इराक़ में दाइश के भयानक आतंकी अपराध।

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Brief

मशहूर सुन्नी आलिम मुफ़्ती अमीनी ने कहा है कि दाइश के इस गुट का अहलेसुन्नत वल- जमाअत से कोई वास्ता नहीं है। जब भी फ़ौज कहेगी हम अमामा उतार कर फ़ौजी वर्दी पहन कर इन मुल्क व क़ौम के दुश्मनों से जेहाद करेंगे।

मौलाना सैयद मुहम्मद जाबिर जौरासी

एडीटर मासिक इस्लाह लखनऊ

जून 2014 के शुरू में उस समय इराक़ में क़यामत टूट पड़ी जब अलक़ायदा की एक शाख़ा और बअसियों के गुट पर आधारित आतंकवादी संगठन, दौलते इस्लामिया अल-इराक़ व शाम (दाइश) आई एस आई एस के हज़ारों आतंकवादियों ने अचानक सामर्रा पर हमला कर दिया। वहाँ बहुमत में सुन्नी आबादी ने उनका साथ नहीं दिया और फ़ौज ने उन्हें हारने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने रूख़ मोड़ कर नैनवा प्रांत के राजधानी मूसल पर क़ब्ज़ा कर लिया। सद्दाम के वतन तिकरित पर भी उनका क़ब्ज़ा हो गया और कुछ दूसरे क़स्बे और इलाक़े उनके क़ब्ज़े में आ गये। अब वह राजधानी बग़दाद और इराक़ के पवित्र शहरों पर क़ब्ज़ा और उनको बर्बाद करने का इरादा किये हुये हैं।
बहुमत में होने के बावजूद सद्दाम के शासनकाल में शियों को इस क़द्र दबा कर रखा गया था कि न वह पुलिस में थे न फ़ौज में हथियार उठाने का उन्हें अनुभव ही था। नूरी मालिकी हुकूमत ने शियों को फ़ौज में भर्ती तो किया लेकिन वह ज़्यादा अनुभवी नहीं थे इसलियेs अमरीका के कहने पर कुछ सद्दामी फ़ौज के अधिकारियों को फ़ौज के पुनर्गठन में शामिल कर लिया गया। जिन्होंने मौजूदा नाज़ुक समय में ग़द्दारी की। जहाँ हथियारों का भंडार था वहाँ गोला बारूद नहीं था और जहाँ गोला बारूद था वहाँ अधिकारियों ने हथियारों का इंतेज़ाम नहीं किया था। ऐसे में दाइश ने जब हमला किया तो अफ़रा तफ़री फैल गई और अनुभवहीन फ़ौजी हार गये।
ऐसे में आयतुल्लाहिल उज़्मा सीस्तानी ने फ़त्वा सादिर किया कि इन हालात में जेहाद वाजिबे केफ़ाई है, जनता फ़ौज का साथ दे। उनके इस फ़त्वे का ऐलान इमाम हुसैन अ.ह के हरम के ज़िम्मेदार और इमामे जुमा हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन अब्दुल महदी कर्बलाई ने फ़ौजी लिबास पहन करके किया। हकीम परिवार के जवान आलिम अम्मारूल हकीम और दूसरे उल्मा मैदान में आ गये जनता में जोश पैदा हुआ और अगरचे फ़ौजी प्रशिक्षित नहीं फिर भी उन्होंने दाइश की प्रगति को काफ़ी हद तक रोका। वास्तव में पूरी दुनिया के अहलेबैत अ. के चाहने वालों में शदीद बेचैनी पैदा हो गई है और वह इस गंभीर समस्या में अपनी जान व माल की बाज़ी लगाने पर पूरी तरह तैयार हैं। दाइश ने जो अपना दस प्वाइंट पर आधारित ऐजेंडा पेश किया उसकी नवां ऐजेंडा यह है।
मज़ारों और क़ब्रों पर हमारी पोज़ीशन स्पष्ट है। सभी को ध्वस्त कर दिया जायेगा।
यह बात किसी भी सूरत में बर्दाश्त करने के क़ाबिल है ही नहीं, हुकूमतें आती जाती रहती है लेकिन ऐसे दुस्साहस का इरादा करने वाला हुकूमत की कल्पना भी न करे। यह निंदनीय इरादा तो सद्दामी हुकूमत भी न कर सकी जिसके दौर में क्या क्या अत्याचार न हुये।

