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हिज़्बुल्लाह को आतंकी गुट बता कर ब्रिटेन ने सिद्ध कर दिया कि वह इस्राईल का पिछलग्गू है

हिज़्बुल्लाह को आतंकी गुट बता कर ब्रिटेन ने सिद्ध कर दिया कि वह इस्राईल का पिछलग्गू है

अरबी भाषा के मशहूर समाचारपत्र रायुल यौम ने अपने एक संपादकीय लेख में ब्रिटेन की ओर से लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन को आतंकी गुट बताए जाने के कारणों की समीक्षा की है।

पत्र ने लिखा है कि ब्रिटेन की ओर से लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन को आतंकी गुट बताया जाना अमरीका व ज़ायोनी शासन के दबाव का परिणाम है। वाॅशिंग्टन व तेल अवीव की सिर तोड़ कोशिश यही है कि हिज़्बुल्लाह को लेबनान के अन्य धड़ों से अलग कर दें। अगर हिज़्बुल्लाह हज़ार साल तक सीरिया में लड़ता रहता और तेल अवीव के लिए ख़तरा न बनता या इस शासन के साथ कोई समझौता कर लेता  तो आज उसे आतंकवादी नहींं कहा जाता। ब्रिटेन की सरकार ने अपने इस फ़ैसले के औचित्य में कहा है कि हिज़्बुल्लाह संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के विपरीत अब भी हथियारों से लैस है और उसके द्वारा सीरिया के राष्ट्रपति बश्शार असद के समर्थन ने इस देश में युद्ध को अधिक लम्बा कर दिया है। हिज़्बुल्लाह ने ब्रिटेन के इस फ़ैसले की प्रतिक्रिया में कहा है कि यह फ़ैसला, अमरीकी सरकार के सामने अपमाजनक ढंग से झुकने के अर्थ में है और लंदन केवल अपने अमरीकी मालिक को ख़ुश करना चाहता है।

 

लेबनान के अनेक दलों व गुटों ने भी ब्रिटेन के इस फ़ैसले की निंदा की है और इसे अमरीका व ज़ायोनी शासन के षड्यंत्रों का परिणाम बताया है जिनकी कोशिश है कि हिज़्बुल्लाह को देश के अन्य राजनैतिक धड़ों से अलग कर दिया जाए। लेबनान के राजनैतिक हल्क़ों को आशंका है कि लंदन का फ़ैसला न केवल हिज़्बुल्लाह पर बल्कि उस सरकार की गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकती है जिसका एक भाग हिज़्बुल्लाह है। शायद यही चिंता है जिसके कारण फ़्रान्स के नेताओं ने लंदन के फ़ैसले पर सतर्कतापूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त की क्योंकि हिज़्बुल्लाह के दो धड़ों के बीच अंतर करने के कारण, इस संगठन और लेबनान की सरकार के साथ यूरोप की कूटनैतिक गतिविधियों और सहयोग पर प्रभाव पड़ सकता है।

 

फ़्रान्स के राष्ट्रपति मैक्रां ने इस संबंध में कहा कि पेरिस बैरूत में अपने दूतावास के माध्यम से सांसदों व मंत्रियों समेत हिज़्बुल्लाह के राजनैतिक अधिकारियों से निरंतर संपर्क में है। फ़्रान्स या कोई भी अन्य शक्ति यह तैय नहीं कर सकती कि कौन सा राजनैतिक पक्ष अच्छा और कौन सा बुरा है इसका निर्धारण स्वयं लेबनान की जनता को करना है। फ़्रान्स के इस रुख़ का कारण शायद यह है कि पेरिस नहीं चाहता कि लंदन का यह निर्णय यूरोप की अन्य राजधानियों तक पहुंच जाए और अन्य देश भी ब्रिटेन का अनुसरण करने लगें। इसी परिप्रेक्ष्य में लेबनानी हल्क़ों का कहना है कि ब्रिटेन के इस फ़ैसले ने लेबनानी जनता को निशाना बनाया है। एक राजनैतिक कार्यकर्ता ने कहा कि फ़्रान्स, ब्रिटेन, इटली इत्यादि यूरोपीय देशों के हाथ किसी अरब क्षेत्र पर क़ब्ज़े के समय उन क्रांतिकारियों को आतंकी व विध्वंसकर्ता बताया जाता था जो देश की स्वतंत्रता व स्वाधीनता के लिए लड़ते थे। एेसा प्रतीत होता है कि ब्रिटेन का यह फ़ैसला भी पुराने साम्राज्यवाद के चिन्हों को ही साक्षात कर रहा है। 


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