सय्यद हसन नस्रुल्लाह की ज़बानीः

तैंतीस दिवसीय जंग की अनकही कहानी।

  • News Code : 452998
  • Source : विलायत डाट इन
Brief

लेबनान के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन हिज़्बुल्ला के जनरल सिक्रेटरी सय्यद हसन नस्रुल्लाह ने अपने टी, वी इंटरव्युव के दौरान 2006 में लेबनान-इस्राईल के बीच होने वाली तैंतीस दिवसीय जंग के कुछ छुपे हुए तथ्यों का खुलासा किया है

लेबनान के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन हिज़्बुल्ला के जनरल सिक्रेटरी सय्यद हसन नस्रुल्लाह ने अपने टी, वी इंटरव्युव के दौरान 2006 में लेबनान-इस्राईल के बीच होने वाली तैंतीस दिवसीय जंग के कुछ छुपे हुए तथ्यों का खुलासा किया है। आपने बताया कि उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति के सलाहकार डेक चेनी ने हमसे वादा किया था कि अगर हिज़्बुल्ला इस्राईल से दुश्मनी छोड़ दे तो अमेरिका इस संगठन को स्वीकार कर लेगा।

फ़ार्स समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार लेबनान के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन हिज़्बुल्ला के जनरल सिक्रेटरी सय्यद हसन नस्रुल्लाह ने अलमयादीन अरबी चैनल के साथ अपने तीन घंटे के इंटरव्यू में अमेरिका और पश्चिम के इस्लामी प्रतिरोध के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण पर रौशनी डालते हुए कहा कि जब तक प्रतिरोध इस्लामी उम्मत के मुख्य लक्ष्य और उद्देश्य की पाबंद तथा लेबनान के समर्थन और मुल्क की अखंडता के संरक्षण पर डटा रहेगा, तब तक यह लोग हमारा पीछा नहीं छोड़ेंगे।

उन्होंने कहा कि पश्चिम अमेरिका और कुछ अरब मुल्कों के अस्ली मुश्किल यह है कि हिज़्बुल्ला एक प्रतिरोध करने वाला संगठन है वरना उन्हें आंतरिक समस्याओं की कोई परवाह नहीं है।

बंद कमरे में हिज़्बुल्ला के साथ वादा / इस्राईल से दुश्मनी छोड़ने की स्थिति में स्वीकार कर लिया जाएगा।

सय्यद हसन नस्रुल्लाह ने कहा:

हमारे सामने बराबर यह प्रस्ताव रखा जा रहा है कि हम अपने हथियार सुरक्षित रखें लेकिन फ़िलिस्तीन से मुंह मोड़ लें और इस्राईल अतिक्रमण पर चुप्पी का वादा कर लें। अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और दूसरे मुल्कों से हमें यह प्रस्ताव दिये जाते रहे हैं।

डेक चीनी ने एक लेबनानी-अमेरिकी आदमी की मध्यस्थता से हमारे सामने एक बड़ी पेशकश रखी और वह यह कि अमेरिका अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर हिज़्बुल्ला को स्वीकार कर लेगा, हिज़्बुल्लाह के पास हथियार भी रहेगा और उसे आतंकवाद की सूची से भी बाहर कर दिया जाएगा। लेकिन शर्त यह है कि हिज़्बुल्ला मौखिक रूप से बंद कमरे में यह (इस्राईल से दुश्मनी न करने) की गारंटी दे। लेकिन हमने यह मांग खारिज कर दी। हम किसी को ऐसी कोई गारंटी नहीं दे सकते। यह हथियार अगर मुल्क और इस्लामी लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल न हो तो इसका फायदा ही क्या रह जाएगा?

