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ह्यूमन राइट्स वाचः नरेन्द्र मोदी कोरोना से संघर्ष में देशवासियों से एकजुट होने की अपील कर सकते हैं तो मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो रह

ह्यूमन राइट्स वाचः नरेन्द्र मोदी कोरोना से संघर्ष में देशवासियों से एकजुट होने की अपील कर सकते हैं तो मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो रह

ह्यूमन राइट्स वाच का कहना है कि भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून मुसलमानों के ख़िलाफ खुला हुआ भेदभाव है।

संस्था का कहना है कि भारत सरकार ने क़ानून में संशोधन करके बौद्धों, हिंदुओं, सिखों, जैनियों, पार्सियों और ईसाइयों को तो नागरिकता देने की बात कही है लेकिन मुसलमानों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया है।

अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने शुक्रवार को अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसका शीर्षक है "गोली मारो गद्दारों को... भारत के नए नागरिकता क़ानून के तहत मुसलमानों के ख़िलाफ़ खुला भेदभाव! "

82 पृष्ठों की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वालों पर सरकार के समर्थक संगठन बार बार हमले करते हैं और प्रशासन व पुलिस उन्हें नहीं रोक पाती जबकि वही पुलिस उस समय बहुत सक्रिय हो जाती है जब उसे सीएए के खिलाफ़ प्रदर्शन करने वालों के ख़िलाफ़ कार्यवाही करनी होती है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि पुलिस अधिकारियों ने क़ानून का विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ बहुत अधिक बल प्रयोग किया।

संस्था ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और असम के 100 से अधिक पीड़ितों, क़ानून विशेषज्ञों, बुद्धिजीवियों और पुलिस अधिकारियों से बातचीत के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार की है।

ह्यूमन राइट्स वाच की दक्षिणी एशिया क्षेत्र की डायरेक्टर मीनाक्षी गांगुली का कहना है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से यह अपील तो की कि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए एकजुट हो जाएं मगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा और भेदभाव के विरुद्ध देशवासियों को एकजुट करने की कभी कोशिश नहीं की।

गांगुली का कहना है कि सरकार की नीतियों के कारण मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंदूवादी संगठनों और पुलिस की हिंसा का रास्ता खुला है जिसके कारण मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों में भय फैल गया है।

तुर्की की न्यूज़ एजेंसी अनादुलु ने इस रिपोर्ट के बारे में भाजपा के एक नेता शहनवाज़ हुसैन से बात की तो उन्होंने कहा कि विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं कर सकते।

स्रोतः अलजज़ीरा डाट नेट


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