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हिज़्बुल्लाह की वह ऐतिहासिक कामयाबी, जिसने क्षेत्रीय समीकरण बदल दिया! उस युद्ध की कहानी जिसे अमरीका ने " प्रसव पीड़ा" कहा था।

हिज़्बुल्लाह की वह ऐतिहासिक कामयाबी, जिसने क्षेत्रीय समीकरण बदल दिया! उस युद्ध की कहानी जिसे अमरीका ने

14 अगस्त पाकिस्तान और भारत के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन यह तारीख लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन के लिए कई आयामों से बेहद महत्वपूर्ण है।

 इस्राईली सेना ने 12 जूलाई सन 2006 को पहले से बनायी गयी अपनी योजना के अंतर्गत लेबनान पर चढ़ाई कर दी। इस हमले का मक़सद, लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन को खत्म करना था। इस्राईली सेना अत्याधुनिक हथियारों से लैस थी और उसके सामने एक छोटा सा संगठन था लेकिन लेबनान के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन, हिज़्बुल्लाह ने 33 दिनों तक न केवल यह कि इस्राईली अतिक्रमण का जम कर मुक़ाबला किया बल्कि इस्राईल को हार मानने पर विवश कर दिया और उसे 14 अगस्त सन 2006 में सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव नंबर 1701 स्वीकार करना पड़ा।

 

     यह युद्ध क्यों आरंभ हुआ था?

     इस्राईल ने सन 2004 में तीन लेबनानी बंदियों के बारे में हुए समझौते को रद्द कर दिया और इन तीन बंदियों को रिहा करने से इन्कार कर दिया, हिज़्बुल्लाह ने हालांकि कहा कि वह इसका बदला लेगा मगर इस्राईल ने ध्यान नहीं दिया और फिर जूलाई सन 2006 में " सच्चा वादा " नामक एक आप्रेशन में हिज़्बुल्लाह ने इस्राईल के दो सैनिकों का अपहरण कर लिया। इस्राईल ने अपने दो सैनिकों को बंदी बनाए जाने के तत्काल बाद, लेबनान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। इस्राईल की मांग थी कि हिज़्बुल्लाह को निशस्त्र किया जाए और दोनों इस्राईली सैनिकों को रिहा किया जाए। इन दो मांगों के साथ उसने लेबनान पर हमला किया किंतु 33 दिनों तक चले भयानक युद्ध के बावजूद न तो हिज़्बुल्लाह का निरस्त्रीकरण हुआ और न ही दो इस्राईली सैनिक रिहा हो पाए और इस्राईल खाली हाथ, युद्ध के मैदान से वापस लौटा।

  33 दिवसीय युद्ध में लेबनान के हिज़्बुल्लाह ने केवल इस्राईल को ही धूल नहीं चटायी बल्कि मध्य पूर्व का नया नक़्शा बनाने के अमरीकी सपने को भी चकनाचूर कर दिया। 33 दिवसीय युद्ध से हालांकि लेबनान में भयानक तबाही हुई लेकिन इससे हिज़्बुल्लाह और लेबनानी सरकार व जनता को कई उपलब्धियां मिलीं। इस युद्ध में इस्राईल की पराजय से क्षेत्रीय और अतंरराष्ट्रीय स्तर पर कई बड़े और बुनियादी बदलाव हुए।

     " अमीन मुहम्मद हतीत "  ने अपनी किताब " हिज़्बुल्ला और इस्लामी चेतना " में लिखा है कि लेबनान के खिलाफ इस्राईल के 33 दिवसीय युद्ध की एक बड़ी उपलब्धि युद्ध में तीसरी शैली की खोज की गयी। यह नयी शैली कुछ सिद्धांतों पर आधारित थीः

  • दुश्मन पर गोलाबारी के लिए, उसकी रेंज से दूर क्षेत्रों को तैयार किया गया जहां से वह तो आसानी से दुश्मनों को निशाना बनाते थे किंतु दुश्मन की वहां तक पहुंच नहीं थी।
  • बिना समय गवांए दुश्मन को उचित हथियार से रास्ते से हटाया जाता था।
  • सारे लड़ने वाले धार्मिक व आध्यात्मिक भावनाओं से भरे थे इस लिए बेहद साहस के साथ लड़ रहे थे।
  • दुश्मन पर कड़ी नज़र रखी गयी और व्यापक स्तर पर खुफिया गतिविधियां की गयीं।
  • हिज़्बुल्लाह ने अपने चारों ओर ऐसा मज़बूत दायरा बनाया कि जिसकी वजह से दुश्मन के  लिए खुफिया एजेन्टों के लिए उसमें घुसपैठ और सूचनाएं एकत्रित करना असंभव हो गया।
  • युद्ध की कमान एक मुख्यालय के हाथ में थी और सब लोग विशेष शैली से एक दूसरे के साथ जुड़े हुए थे।
  • हिज़्बुल्लाह के पास अत्यन्त बुद्धिमान व सचेत कमांडर था जो कभी असंमजस में नहीं पड़ता था।
  •  हिज़्बुल्लाह ने मनोवैज्ञानिक युद्ध से प्रभावित होने के बजाए  खुद मनोवैज्ञानिक युद्ध व्यापक स्तर पर और सफलता के साथ आगे बढ़ाया।