आपका कहना था:

जब हमने इस रास्ते को चुन लिया है तो इस पर सहमत हैं, इस पर पुनर्विचार की कोई गुंजाइश नहीं है। उन लोगों की हमारी साथ अस्ली मुश्किल यह है कि हम प्रतिरोध करते हैं औ प्रतिरोध को जारी रखना चाहते हैं। अगर हम कोई गुंजाइश निकाल लें और यूरोप या इन-डायरेक्ट अमेरिका को यह संदेश दे कि हम इस्राईल का सामना न करने का वादा करते हैं तो हमारे पास हथियारों की मौजूदगी न केवल उनके लिए कोई समस्या नहीं रह जाएगी बल्कि हमें बड़ी बड़ी सुविधाएं भी दी जाएगीं।

हिज़्बुल्ला के जनरल सिक्रेटरी ने अल-लबूना की हालिया घटना पर भी टिप्पणी की और कहा:

इस्राईलियों ने मामले को महत्वहीन दिखाने की कोशिश की थी और कुछ लेबनानियों की भी यही कोशिश थी। सच्ची बात यह थी कि इस्राईल की एक सैन्य टुकड़ी ने लेबनान में घुसपैठ की। उन लोगों का कहना है कि एक पुरानी बारूदी सुरंग फट गई और विस्फोट हो गया। अललबूना की घटना से इस्राईल के हमले का पता चलता है। इस्राईल की दो फ़ौजी टुकड़ियों ने इलाक़े में घुसपैठ की थी लेकिन सच्चाई यह है कि यह पूरा क्षेत्र पूरी तरह से इस्लामी प्रतिरोध के कंट्रोल में रहता है, हमें पहले से सूचना थी कि इस्राइली फ़ौजी वहाँ से गुज़रेंगे तो हमने बारूदी सुरंगें बिछा दीं और जब इस्राएली आए तो विस्फोट हो गया।

अललबूना में जो हुआ हिज़्बुल्ला की कार्यवाही थी / इस्राईलियों के आने की सूचना मिलने पर बारूदी सुरंगें बिछाई गईं।

सय्यद हसन नस्रुल्लाह ने कहा:

हाल ही में यह बात हमारे नोटिस में आई है कि सीमाओं पर इस्राईली घुसपैठ किसी ऑपरेशन की भूमिका है जिसका उद्देश्य इस्लामी प्रतिरोध और जनता को निशाना बनाना है। ऐसा प्रतीत होता है कि अल-लबूना में उनकी कीर्यवाही आख़री नहीं होगी लेकिन हम भी लेबनान की जमीनी सीमाओं के उल्लंघन पर चुप नहीं बैठेंगे और जहां भी हमें पता चलेगा कि इस्राईली लेबनान में दाख़िल हुए हैं वहाँ हम उनका मुकाबला करेंगे। हम इस तरह की आक्रमकता और उलंघ्घन स्वीकार नहीं कर सकते।

अलमयादीन चैनल के डायरेक्टर और मशहूर ऐंकर ग़स्सान बिन जद्व के सवालों का जवाब देते हुए सय्यद हसन नस्रुल्लाह ने कहा:

इस्राईली लेबनान में जहां कहीं भी प्रवेश करेंगे हम उनका मुकाबला करेंगे और उन्हें मुल्क में घुसपैठ नहीं करने दी जाएगी।

इस्राईल की ओर से लेबनान सीमाओं के लगातार उल्लंघन पर कुछ राजनीतिक नेताओं की चुप्पी पर उन्होंने कहा:

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, इसलिए कि बहुत से संगठन इस्राईल को दुश्मन मानते ही नहीं हैं।

इसी के साथ आप ने राष्ट्रपति मीशेल सुलैमान की तरफ़ से इस्राईली अतिक्रमण के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र में शिकायत दर्ज कराने की घोषणा को भी कमजोर पक्ष करार दिया।

आपने कहा:

अललबूना में दूर से मुठभेड़ हुई और इस्राईल ने पूरे मामले पर पर्दा डालने की कोशिश की, वहाँ के मीडिया पर सख़्त सेंसरशिप लगाई गई। यह हमारा अधिकार है कि अगर इस्राईल हमारे मुल्क में घुसपैठ की कोशिश करे तो खामोश न बैठें। यह अतिक्रमण आपरेशन का हिस्सा हैं इसलिए उनके मुकाबले में चुप्पी संभव नहीं है। अललबूना में इस्राईल को अचानक घेर लिया गया इसलिए कि खुफिया जानकारियां पहले से हासिल कर ली गई थीं।

सय्यद हसन नस्रुल्लाह ने ताकीद की:

