिज्ञों और सरकारी अधिकारियों से नहीं है क्योंकि मेरा यह मानना है कि उन्होंने राजनीति के रास्ते को जान बूझ कर हक़ और सच्चाई से अलग कर दिया है।

सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई ने यूरोप और उत्तरी अमेरिका के युवाओं के नाम एक संदेश,भेजा है। सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई ने अपने इस संदेश में लिखा कहा है कि फ्रांस और कुछ अन्य यूरोपीय देशों में घटने वाली घटनाओं ने मुझे इस बात पर मजबूर किया है कि डायरेक्ट आप सबसे बातचीत करूं।

सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई के संदेश का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया जा है।

بسم‌ الله الرّحمن الرّحیم

यूरोप और उत्तरी अमेरिका के सभी युवाओं के नाम,

फ्रांस की हालिया घटनाओं और कुछ अन्य पश्चिमी देशों में घटित होने वाली ऐसी ही घटनाओं ने मुझे इस नतीजे पर पहुंचाया कि आपसे डायरेक्ट बातचीत करना चाहिए। मैं आप जवानों को संबोधित कर रहा हूँ,इसलिए नहीं कि आपके माँ, बाप की उपेक्षा कर रहा हूँ,बल्कि इसलिए कि आपके देश और राष्ट्र का भविष्य आपके हाथों में देख रहा हूं तथा आपके दिलों मैं वास्तविकता को समझने की जिज्ञासा बहुत ज़्यादा है और आपमें अधिक जागरूक पाई जाती है। इस संदेश में मेरा सम्बोधन आपके राजनीतिज्ञों और सरकारी अधिकारियों से नहीं है क्योंकि मेरा यह मानना है कि उन्होंने राजनीति के रास्ते को जान बूझ कर हक़ और सच्चाई से अलग कर दिया है।

आपसे मुझे इस्लाम के बारे में बात करनी है और विशेष रूप से इस्लाम की छवि और ईमेज के बारे में जो आपके सामने पेश की जाती है। पिछले दो दशकों से इस तरफ यानी लगभग सोवियत संघ की पतन के बाद से बहुत ज़्यादा प्रयास हुये कि इस महान दीन को भयानक दुश्मन के रूप में पेश किया जाए।

डर व नफ़रत की भावनाओं को उभाना और फिर उससे लाभ उठाना,दुर्भाग्यवश पश्चिम के राजनीतिक इतिहास में बहुत पहले से चला आ रहा है। यहां विभिन्न तरह के आतंकों के बारे में बात करना हमारा मक़सद नहीं है जिसके बारे में अब तक पश्चिमी राष्ट्रों को हिदायत दी जाती रही है। आप खुद ही हालिया इतिहास का संक्षिप्त अध्ययन करके इस नतीजे पर पहुंच जाएंगे कि हालिया हिस्टोरियोग्राफ़ी में,दुनिया के अन्य देशों और संस्कृतियों के साथ पश्चिमी सरकारों के झूठे और धोखे पर आधारित व्यवहार की निंदा की गई है। यूरोप और अमेरिका का इतिहास गुलामों की बिक्री से शर्मसार है,साम्राज्यवाद के कारण शर्मिंदा है,नस्लवाद और गैर ईसाइयों पर किए जाने वाले अत्याचारों के कारण लज्जित है,आपके शोधकर्ता और इतिहासकार धर्म के नाम पर कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट ईसाइयों के बीच या पहली और दूसरी वर्ल्ड वॉर में राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता के नाम पर होने वाले खून ख़राबे पर बहुत ज़्यादा शर्मिंदगी व्यक्त करते हैं। यह बात अपनी जगह पर सराहनीय है।

इस लंबी सूची का कुछ हिस्सा सामने लाने से मेरा उद्देश्य इतिहास की निंदा करना नहीं है,बल्कि आपसे अनुरोध करते हैं कि अपने प्रबुद्ध और उदारवाद लोगों से सवाल करें कि आखिर पश्चिम में जनता की अंतरात्माएं कुछ दशकों और कभी कभी कुछ शताब्दियों की देरी से क्यों जागती और होश में आती हैं?

सार्वजनिक अंतरात्मा के अंदर संशोधन की सोच समकालीन मुद्दों के बजाय क्यों अतीत पर केंद्रित है?इस्लामी विचारधारा और संस्कृति के संबंध में जीवन व्यवहार के महत्वपूर्ण मुद्दे में क्यों आम जानकारी और मालूमात पर रोड़े अटकाये जाते हैं?