इराक़ में डेमोक्रेसी है इलेक्शन के बाद हुकूमत बनती है लेकिन चूंकि वहाँ शिया बहुमत में हैं इसलिये हुकूमत में भी उनकी बहुमत होती है और शिया प्रधानमंत्री होता है जबकि हुकूमत में अहलेसुन्नत भी नियमित रूप से शरीक हैं। इराक़ के राष्ट्रपति जलाल तालेबानी सुन्नी हैं, उप राष्ट्रपति तारेक़ुल हाशमी थे जो सुन्नी हैं लेकिन जब यह साबित हो गया कि सामर्रा के धमाके में तारेक़ुल हाशमी का निश्चित रूप से हाथ था तो नूरी मालिकी ने उसकी गिरफ़्तारी का हुक्म दिया और वह बग़दाद से फ़रार हो कर तुर्की में पनाह लिये है। मौजूदा इराक़ी पार्लियामेंट का स्पीकर सुन्नी उसामा नजीफ़ी था जिसकी मुल्क के विरूद्ध ग़द्दारी साबित हो गई तो वह तुर्की फ़रार कर गया। 15 जून को उसकी पार्लियामेंट की सदस्यता ख़त्म कर दी गई और उसे पद से हटा दिया गया, उसी का भाई है अशीसल नजीफ़ी जो मूसल का गवर्नर था 26 हज़ार फ़ौज और पुलिस उसके अधिकार में थी लेकिन उसने बिना किसी प्रतिरोध के मूसल को दाइश के हवाले कर दिया। इसी तरह मूसल के मेयर ने दाइश से भारी रक़म लेकर शहर पर उनको क़ब्ज़ा दे दिया। और ख़ुद नार्वे फ़रार हो गया। क्या यह स्थिति ध्यान देने योग्य नहीं?

