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हसन नसरुल्लाह कभी झूठ नहीं बोलते, इस्लामी प्रतिरोध इस्राईल को पाषाण युग में पहुंचा सकता हैः रायुल यौम

हसन नसरुल्लाह कभी झूठ नहीं बोलते, इस्लामी प्रतिरोध इस्राईल को पाषाण युग में पहुंचा सकता हैः रायुल यौम

मशहूर अरबी समाचारपत्र रायुल यौम ने अपने संपादकीय में लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन के महासचिव के ताज़ा इंटरव्यू की समीक्षा की है और लिखा है कि उनका बयान, व्यापक सूचनाओं और क्षेत्र के हालात की गहन समीक्षा के आधार पर था।

रायुल यौम ने लिखा है कि सैयद हसन नसरुल्लाह ने अपने हालिया भाषणों में इस्राईल की अतिग्रहणकारी सरकार के ख़िलाफ़ धमकी भरा स्वर नहीं अपनाया था। लेकिन उन्होंने अलमनार टीवी के रिपोर्टर एमाद मुरम्मल से बात करते हुए अत्यंत ठोस लहजे मे बातें कीं। उनके जवाबों से उन दिनों की याद आ गई जब वे हिज़बुल्लाह के नए नए महासचिव बने थे क्योंकि उन्होंने इस्राईली दुश्मन से व्यापक मुक़ाबले की रणनीति की बात की और कहा कि यह संघर्ष केवल लेबनान और अतिग्रहित अलजलील की सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगेा बल्कि इतना बढ़ जाएगा कि मध्यपूर्व के नक़्शे से अतिग्रहणकारी इस्राईली सरकार के पूरे तरह मिट जाने की भी संभावना है। अपने इस इंटरव्यू में सैयद हसन नसरुल्लाह ने अनेक अहम बिंदुओं की तरफ़ इशारा किया जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं।

  1. उन्होंने कहा कि अब इस्लामी प्रतिरोध किसी भी समय से अधिक मज़बूत है और वह इस्राईल को पूरी तरह तबाह करके उसे पाषाण युग में पहुंचा सकता है।
  2. सैयद हसन नसरुल्लाह ने एक बार फिर इस बात पर बल दिया कि प्रतिरोध के मीज़ाइल बहुत अधिक सटीक हो चुके हैं और वे उत्तरी इस्राईल के नाक़ूरा से लेकर उसके दक्षिणी भाग ईलात तक को निशाना बना सकते हैं।
  3. उन्होंने अलजलील पर हमले और उसे स्वतंत्र कराने को रणनैतिक प्राथमिकता बताया है जिसका अर्थ यह है कि अतिक्रमण के मुक़ाबले में हिज़बुल्लाह की मीज़ाइल डिफ़ेंस इस्राईल के शहरों पर हमले के लिए नहीं है बल्कि ज़मीनी स्तर पर प्रगति के लिए है।
  4. 33 दिवसीय युद्ध में पराजय के बाद इस्राईली सेना का मनोबल बढ़ाने में ज़ायोनी नेताओं की विफलता से यह सिद्ध हो गया है कि ज़ायोनी सेना में जीत के लिए न तो आवश्यक मनोबल पाया जाता है और न ही उसमें इसकी क्षमता है।
  5. पिछले कई बरसों के दौरान यह पहली बार है जब किसी अरब और मुसलमान गुट के नेता ने अतिग्रहित फ़िलिस्तीन में मस्जिदुल अक़सा की स्वतंत्रता के बाद उसमें नमाज़ पढ़ने की बात कही है। सैयद हसन नसरुल्लाह बैतुल मुक़द्दस और पूरे फ़िलिस्तीन की स्वतंत्रता की इच्छा रखते हैं और सैन्य टकराव व प्रतिरोध के माध्यम से अपनी इस इच्छा को पूरा करना चाहते हैं। वे सेंचुरी डील या फ़ालतू वार्ता जैसी चीज़ों पर भरोसा नहीं करते जिनका परिणाम अरब जगत के अपमान के अलावा और कुछ नहीं निकला है।

 

सैयद हसन नसरुल्लाह अच्छी तरह जानते हैं कि वे क्या कह रहे हैं और यह भी जानते हैं कि कौन सी बात कब कहनी है। जब हम यह कहते हैं कि यह मर्द झूठ नहीं बोलता और धोखा नहीं देता तो हम कोई नई बात नहीं करते और इसी वजह से इस्राईल के लोगों के बीच भी उनका काफ़ी भरोसा है। वे सभी उनकी बातों पर भरोसा करते हैं लेकिन वे अपने प्रधानमंत्री नेतनयाहू समेत किसी भी इस्राईली नेता की बातों पर इतना भरोसा नहीं करते।

 

सैयद हसन नसरुल्लाह की बातों में निकट भविष्य में किसी भी युद्ध में मज़बूती के साथ उतरने का ठोस संकल्प भी दिखाई देता है यानी उन्होंने जो बात कही है वह दुश्मन के ख़िलाफ़ मानसिक युद्ध शुरू करने के लिए नहीं है बल्कि ठोस सूचनाओं और राजनैतिक व सामरिक परिस्थितियों के सटीक आकलन पर आधारित है। वे अब तक दो युद्धों में शामिल हुए और दोनों में विजयी रहे। पहला युद्ध वर्ष 2000 का था जिसमें हिज़्बुल्लाह ने दक्षिणी लेबनान को स्वतंत्र कराया और इस्राईल के अतिक्रमण को ख़त्म कर दिया। दूसरा युद्ध 2006 का था जिसमें ज़ायोनी शासन ने लेबनान पर हमला किया था जिसके परिणाम में उसे भारी क़ीमत चुकानी पड़ी थी और उसकी सेना का मनोबल टूट गया था। यह ऐसी सेना थी जिसे अजेय कहा जाता था। अब लगता है कि तीसरी विजय भी दूर नहीं है विशेष कर तब जब क्षेत्र में जंग की आग इस्राईल की ओर से भड़काई जाए। (HN)

साभारः रायुल यौम (अरबी समाचारपत्र)


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