आप अच्छी तरह जानते हैं कि दूसरों के बारे में काल्पनिक डर व नफरत फैलाना और उनका अपमान,सभी क्रूर साम्राज्यवादी और शोषण करने वाली हुकूमतों का संयुक्त षड़यंत्र रहा है। मैं चाहता हूँ कि आप खुद से यह सवाल करें कि डर पैदा करने और नफरत फैलाने की पुरानी नीति ने इस बार असाधारण तीव्रता के साथ इस्लाम और मुसलमानों को निशाना क्यों बनाया है?आज की दुनिया का ताक़त का सिस्टम क्यों चाहता है कि इस्लामी सोच साइड और प्रतिरक्षा की हालत में रहे?इस्लाम के कौन से मूल्य और सिद्धांत हैं कि जो बड़ी शक्तियों की परियोजनाओं के रास्ते में रूकावट बन रहे हैंऔर इस्लाम की छवि को बिगाड़ने व विकृत करने की आड़ में कौन से हित हासिल किए जा रहे हैं?तो मेरा पहला अनुरोध यह है कि व्यापक रूप से इस्लाम की छवि विकृत करने की प्रेरणाओं के बारे में सवाल और रिसर्च कीजिये।

दूसरा अनुरोध यह है कि जहरीले प्रचार और नकारात्मक भेदभाव के तूफान के मुक़ाबले में आप इस धर्म की डायरेक्ट और बिना किसी माध्यम से जानकारी हासिल करने की कोशिश करें। बुद्धि की मांग है कि कम से कम आपको इतना मालूम हो कि जिस चीज़ से आपको दूर और भयभीत किया जा रहा है,वह क्या है और इसकीबनावट क्या है?मेरा यह आग्रह नहीं है कि आप इस्लाम के बारे में मेरी राय या किसी और नज़रिये को स्वीकार कीजिए लेकिन मैं यह कहना चाहता हूँ कि यह अवसर न दीजिए कि आजकी दुनिया की यह संपूर्ण विकासशील और प्रभावी सच्चाई,दूषित लक्ष्यों और उद्देश्यो के साये में आपके सामने पेश की जाए। इस बात का अवसर न दीजिए कि ख़रीदे हुये आतंकवादियों को मक्कारी से इस्लाम के प्रतिनिधियों के रूप में आपके सामने पेश किया जाए। इस्लाम को उसके वास्तविक स्रोतों के माध्यम पहचानिये। कुरआन और पैगंबर मोहम्मद स.अ की ज़िंदगी के माध्यम से इस्लाम के बारे में जानिये। मैं यहाँ यह पूछना चाहूंगा कि क्या अब तक कभी आपने मुसलमानों के कुरआन से सीधा संपर्क किया है?क्या पैगंबर मोहम्मद स.अ. की शिक्षाओं और आपकी मानवीय और नैतिक उपदेशों का अध्ययन किया है?क्या कभी मीडिया के अलावा अन्य स्रोतों से भी इस्लाम का संदेश हासिल किया है?क्या कभी अपने आपसे यह सवाल किया है कि यही इस्लाम आख़िर कैसे और किन मूल्यों के आधार पर कई शताब्दियों से दुनिया की सबसी बड़ी वैज्ञानिक व वैचारिक व्यवस्था का प्रशिक्षण कर रहा है और उसने उच्च स्तर के विचारकों और विद्वानों का प्रशिक्षण किया है?

मैं आपसे चाहता हूँ कि यह अवसर न दीजिए कि अपमानजनक और गलत छवि पेश करके लोग सच्चाई और आपके बीच भावनाओं की दीवार खड़ी कर दें और आपको निष्पक्ष फ़ैसले की संभावना से वंचित कर दें। आज संचार सूत्रों ने भौगोलिक सीमाओं को तोड़ दिया है तो आप खुद को मानसिक स्तर पर बना दी जाने वाली फर्जी व काल्पनिक सीमाओं में सीमित न होने दीजिए। हालांकि कोई भी व्यक्तिगत रूप से इस खाई को भर नहीं सकता जो पैदा कर दी गई है,लेकिन आप में से हर कोई खुद को और अपने आसपास के व्यक्तियों को वास्तविकता से अवगत कराने के उद्देश्य से इस खाई पर चिंता व न्याय का एक पुल जरूर बना सकता है।

इस्लाम और आप युवाओं के बीच यह चुनौती जिसकी पहले से योजना बनाई गई है,निश्चित रूप से भयानक है मगर आप खोज और जिज्ञासा से भरे मन में नए सवाल पैदा कर सकती है। इन सवालों के जवाब की तलाश,आपके सामने नए तथ्यों के खुलासे का अवसर प्रदान करेगी। इसलिये इस्लाम की निष्पक्ष मालूमात और सही पहचान के इस अवसर को हाथ से जाने न दीजिए ताकि शायद वास्तविकता के बारे में आपकी जिम्मेदाराना कार्यवाही की बरकत से आगामी पीढ़ियां इस्लाम के संबंध में पश्चिम के व्यवहार के इतिहास के इस दौर को आहत हुये बिना फ़िक्री व मानसिक आराम के साथ दर्ज करें।

सैयद अली ख़ामेनई

(21जनवरी 2015)


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