यह नहीं कहा जा सकता कि सारे अहलेसुन्नत आतंकवादी होते है या अहलेबैत अ. के दुश्मन होते हैं। लेकिन यह आतंकवादी ख़ुद को अहलेसुन्नत ज़रूर ज़ाहिर करते हैं। और मीडिया भी सुन्नी आतंकवादी की तकरार कर रहा है। ऐसे में प्रमुख सुन्नी उल्मा की क्या ज़िम्मेदारी होना चाहिये, वह जानें। लेकिन ऐसे अवसर पर शिया मरजा-ए-तक़लीद आयतुल्लाहिल उज़्मा सीस्तानी ने जो काम किया है वह सुनहरे अक्षरों से लिखे जाने के क़ाबिल है। 2006 में जब आतंकवादियों ने सामर्रा में रौज़ए अस्करीऐन के गुम्बद को डाइनामाइट से उड़ा दिया है तो पूरी दुनिया में सख्त आक्रोश पैदा हो गया था और इराक़ में यह ख़तरा पैदा हो गया था कि सुन्नियों और शियों के बीच ख़ून ख़राबा शुरू हो जाये लेकिन आयतुल्लाहिल उज़्मा सीस्तानी के इस हुक्म के बाद कि शिया अहलेसुन्नत पर किसी भी सूरत में हमला न करें, इराक़ में शिया सुन्नी दंगा कराने के षड़यंत्र नाकाम हो गये।
लेकिन ऐसा तरीक़ा सऊदी अरब, बहरैन, पाकिस्तान आदि में इख़्तियार नहीं किया जाता। अभी हाल ही में सऊदी अरब में शियों के बड़े आलिम आयतुल्लाह शेख़ बाक़ेरुन नम्र को उनके 26 साथियों के साथ सऊदी अदालत ने सज़ा-ए-मौत सुनाई है। जबकि सब जानते हैं कि उन लोगों ने मुल्क में कोई काम हुकूमत के विरूद्ध नहीं किया था बल्कि हुकूमत से अपने अधिकारों की मांग की थी। उन लोगों को अदालत ने अपना वकील तक करने की इजाज़त नहीं दी। सऊदी अरब की हुकूमत ने अपनी पॉलीसी पर अमल करते हुये कहा नूरी मालिकी हुकूमत ने चूंकि अहलेसुन्नत को किनारे लगा दिया था इसलिए दाइश का आतंकी हमला हुआ। यह काम तो ख़ुद सऊदी अरब और उसकी हुकूमत के इशारे पर बहरैनी हुकूमत बहरैन के शियों के साथ कर रही है लेकिन दोनों को मालूम है कि प्रतिक्रिया में आतंकी हमले नहीं होंगे इसलिए कि शिया मज़हब में आतंकवाद की कोई कल्पना नहीं है।
अल-मुस्लेमा वेबसाइट के अनुसार सऊदी अरब के 150 इंटेलीजेंस कर्मचारी सीरिया में अल-हस्क़ा प्रांत से इराक़ में दाख़िल हुये हैं। दूसरी सूचना के अनुसार हज़ारों सऊदी अधिकारियों इराक़ में मौजूद हैं। इराक़ में डेमोक्रेसी है इलेक्शन के बाद हुकूमत बनती है लेकिन चूंकि वहाँ शिया बहुमत में हैं इसलिये हुकूमत में भी उनकी बहुमत होती है और शिया प्रधानमंत्री होता है जबकि हुकूमत में अहलेसुन्नत भी नियमित रूप से शरीक हैं। इराक़ के राष्ट्रपति जलाल तालेबानी सुन्नी हैं, उप राष्ट्रपति तारेक़ुल हाशमी थे जो सुन्नी हैं लेकिन जब यह साबित हो गया कि सामर्रा के धमाके में तारेक़ुल हाशमी का निश्चित रूप से हाथ था तो नूरी मालिकी ने उसकी गिरफ़्तारी का हुक्म दिया और वह बग़दाद से फ़रार हो कर तुर्की में पनाह लिये है। मौजूदा इराक़ी पार्लियामेंट का स्पीकर सुन्नी उसामा नजीफ़ी था जिसकी मुल्क के विरूद्ध ग़द्दारी साबित हो गई तो वह तुर्की फ़रार कर गया। 15 जून को उसकी पार्लियामेंट की सदस्यता ख़त्म कर दी गई और उसे पद से हटा दिया गया, उसी का भाई है अशीसल नजीफ़ी जो मूसल का गवर्नर था 26 हज़ार फ़ौज और पुलिस उसके अधिकार में थी लेकिन उसने बिना किसी प्रतिरोध के मूसल को दाइश के हवाले कर दिया। इसी तरह मूसल के मेयर ने दाइश से भारी रक़म लेकर शहर पर उनको क़ब्ज़ा दे दिया। और ख़ुद नार्वे फ़रार हो गया। क्या यह स्थिति ध्यान देने योग्य नहीं?