जब 25 मई 2000 को लोगों ने अपने इलाक़े से इस्राईली सेना की वापसी का जश्न मनाया उसके दूसरे दिन हम ने कह दिया था कि हमें इस्राईल के खिलाफ जंग के लिए तैयार हो जाना चाहिए। फिर 2006 में इस्लामी प्रतिरोध ने इस्राईलियों को रणनीतिक लिहाज से ऐतिहासिक हार का मज़ा चखाया जिस पर सभी इस्राईली सहमत है। इसलिए इस्राईल हिज़्बुल्ला से बदला लेना चाहता है। जब हम ने दो इस्राइली सैनिकों को गिरफ्तार किया तो हम हर तरह की लड़ाई के लिए तैयार थे, पहले से तैयारियां की जा चुकी थीं। हमारा मानना ​​था कि जंग को 2006 तक ही टाला गया है, इसलिए इस्लामी प्रतिरोध को कोई चिंता नहीं थी बल्कि जंग के सारे पहलू स्पष्ट थे, क्योंकि पहले से तैयारी की जा चुकी थी। जुलाई 2006 की जंग में मेन मक़सद दुश्मन को ज़्यादा से ज़्यादा नुक़सान का सामना कराना था।

कुछ जगहों पर हम अपने साथियों को आजादी दे दी कि वह खुद निर्णय लें कि क्या करना चाहिए। इसलिए उन्होंने अंतिम सांस तक मारूनुर रास में रहने का निश्चय कर लिया। ऐयता में भी हमारे बहुत से भाई मौजूद थे और फिर एक समय ऐसा आया जब हमारा उनसे संपर्क टूटा हो गया। हमने सोचा वह लोग शहीद हो गए लेकिन बाद में जब उनसे संपर्क हुआ तो हाजी एमाद मुग़निये से बातचीत हुई। हमने उनसे कहा कि उनके वहाँ रहने और लड़ाई जारी रखने के बारे में हमारी ओर से उन पर कोई ज़बरदस्ती या पाबंदी नहीं है लेकिन उन्होंने खुद ही यह फैसला कर लिया कि वह अंत तक वहां डटे रहेंगे।

आपने आगे बयान किया:

बिंते जुबैल में भी भाईयों ने यही फैसला किया कि वह वहीं रहेंगे, अंतिम क्षण तक लड़ेंगे और इस्राईलियों को मुल्क में प्रवेश करने से रोकेंगे। हमने शुरू में ही हिसाब लगा लिया था कि जंग कुछ महीने चलेगी। इसलिए हम इसके लिए तैयार थे।

तैंतीस दिवसीय जंग की अनकही कहानी / आप्रेशन सेटरों को एक दूसरे से जोड़ने वाली संपर्क प्रणाली

सय्यद हसन नस्रुल्लाह ने ताकीद की:

तैंतीस दिवसीय जंग के दौरान हमने जितने भी मिज़ाइल फायर किए वह हमारे कुल मिज़ाइल स्टोर का एक छोटा सा हिस्सा थे। हम बड़े नपे तुले अंदाज से मिज़ाइल दागते थे और चूंकि प्रतिरोध के सदस्य विभिन्न स्थानों पर फैले हुए थे इसलिए हमारे पास ज़्यादा से ज़्यादा मिज़ाइल फायर करने की संभावना मौजूद थी। लेकिन हम यह भी हिसाब लगा रहे थे कि हमें लम्बी लड़ाई का सामना करना पड़ेगा तो यह भी नहीं होना चाहिए कि जंग ख़त्म होने से पहले हमारे मिज़ाइल समाप्त हो जायें। बहेरहाल हम छह महीने से कम तक की लड़ाई के लिए तैयार थे। लेकिन इस्राईलियों के पास समय कम था और उन्होंने इस जंग को  ख़त्म कर दिया। हम भी दुश्मन की कार्यवाहियों के मद्देनज़र मिज़ाइलों की संख्या बढ़ाते रहे।

आप ने सेंट्रल कमान और फील्ड आपरेशन सेंटर्ज़ और मुजाहेदीन के बीच स्थायी संपर्क को हिज़्बुल्ला की जंगी ताक़त का हिस्सा करार दिया और कहा कि हमारी संपर्क मशीनें वायरलेस और वायर्ड दोनों तरह की थीं। लेकिन इस्राईल को हमारी इस ताक़त का अंदाज़ा नहीं था। प्रतिरोध के सदस्यों के बीच दोस्ताना और भावनात्मक सम्बंध हिज़्बुल्ला की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी (और है)। तैंतीस दिन तक हमारा प्रतिरोध बहुत से लेबनानी और ग़ैर लेबनानी संगठनों के लिए एक संदेश और आदर्श बन गया।