           

कौन हारा कौन जीता? 

हिज़्बुल्लाह के महासचिव सैयद हसन नसरुल्लाह ने 33 दिवसीय युद्ध के तत्काल बाद कहा कि प्रतिरोध मोर्चे को रणनैतिक व एतिहासिक विजय मिल गयी है। इस्राईल के सामने 33 दिनों तक टिके रहना ही हिज़्बुल्लाह के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि रही है। युद्ध आरंभ होने से पहले होने वाले एक सर्वे में लेबनान के 63 प्रतिशत लोगों ने इस सवाल का जवाब कि क्या इस्राईल हार जाएगा? इन्कार में दिया था।

  इस्राईल के समर्थन में प्रसिद्ध ब्रिटिश पत्रिका एकोनोमिस्ट ने अपने मुख्य पृष्ठ पर सैयद हसन नसरुल्लाह का फोटो छाप कर उन्हें 33 दिवसीय युद्ध का विजेता घोषित किया क्योंकि युद्ध के आंरभ से लेकर अंत तक इस्राईल के लक्ष्य में बड़ा बदलाव आ गया था। पहले उसने कहा कि युद्ध का लक्ष्य, हिज़्बुल्लाह को खत्म करना, फिर कहा हिज़्बुल्लाह की मिसाइल शक्ति को खत्म करना, फिर कहा हिज़्बुल्लाह की शक्ति कम करना फिर कहा कि हमले का मक़सद, हिज़्बुल्लाह को " लीतानी" नदी के दूसरी तरफ खदेड़ना और अंत में कहा कि हमले का मक़सद केवल अपने दो सैनिकों की रिहाई है और वह भी पूरा न हो सका। यह निश्चित रूप से इस्राईल की हार है।

युद्ध के बाद इस्राईली समाचार पत्र " हारित्ज़" ने खुल कर इस्राईल की हार और हिज़्बुल्लाह से तमांचा खाने की बात लिखी थी। ब्रिटिश समाचार पत्र इंडिपेंडेंट ने इस्राईल की हार के बाद हसन नसरुल्लाह को " इस्लामी व अरब प्रतीक" कहा था और न्यूज़वीक ने " मध्य पूर्व के लिए नया पुरुष" शीर्षक के अंतर्गत अपने एक लेख में हिज़्बुल्लाह की लोकप्रियता और सैयद हसन नसरुल्लाह की विजय पर प्रकाश डाला।

    33 दिवसीय युद्ध में कुछ जियालों पर आधारित हिज़्बुल्लाह संगठन ने, अरबों के माथे से जहां, इस्राईल से हार का कलंक धोया वहीं इस्राईली सेना के अजेय और इस्राईली हथियारों के प्रभावी होने की क़लई खोल दी। इस्राईल को अपनी सेना पर नाज़ था उसे हिज़्बुल्लाह ने धूल चटा दी, इस्राईली सेना के पास मेर्कावा टैंक का बड़ा नाम था, हिज़्बुल्लाह ने दर्जनों के हिसाब से एक एक दिन में मेर्कावा टैंक तबाह किये जिसकी वजह से भारत सहित कई देशों ने इस टैंक को खरीदने का सौदा ही रद्द कर दिया और उसकी फैक्टरी ही बंद हो गयी। लेबनान पर इस्राईल के हमले रोकने के लिए जब अमरीका की तत्कालीन विदेशमंत्री कोंडोलीज़ा राइस से कहा गया तो उन्हों ने कहा कि नया मध्य पूर्व पैदा हो रहा है और जब जन्म होता है तो प्रसव पीड़ा तो होती ही है! हिज़्बुल्लाह ने अमरीका के इस बच्चे को पैदा ही नहीं होने दिया और अमरीका व इस्राईल की प्रसव पीड़ा अब तक जारी है।


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