इराक़ में इलेक्शन हो चुका है लेकिन अभी हुकूमत नहीं बनी है। आयतुल्लाह सीस्तानी ने ऐसी हुकूमत बनाने का हुक्म दिया है जिसमें सब की उचित भागीदारी हो।
पिछले साल जून 2013 में इमाम हुसैन अ. के रौज़े और हज़रत अब्बास अ. के रौज़े की ओर से होने वाले सालाना जश्न रबीउश्शहादत में मैं भी शरीक था उसमें 52 देशों के सुन्नी शिया और ग़ैर मुस्लिम प्रतिनिधि शरीक थे। इराक़ से बसरा के वरिष्ठ सुन्नी आलिम व वक्ता जमालुल वेसरी भी थे उन्होंने अपनी जोशीली स्पीच में आयतुल्लाहिल उज़्मा सीस्तानी की मुसलमानों में एकता व गठबंधन की गंभीर कोशिशों की प्रशंसा करते हुये उनके एक बयान का हवाला दिया। जो उनकी वेबसाइट पर भी मौजूद है और उसका एक हिस्सा इस्लाह लखनऊ के मोहर्रम न. 1435 के पेज 7 पर मौजूद है। यह बयान नजफ़ अशरफ़ इराक़ में 28 नवम्बर 2007 को सुन्नी शिया साझा कॉनेफ़्रेंस में पढ़ा गया। बयान यह है।
शियों को चाहिये के सुन्नियों के समाजिक व राजनीतिक अधिकारों की ख़ुद उनसे पहले प्रतिरक्षा करें। मेरा सम्बोधन गठबंधन व एकता की दावत है और मैं हमेशा यह कहता रहूंगा कि यह न कहो कि अहलेसुन्नत हमारे भाई हैं बल्कि अहलेसुन्नत हमारी जान हैं।
बहुत से इस संदेश की सच्चाई के सिलसिले में दुविधा में थे लेकिन आज जब दाइश ने इराक़ पर आक्रमक हमला किया तो इस बयान के नतीजे ज़ाहिर हुए, सामर्रा की सुन्नी आबादी ने उनका साथ नहीं दिया, मूसल में दाइश के दाख़िल होने के बाद वहाँ अहलेसुन्नत उल्मा की एक तादाद ने उनके तकफ़ीरी दृष्टिकोण के विरोध के नतीजे में मूसल में ग्यारह सुन्नी उल्मा को क़त्ल कर दिया गया। जिनमें मूसल में सुन्नी जामा मस्जिद के इमाम भी शामिल हैं। उनका जुर्म केवल दाइश के आगे नमस्तक न होना था। उन दरिंदों ने मूसल के उन नौ जवानों को भी कोड़े लगाये जो टीवी पर ब्राज़ील में होने वाले फ़ुटबाल वर्ल्डकप का मैच देख रहे थे बसरा के दो दर्जन सुन्नी उल्मा ने दाइश से जंग करने की दावत दी है। उनकी अपील का असर भी हुआ है। जमीअते उल्माए अहलेसुन्नत इराक़ के अध्यक्ष शेख़ ख़ालिद अल-मला ने एक इंटरव्यू में दाइश आतंकवादी संगठनों के हमलों को इंटरनेशनल जासूसी और आतंकी षड़यंत्रों का नतीजा बताया है।
जिस तरह पहले बअस पार्टी ने अपनी हुकूमत को बचाने के लिये सुन्नी शिया उल्मा व जनता दोनों को निशाना बनाया था। इसी तरह बल्कि इससे बढ़कर दाइश के इरादे हैं। ख़ुदा न ख़्वास्ता अगर यह अपने इरादों में कामयाब हो गये तो उनकी निगाहें केवल नजफ़ व कर्बला काज़मैन व सामर्रा ही पर नहीं हैं बल्कि पहला निशाना तो उनका बग़दाद है। जहाँ शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी और इमाम अबू हनीफ़ा के मज़ार हैं क्या यह उन्हें तहस नहस नहीं करेंगे? इराक़ के मौजूदा महत्वपूर्ण समस्या में दुनिया के ख़ास कर हिंदुस्तान के वरिष्ठ सुन्नी उल्मा और मशहूर संस्थाओं की समर्थन का मांग नहीं मोमेनीन के लिये केवल अल्लाह और उसकी मदद काफ़ी है। लेकिन अर्से से इस्लामी दुनिया से दुनिया को एक ग़लत संदेश जा रहा है। इसलिये यह और इस जैसे दूसरे आतंकवाद के घटनाओं पर उन्हें अपना विचार ज़रूर स्पष्ट करना चाहिये। ख़ास कर इस समय जबकि मूसल में 40 हिंदुस्तानी निवासियों को दाइश ने बंदी बना लिया है और दाइश ने अपनी हुकूमत के नक़्शे में उत्तरी हिंदुस्तान गुजरात तक को शामिल किया है।