उन्होंने कहा कि भूमध्य सागर स्थित साज़ समुद्री बेड़े पर रॉकेट बरसाए गए, तब वह भी ज़ाहिया में मौजूद थे।'' हम ने अनपेक्षित कार्यवाहियों और असाधारण गतिविधियों और कामयाबी का वादा किया था, बेड़े पर हमला भी उसी का हिस्सा था और हमारे साथी उस पर हमले के लिए तैयार थे।''

आप ने कहा:

तकनीकी और अमली निगाह से उक्त बेड़े को निशाना बनाना बहुत जटिल काम था, आसान नहीं था लेकिन मुजाहेदीन ने इसमें कामयाबी हासिल की। उस दिन स्पीच शुरू करने से पहले मैं इंतजार कर रहा था, फिर स्पीच के दौरान वादा किया कि हम अनपेक्षित कार्यवाहियां करेंगे। इसके बाद मेरी स्पीच ख़त्म हो रही थी कि एक जवान ने आकर मुझसे कहा कि मुजाहेदीन ने बेड़े पर हमला कर दिया है और वह जल रहा है, इसलिए मैंने वहीं से डायरेक्ट इस ख़बर का ऐलान कर दिया।

इस्राइली मरकावा टैंक हिज़्बुल्ला के जाल में / जायोनियों की जंगी नाव निशाना बनाए जाने की कहानी

जुलाई 2006 की जंग में हिज़्बुल्ला की ओर से इस्राईल के मरकावा टैंक को निशाना बनाए जाने से सम्बंधित सय्यद हसन नस्रुल्लाह का बयान:

इस्राईल सोच भी नहीं सकता था कि हम उसके मरकावा टैंक नष्ट कर देंगे, लेकिन हम कोरेंट हथियार का इस्तेमाल करके जो कि इस्राईल के लिए अकल्पनीय और हमारी खुफिया ताक़त थी मरकावा टैंक उड़ा दिए।

आपने इस सवाल के जवाब में कि आप को कैसे पता था कि कोरेंट मरकावा नष्ट कर सकता है? कहा:

जहां से हथियार हमारे पास पहुंचे थे वहीं उसका परीक्षण किया जा चुका था।

इंटरव्युव के दौरान अलमयादीन ने पूछा कि जिस तरह आप के पास कई महीनों की लड़ाई की सूरत में इस्राईल को निशाना बनाने के लिए पर्याप्त मिज़ाइल मौजूद थे क्या कोरेंट की भी यही हालत थी? प्रतिरोध लेबनान में दाखिल होने वाले कितने मरकावा टैंक उड़ा सकती थी?

आपने जवाब दिया:

अगर सैकड़ों की संख्या में टैंक लेबनान में जाते तो हम उन्हें नष्ट करने की क्षमता रखते थे।

सय्यद हसन नस्रुल्लाह का कहना था:

जुलाई 2006 के जंग के दौरान मैं यह जो कहता था कि हम हीफ़ा के उस पार तक हमले करेंगे इससे मेरी मुराद तिलअवीव था।

जंग के दौरान मनोवैज्ञानिक हमले के महत्व पर रौशनी डालते हुए आपने कहा:

कुछ लोग ग़लत जानकारी के आधार पर मनोवैज्ञानिक वार करते हैं और कुछ तथ्य की रौशनी में। हम यह काम तथ्यों के आधार पर कर रहे थे।

इस रहस्य को रहस्य ही रहने दीजिए / एमाद मुग़निया बेमिसाल थे।

जब आपसे पूछा गया कि आपने कहा कि आपके पास ऐसे मिज़ाइल हैं जिनके माध्यम से अतिग्रहित फ़िलिस्तीन के अंतिम हिस्से को भी निशाना बनाया जा सकता है क्या प्रतिरोध में यह ताक़त 2006 में भी मौजूद थी या उसके बाद आपने यह ताक़त हासिल की है? तो आपने जवाब दिया कि ''इस बात को राज़ में ही रहने दीजिए।'

