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हज के शुभ अवसर पर विशेष कार्यक्रम- 3

हज के शुभ अवसर पर विशेष कार्यक्रम- 3

ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करते का एक माध्यम हज है।

यद्यपि हर जगह ईश्वर की उपासना की जा सकती है लेकिन ईश्वर ने कुछ जगहों और समय को अपनी मेहमानी के लिए चुना है, जिसमें हज भी है।

आज कल हज की तय्यारी चल रही है और मस्जिदुल हराम ईरान सहित विभिन्न इस्लामी देशों के लाखों लोगों का मेज़बान है। ये लोग पवित्र नगर मक्का गए हैं ताकि हज के संस्कार अंजाम दें। ईश्वर द्वारा शांतिपूर्ण घोषित भूमि पर हर दिन मेहरबान ईश्वर के मेहमानों की तादाद बढ़ रही है।

ईश्वर का एक नाम रहमान है और हाजियों के लिए एक शब्दावली इस्तेमाल होती है और वह है ज़ुयूफ़ुर्रहमान। जिसका अर्थ है मेहरबान ईश्वर के मेहमान। हाजी ईश्वर के घर के दर्शनार्थी हैं और इस घर के स्वामी की मेहरबान, क्षमाशील, दानशील और बंदों के लिए रोज़ी और कृपा का द्वार खोलने वाले जैसे शब्दों से प्रशंसा की गयी है। हज में इन श्रद्धालुओं को रहमान अर्थात मेहरबान ईश्वर का मेहमान कहा गया है। रहमान का अर्थ है जिसकी कृपा सभी प्राणियों और सभी इंसानों पर हो चाहे कृपा का पात्र बनने वाला एकेश्वरवादी हो या न हो, चाहे उसके वजूद का इंकार करता हो फिर भी उसकी कृपा और अनुकंपाओं से लाभ उठाता हो।

इस समय मेहरबान ईश्वर के मेहमान ईश्वरीय संदेश वही उतरने की भूमि पर पहुंच गए हैं। दुनिया के विभिन्न देशों व शहरों से लाखों श्रद्धालु ईश्वर के घर पहुंचे हैं ताकि उससे संधि करें। उनके पास एहराम नामी सफ़ेद कपड़े के सिवा कुछ नहीं है क्योंकि कृपाल व दानशील ईश्वर के सामने कुछ ले जाने की ज़रूरत नहीं है। ये लोग आए हैं कि ईश्वर की कृपा व मेहरबानी से लाभान्वित हों और एकेश्वरवाद के ध्वज के नीचे इकट्ठा हों।

जिस समय ईश्वर अहम नेमतों व अनुकंपाओं के बारे में पवित्र क़ुरआन में वर्णन करता है तो अपने दूतों से कहता है कि वे इन नेमतों को याद रखें। जैसा कि बनी इस्राईल को दी गयी नेमतों के बारे में ईश्वर बक़रह सूरे में कहता हैः हे बनी इस्राईल उन नेमतों को याद रखो जो हमने तुम्हें दी। काबे के बारे में भी आया है कि इस नेमत को याद रखो। जैसा कि बक़रह सूरे की आयत 125 में ईश्वर कहता हैः याद करो उस समय को जब हमने काबे को लोगों के पलटने और शरण की जगह क़रार दिया।   

हज़ की महाअनुकंपा का उल्लेख पवित्र रमज़ान की दुआओं में भी मिलता है। ऐसा लगता है कि ईश्वर ने अपनी मेहमानी का आरंभ पवित्र रमज़ान और उसका अंत ज़िलहिज्जा के महीने को क़रार दिया है। पवित्र रमज़ान के महीने में पढ़ी जाने वाली एक अहम दुआ में हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें हर साल हज करने का अवसर प्रदान करे।

पवित्र रमज़ान में मेहमानी करने वाला ईश्वर अपने भले बंदों को सिखाता है कि वे उससे हज की दुआ करें। उसके बाद हज के समय उसकी इच्छाओं को पूरा करता है। वहां मांगने की बात नहीं बल्कि वहां देने की बात होती है। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम अपनी प्रार्थना में ईश्वर से कहते हैंः हे पालनहार! हमें उच्च ठहरने की जगह और अपने अंतिम ईश्वरीय दूत के क़ब्र के दर्शन से दूर न कर।

इसलिए मेज़बानी के दो चरण होते हैं। पहला जब मेज़बान मेहमान से कहता है कि उससे कुछ चाहे और दूसरा जब मेज़बान मेहमान को वह देता है जो वह चाहता है।