गुलशन में कहीं बूये दमसाज़ नहीं आती
अल्लाह रे सन्नाटा आवाज़ नहीं आती
साक़िब।

कुछ यह साबित कर रहे हैं कि यह इराक़ के अधिकारों से वंचित लोग हैं जिन्होंने हथियार उठा लिये हैं, ख़ुद उनका नाम ही इस दावे को रद्द करता है और साबित करता है कि यह विदेशी तत्वों के उपकरण हैं जो इराक़ व सीरिया दोनों देशों पर क़ब्ज़े का ख़्वाब देख रहे हैं वरना यह सम्भव ही नहीं कि दाइश इराक़ के भी नागरिक हों और सीरिया के भी नागरिक हों।
बग़दाद में बड़े पीर का बहुत शानदार मज़ार है जिसका मैं ख़ुद गवाह हूँ जहाँ बड़ी सी पत्थर की तख़्ती दीवार में लटकी हुई है जिसमें बड़े पीर का वंशावली (शजरा) है, जो गर्व से पैग़म्बरे इस्लाम स.अ के अहलेबैत अ. से मिलता है। अगर दाइश अपने मक़सद में कामयाब हो जाये और मज़ार पर हल्ला बोल दे या इमाम अबू हनीफ़ा के मज़ार को गिरा दे तो क्या सुन्नियों के बीच वावैला नहीं मच जाएगी? ऐसे में अहलेसुन्नत दाइश के विरोधी हैं और बेचैन है। तिकरित पर क़ब्ज़े के अवसर पर ऐसे ही सबा केयर कैंडिट कॉलेज के 1700 स्टूडेंट्स को दाइश ने क़त्ल कर दिया था।
शाही इमाम अहमद बुख़ारी और मौलाना महमूद मदनी का दावा है कि सब रसूले इस्लाम स. के अहलेबैत अ. को मानते है, लेकिन उनके रौज़ों की सुरक्षा जान ख़तरे में डाल कर न हो, इंसानी जानें भी मुक़द्दस व आदरणीय हैं, यह बयान अक़ीदत में कमी का ऐलान कर रहे हैं। निश्चित रूप से दोनों की सुरक्षा होनी चाहिये लेकिन जब मुक़द्देसात (पवित्र धार्मिक निशानियां) ख़तरे में पड़ जायें तो अपनी जानों की परवाह नहीं करना चाहिये और जान पर खेल कर आतंकवादियों को मार भगाना चाहिये। आयतुल्लाह सीस्तानी ने स्पष्ट हुक्म दिया है कि दाइश को इराक़ से भगा दो।