अपने दो सिपाहियों की रिहाई के लिए ज़ायोनी फ़ौज के बअलबक में उतरने से समम्बंधित पूछे गए एक सवाल के जवाब में आपने कहा:

इस्राईली सेना ने यह कार्रवाई अपने दोषपूर्ण विश्लेषण और गलत जानकारी के आधार पर की थी, चलिए आज पहली बार मैं बता देता हूँ कि उन सिपाहियों को बअलबक ले जाया ही नहीं गया था और न ही अस्पताल में थे लेकिन उन्हें दूसरे स्थान पर रखा गया था। जंग के दौरान हमने बहुत से इस्राईली एजेंट गिरफ्तार कर लेबनान सरकार के हवाले किए और उन्हें मारा नहीं।

दक्षिण बैरूत के ज़ाहिया क्षेत्र की दो इमारतों पर इस्राईल के यह कहकर हमला करने से सम्बंधित कि वहाँ हिज़्बुल्ला के जनरल सिक्रेटरी हैं आपने कहा:

जंग के दौरान न तो सय्यदुल अवसिया काम्पलेक्स गये और न ही इमाम हुसैन काम्पलेक्स। इस्राईल बस अधिक से अधिक लोगों की हत्या करना चाहता था।

जंग के बाद बैरूत के दौरे से जुड़े एक सवाल के जवाब में कहा:

मैंने एमाद मुग़निया और दूसरे जायोनियों के साथ बैरूत के विभिन्न क्षेत्रों का निरीक्षण किया था।

इसके बाद आपने एमाद मुग़निया के व्यक्तित्व पर रौशनी डालते हुए कहा:

हमारा यह महान शहीद जिहादी ढांचे का आधार था। वह जंग की तैयारियों में दिन रात लगे रहते और कड़ी मेहनत करते थे। आप विचारक और आविष्कारक थे, किसी की नक़्ल नहीं करते थे बल्कि मेहनत और लगन से अपने काम में व्यस्त रहते थे। आप और दूसरे मुजाहिद साथियों ने तैंतीस दिवसीय जंग के दौरान न तो कभी खुद को कमजोर समझा और न कभी हैरान और परेशान हुए। एमाद मुग़निया शांत, संतुष्ट और दृढ़ रहे, यह उनकी विशेषताएं थीं।

सीरिया की ओर से प्रतिरोध के समर्थन से सम्बंधित सय्यद हसन ने कहा:

सीरिया ने जुलाई 2006 की जंग में अपने हथियार गोदामों के मुंह हमारे लिये खोल दिये जो हमें उठाना हो उठा लें और कोरेंट हथियार भी हमें सीरिया ने ही दिए थे।

जब जंग अपने चरम पर थी तो बश्शार असद का संदेश आया / ईरान से कोई हथियार नहीं लाया गया।

जंग के दौरान सीरिया के राष्ट्रपति बश्शार असद से हिज़्बुल्ला के कंधे से कंधा मिलाकर दुश्मन से लड़ने की पेशकश से सम्बंधित सय्यद हसन नस्रुल्लाह ने कहा:

सीरिया के राष्ट्रपति बश्शार असद ने मेरे नाम एक संदेश भेजा और जंग में शामिल होने की पेशकश की। सीरिया ने यह विश्लेषण किया था कि लेबनान पर हमला तथा अंतरराष्ट्रीय और आंतरिक षड्यंत्र का उद्देश्य प्रतिरोध को कुचलना है। अगर प्रतिरोध कचल दिया गया तो उसके बाद सीरिया का रुख किया जाएगा, इसलिए राष्ट्रपति की पेशकश थी कि वह अपनी सेना लेबनान के विभिन्न भागों में भेज दें।

आपने कहा कि जंग के दौरान ईरान से कोई हथियार नहीं लाया गया क्योंकि उसकी जरूरत ही पेश नहीं आई, दुश्मन अपना कोई भी लक्ष्य हासिल नही कर सका और हम जनता की वजह से संघर्ष विराम स्वीकार करने पर मजबूर हुए।

जंग के दौरान आंतरिक मोर्चे पर रौशनी डालते हुए आपने कहा:

जंग से सम्बंधित वार्ता के सिलसिले में लेबनान के तत्कालीन प्रधानमंत्री हमारे लिये विश्वसनीय नहीं थे।