अबना की सूचना के अनुसार मशहूर सुन्नी आलिम मुफ़्ती अमीनी ने कहा है कि दाइश के इस गुट का अहलेसुन्नत वल- जमाअत से कोई वास्ता नहीं है। जब भी फ़ौज कहेगी हम अमामा उतार कर फ़ौजी वर्दी पहन कर इन मुल्क व क़ौम के दुश्मनों से जेहाद करेंगे। दाइश समेत तमाम आतंकवादी गुट सीरिया में तीन साल से अशांति फैलाये हुये थे। वहाँ उनको अमरीका, ब्रिटेन, फ़्रांस, तुर्की, सऊदी अरब, क़तर, संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डेन व इस्राईल का समर्थन हासिल था वहाँ हिज़्बुल्लाह के मज़बूत प्रतिरोध ने उनकी दाल न गलने दी, हिज़्बुल्लाह लेबनान के जनरल सिक्रेट्री सैयद हसन नस्रुल्लाह ने वीडियो कॉन्फ़्रेंस द्वारा बैरूत, दक्षिणी लेबनान और बुक़ाअ के इलाक़ों में प्रसारित होने वाले अपने बयान में उन लोगों के जवाब में जो सीरिया में हिज़्बुल्लाह के हस्तक्षेप पर विरोध करते हैं, कहा है कि वह तकफ़ीरी आतंकवादी दाइश की निंदा क्यूं नहीं करते? अगर हम उचित समय और सही तरीक़े से सीरिया में हस्तक्षेप न करते तो यह आतंकवादी संगठन इस समय बैरूत में होते। फ़िलिस्तीन उल्मा कॉउंसिल के जनरल सिक्रेट्री शेख़ नमरज़ग़मूत ने कहा है कि आतंकवादी गुट दाइश समय के ख़्वारिज हैं और उनका मक़सद मुस्लिम राष्ट्र के बीच फूट डालना और अमरीका और जायोनी हुकूमत के उद्देश्यों की सेवा करना है। लेबनान उल्मा कॉउंसिल के एक पदाधिकारी शेख़ ज़ुबैर जईद और लेबनान की दावते इस्लामी युनीवर्सिटी के जनरल सिक्रेट्री शेख़ अब्दुल नासिर ने तकफ़ीरी गुट दाइश से मुकाबले की ताकीद करते हुये इस्लामी समाज में एकता बनाये रखने को हुकूमतों और जनता का कर्तव्य बताया और कहा कि इस गुट की गतिविधियों का इस्लामी शिक्षाओं से कोई सम्बंध नहीं। तुर्की की हुकूमत मुल्क के अंदर इस गुट के आतंकवादियों के एलाज की मनाही का क़ानून मंज़ूर कर चुकी है फिर भी दाइश के ज़ख़्मी कमांडरों को बाताई प्रांत के सरकारी अस्पताल में ऐडमिट किया गया जिस पर पार्लियामेंट मिम्बर्स ने विदेशमंत्री अहमद दाऊद ओग़लो से स्पष्टीकरण मांगा है।

आज मुसलमान सोचें कि आख़िर क्या कारण है कि सऊदी अरब ख़ुद तो मिस्र, सीरिया, यमन, बहरैन, इराक़ हर जगह हस्तक्षेप करता है और ईरान को धमकी देता है कि इराक़ में हस्तक्षेप न करना अगर ईरान हस्तक्षेप करे भी तो यह मज़लूमों का समर्थन होगा जो इस्लाम की मांग है जबकि सऊदी अरब ज़ालिमों का समर्थक है। यही सऊदी अरब फ़िलिस्तीन के मुद्दे में भीगी बिल्ली बन जाता है। दाइश उस सीरिया में तीन साल से है जिसकी सीमाएं इस्राईल से मिली हुई हैं लेकिन मुसलमानों का कोई भी आतंकवादी गुट इस्राईल की तरफ़ आंख उठा कर देखने का भी दुस्साहस नहीं करता? जबकि उनके पास नवीन हथियार हैं और यह भी एक बड़ा सवाल है कि इस बड़ी संख्या में विभिन्न प्रकार के हथियार कहां से हासिल कर रहे हैं?
आतंकवादियों से नर्मी ही के कारण आज दुनिया में इस्लाम और मुसलमान बदनाम हैं, यह आतंकवादी पूरी दुनिया में फैल जाना चाहते हैं। पिछले दिनों ख़ुफ़िया विभाग की यह सूचनाएं अख़बारों में छपी थीं कि इण्डियन मुजाहेदीन के निशाने पर मौलाना डा. कल्बे सादिक़ साहब और लश्करे तैबा के निशाने पर मौलाना सैयद कल्बे जवाद साहब हैं। यह दोनों हिंदुस्तानी और लखनऊ के नागरिक हैं। इससे आतंकवादियों की पहुंच का अंदाज़ा किया जा सकता है। हिंदुस्तान में जिन मुस्लिम नौजवानों को आतंकवाद के ग़लत आरोपों में फ़ंसाया गया है उनकी पैरवी के इदारे तो काएम हैं लेकिन आतंकवाद के विरूद्ध संगठित मुहिम नहीं है। इससे आतंकवाद से मुसलमानों के सम्बंध की कल्पना मज़बूत होती है। अलक़ायदा, सल्फ़ी दाइश, लश्कर तैबा, सिपाहे सहाबा, लश्करे झंगवी, तालेबान, बोको हराम, इंडियन मुजाहेदीन यह कौन हैं? क्या ग़ैर मुस्लिम हैं? नहीं बल्कि इनका ख़ुद दावा है कि यह वास्तविक मुसलमान हैं और अहलेसुन्नत हैं, यही तत्व हैं जिन्होंने पाकिस्तान में ज़ाएरीन की बस रोक कर उनका नरसंहार किया। नेट पर ऐसी तस्वीरें हैं जब यह ज़िबह करते हैं तो अल्लाहो अकबर का नारा बुलंद करते है। जिस तरह कर्बला में इमाम हुसैन अ. के समय यज़ीदियों ने नारा बुलंद किया था। क्या इससे इस्लाम नहीं बदनाम होता? अहलेसुन्नत नहीं बदनाम होते?

मुसलमान और उलमाए इस्लाम कब मुजाहिद व आतंकवादी के अंतर को समझेंगे? हिंदुस्तान में पिछले संसदीय चुनाव में तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों को वोटरों के हाथों ज़बरदस्त नुक़सान उठाना पड़ा। उन पर मुस्लिम नवाज़ी का आरोप था और मुसलमानों पर आतंकवाद का आरोप है। आतंकवाद की वबा से ऊबे हुये वोटर ऐसी हुकूमत के इच्छुक थे जो उनके ख़्याल में आतंकवादियों का ख़ात्मा कर सके।
बोकोहराम का नाईजीरिया की 200 ईसाई लड़कियों का उठा ले जाना उन्हें जबरन मुसलमान बनाना उनसे जबरन निकाह की कोशिश करना सीरिया और इराक़ पर हमलावरों के लिये मुफ़्ती हारिस अज़ारी का जेहादुन निकाह का शर्मनाक फ़त्वा देना व इराक़ में सद्दाम की बूढ़ी बेटी रग़द का उस पर अमल करने के लिये तैयार रहने का ऐलान करना और दूसरी औरतों को तैयार करना मूसल के नागरिकों से दाइश की यह मांग इस घिनौने काम के लिये अपनी बीवियों और बेटियों को भेजो क्या खुली हुई अश्लीलता और मुसलमानों के लिये शर्म से डूब मरने का मकाम नहीं। निश्चित रूप से मुसलमानों से ज़्यादा स्वाभिमानी मूसल की वह चार औरतें थीं जिन्होंने दाइश की दरिंदगी का शिकार होने के बाद आत्महत्या कर ली।
तमाम मुसलमानों का दीनी ही नहीं राष्ट्रीय कर्तव्य भी यह है कि वह आतंकवाद से किसी भी प्रकार के सम्बंध न होने का ऐलान करें, आतंकवादियों की निंदा करें और अपने अपने कार्य क्षेत्र में उनके विरूद्ध प्रतिरोध करें। दारूल उलूम के देवबंद के मुफ़्ती अबुल क़ासिम नोमानी ने इराक़ के विषय पर एक सकारात्मक बयान दे कर आधारशिला रख दी है। इराक़ में आयतुल्लाहिल उज़्मा सीस्तानी ने दाइश के विरूद्ध जेहाद किफ़ाई का हुक्म दिया है जिसकी वहाँ के सुन्नी उल्मा ने भी पुष्टि की है। संयुक्त राष्ट्र संघ के जनरल सिक्रेट्री बान की मून ने ऐलान किया है कि आयतुल्लाह सीस्तानी का फ़त्वा तार्किक और ज़मीनी सच्चाई पर आधारित है।
अगरचे न फ़ौजी अभ्यास है न ज़्यादा मात्रा में हथियार फिर भी फ़त्वे पर लब्बैक कहते हुए सुन्नी शिया जनता इराक़ी फ़ौज की मदद के लिये लाखों की संख्या में सड़कों पर निकल आये दाइश के कुछ आतंकवादी जनाना लिबास पहन कर फ़रार होते हुये गिरफ़्तार हुए। यह इराक़ी जनता के मज़बूत इरादे ही का नतीजा है।
हिम्मते मर्दा मददे ख़ुदा।


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