लेकिन आपने स्वतंत्र राष्ट्रीय संगठन के प्रमुख मीशेल औन के पक्ष की प्रशंसा की और कहा:

मीशेल औन की विचारधारा भी स्पष्ट है और वह इसे स्पष्ट रूप से बयान भी करते हैं.। उनकी ओर से इस्लामी प्रतिरोध का समर्थन मेरे लिए अप्रत्याशित नहीं थी। इसलिए उनका स्पष्ट रुख उनकी पहचान है।

आपने 14 मार्च समूह के दृष्टिकोण की निंदा करते हुए कहा:

चौदह मार्च गिरोह का मुख्य मक़सद लेबनान की सुरक्षा नहीं बल्कि प्रतिरोध के हथियारों से छुटकारा पाना है, चौदह मार्च हमसे कहता है कि आप अपने हथियार हमें दे दें, उसके बाद हम उन्हें जो करना चाहेंगे, करेंगे. सेना को दे देंगे, इकट्ठा करके नष्ट कर देंगे या समुद्र में फेंक देंगे। जॉन बोल्टन ने भी (जंग के दौरान) कहा था कि उस समय तक लड़ाई जारी रहेगी जब तक इस्लामी प्रतिरोध कुचल नहीं दी नजाती या ख़त्म नहीं हो जाती या अपने हथियार हवाले नहीं कर देती।

नाएफ़ का चौदह मार्च से वादा

आप ने कहा:

उस समय के सऊदी अरब के गृह मंत्री अमीर नाएफ ने चौदह मार्च से वादा किया था कि वह हिज़्बुल्ला को कुचलने का पक्का इरादा रखते हैं। दूसरी ओर प्रधानमंत्री फवाद सनीवरेह और उनकी राजनीतिक टीम (चौदह मार्च समूह) ने जंग के दौरान हमारे साथ राजनीतिक, नैतिक या मानवीय नहीं बल्कि हमारे विरोध पर आधारित रवैया अपनाया।

इसके बाद आप ने तैंतीस दिवसीय जंग के बारे में राजनीतिक सलाह और सुझावों का जिक्र करते हुए अमीरे क़तर शेख हम्द बिन जासिम के एक बयान का हवाला दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि जब वह अरब लीग के प्रतिनिधिमंडल के साथ जंग के बारे में बातचीत के लिए संयुक्त राष्ट्र गए तो उन्हें दरवाज़े पर ही जान बोल्टन मिल गए। उन्होंने साफ़ तौर कहा कि आप लोग क्यों आए हैं, आपके सामने दो रास्ते हैं या प्रतिरोध कुचल डालिए और तबाह कर दीजिए या हथियार ले लीजिए।

सय्यद हसन नस्रुल्लाह ने युद्ध विराम से सम्बंधित पश्चिमीयों की शर्तों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह (पश्चिमी) चाहते थे कि यूनीफिल के पन्द्रह हजार जवानों की तैनाती से पहले न तो बेघर अपने इलाक़ों में लौटेंगे और न ही इस्राईल दक्षिण लेबनान अधिकृत क्षेत्रों से पीछे हटेगा। यूनीफिल की उक्त सेना के गठन और तैनाती में लगभग कई महीने लग जाते हैं और इतने समय तक बेघर अपने घरों को नहीं लौट सकते थे, इसलिए हमने इन शर्तों को हरगिज स्वीकार नहीं किया।

हिज़्बुल्ला के जनरल सिक्रेटरी ने आगे चलकर अमीर क़तर शेख हम्द बिन जासिम के इस बयान का हवाला दिया जिसमें उन्होंने इस्राईल और पश्चिम की ओर से किये गए संघर्ष विराम की अप्रत्याशित आवेदन का उल्लेख किया और कहा:

शेख हम्द ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र में इस्राईल के राजदूत ने अचानक कहा कि कैबिनेट ने युद्धविराम का फैसला किया है, हम जंग रोकना चाहते हैं. शेख ने जब पूछा कि आप लोगों ने कुछ शर्तें रखी थीं तो उनके पास से यह कहता हुआ गुजरा कि हम केवल संघर्ष विराम चाहते हैं।

हिज़्बुल्ला के जनरल सिक्रेटरी ने कहा:

सवाल यह है कि क्या वजह थी कि इस्राईल और अमेरिका अचानक संघर्ष विराम चाहने लगे? वजह यह थी कि खुद पश्चिमियों के अनुसार अगर जंग जारी रहती तो इस्राईल का वुजूद ख़त्म हो जाता। तैंतीस दिन की लड़ाई में इस्राईल, प्रतिरोध की तुलना में कमजोर पड़ गया। उसकी वायुसेना भी हमारे मिज़ाइल न रुकवा पाई जबकि उन लोगों ने जहां भी संभव हो सका बमबारी की लेकिन मुजाहेदीन बिल्कुल पहले की तरह प्रभावी रूप से जंग के मैदान में मौजूद रहे। यह प्रतिरोध ही की ताक़त थी, जिसने उन्हें जंग रोकने पर मजबूर कर दिया। तैंतीस दिन प्रतिरोध के नतीजे में वह जंग रोकने की कोशिश करने लग गए।

सय्यद के अनुसार उनके विरूद्ध हुस्नी मुबारक की अध्यक्षता में मिस्र, सऊदी अरब और कई अन्य अरब मुल्क जंग में शामिल थे।

आपने लेबनान की राजनीतिक स्थिति खासकर सरकार के गठन से सम्बंधित कहा:

अल-मुस्तक़बल के प्रमुख साद हरीरी का यह प्रस्ताव कि उनकी पार्टी और हिज़्बुल्ला दोनों हुकूमत से अलग हो जाएंगें,  अमेरिकी मांग है।

हमें सऊदी अरब से कोई दुश्मनी नहींवह हमसे दुश्मनी कर रहे हैं / मिस्र के हालात का हल बातचीत

नस्रुल्लाह ने अपने इस लम्बे इंटरव्युव में आगे चलकर कहा:

सरकार के गठन के लिए जिम्मेदार प्रधानमंत्री तमाम सलाम का यह कहना कि वह पार्टियों से जुड़े लोगों को सरकार में शामिल नहीं करेंगे इसका मतलब यह है कि वह हुकूमत बनाना ही नहीं चाहते। हम अब तक तमाम सलाम को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर रहे हैं।

आपका कहना था:

हमने सऊदी अरब से किसी तरह की दुश्मनी का ऐलान नहीं किया है लेकिन सऊदी अरब पूरी तरह हमसे दुश्मनी रख रहा है।

लेबनान के राष्ट्रपति मीशेल सुलैमान के हालिया बयान पर टिप्पणी करते हुए आपने कहा:

लेबनान के राष्ट्रपति ने जब हिज़्बुल्ला को निशाना बनाया तो हमने उनकी बात का जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा।

हिज़्बुल्ला का दो तुर्क पाइलेट्स के अपहरण से कोई संबंध नहीं।

सय्यद हसन नस्रुल्लाह ने हाल ही में बैरूत के अंतर-राष्ट्रीय हवाई अड्डा जा रहे दो तुर्क पाइलेट्स के अपहरण से सम्बंधित कुछ दावों का खंडन करते हुए कहा:

हमने पाइलेट्स का अपहरण नहीं किया है और न ही हमें इसकी कोई जानकारी थी, हमारा इस मामले से कोई सम्बंध नहीं है।

मिस्र के हालात पर रौशनी डालते हुए आपने कहा:

हम मिस्र के हालात को लेकर चिंतित हैं, इस मुल्क की समस्याओं का समाधान बातचीत है।

आपने मिस्र के हालात पर शोक व्यक्त किया और कहा कि आपसी संपर्क और बातचीत ही समाधान है, इसके साथ ही आपने मिस्र में कैदी छुड़ाने से हिज़्बुल्ला के किसी तरह के सम्बंध का खण्डन किया और कहा:

एरिये के हालात जो भी हों लेकिन अब विफलताओं और नाकामियों का जमाना बीत चुका है।

तीन घंटे के लंबे इंटरव्युव के अंत में आपने प्रतिरोध को प्राप्त जनाधार को कामयाबी हासिल करने और बाक़ी रहने का मुख्य स्तम्भ बताया।


आशूरा: सृष्टि का राज़
پیام رهبر انقلاب به مسلمانان جهان به مناسبت حج 1441 / 2020
conference-abu-talib
We are All Zakzaky
सेंचुरी डील स्वीकार नहीं