पवित्र क़ुरआन के व्याख्याकार आयतुल्लाह जवादी आमुली कहते हैंः "हज के अवसर पर हाजियों को ज़ुयूफ़ुर्रहमान कहने का अर्थ यह है कि ईश्वर सीधे तौर  पर अपने मेहमानों की मेज़बानी कर रहा है। ईश्वर की मेहमानी इस प्रकार की है कि इंसान मेहमान भी हो सकता है और मेज़बान भी। चूंकि पवित्र मक्का और पवित्र रमज़ान के महीने में इंसान का मन ईश्वरीय शिक्षाओं को स्वीकार करने के लिए अधिक तय्यार रहता है इसलिए पवित्र मक्का और पवित्र रमज़ान महीने में इंसान ईश्वर का मेहमान भी और मेज़बान भी बन सकता है। इसलिए इस मेज़बानी में मेहमानी भी है और मेहमानी के साथ मेज़बानी भी है।"

आम लोगों के यहां जब दावत होती है तो मेहमान मेज़बान के दस्तरख़ान पर जो चीज़ होती है उसे स्वीकार करता है, लेकिन ईश्वर की मेहमानी में उसकी कृपा का दस्तरख़ान इतना व्यापक है कि जो कुछ चाहिए मिलता है। ईश्वरीय संदेश वही की भूमि पर यह कृपा फैली हुयी है। ईश्वर बिना हिसाब किताब के देता है।

रहमान शब्द पवित्र क़ुरआन में बारंबार आया है। हर सुरे के शुरु में बिस्मिल्लाह कहते समय 113 बार आया है जबकि 56 बार सूरों के बीच में आया है। पवित्र क़ुरआन के व्याख्याकारों के अनुसार, अल्लाह के बजाए रहमान शब्द उन बंदों की मौजूदगी की वजह से है जिन पर ईश्वर की असीम कृपा छायी हुयी है। जो लोग कृपा के केन्द्र की ओर बढ़ते हैं वे ईश्वर की कृपा का दुनिया में और विशेष कृपा के परलोक में पात्र बनते हैं उस वर्षा की तरह जो हर जगह होती है और सबको ईश्वरीय कृपा से लाभान्वित करती है। चाहे इन बंदों के कर्म कम हों ईश्वर उन्हें बहुत ऊंचा स्थान देगा। जेसा कि पवित्र क़ुरआन के फ़ुर्क़ान सूरे की आयत नंबर 75 में ईश्वर कह रहा हैः उन्हें धैर्य व दृढ़ता के बदले स्वर्ग में महल मिलेगा और दुआ व सलाम से उनका स्वागत होगा।

हज करने वाला इंसान चाहे वह अनिवार्य या ग़ैर अनिवार्य हज का इरादा करे, उसका यह सफ़ेर ईश्वर की ओर है और ईश्वर की प्राप्ति के सफ़र का अर्थ उस पर भरोसा करना है। तब उसे हदीद सूरे की आयत नंबर 4 का अर्थ समझ में आता है जिसमें ईश्वर कह रहा है कि तुम जहां कहीं भी हो वह तुम्हारे साथ है। इस आयत के अनुसार, ईश्वर हर जगह मौजूद है। कोई जगह ऐसी नहीं जहां वह न हो। इस बिन्दु पर विश्वास से कि ईश्वर हर समय हर जगह इंसान के कर्म को देख रहा है, इंसान में यह समझ पैदा होती है कि वह पाप न करे। जिस इंसान के दिल में ईश्वर न हो अर्थात एकेश्वरवाद न हो और उसकी ओर से जीवन के लिए निर्धारित चीज़ों पर विश्वास न हो तो ऐसा शख़्स ईश्वर की अवज्ञा व पाप करता है। हज में इंसान ईश्वर के इतना निकट हो जाता है कि रवायत में है कि हाजी विशेष अध्यात्म के साथ लौटता है मानो अभी अभी पैदा हुए बच्चे की तरह पाक है। इसलिए हाजियों से मिलने और उनका सम्मान करने की अनुशंसा की गयी है। हाजी से मिलना पुन्य रखता है। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैः हाजी जब तक पाप न करे उस समय तक हज  का प्रकाश बाक़ी रहेगा।  

इस बात में शक नहीं कि ऐसे अहम मेहमान का हज का प्रबंध करने वालों को सम्मान करना चाहिए। हज बहुत से फ़ायदों के साथ साथ मुसलमानों के सम्मान, अध्यात्म, एकता और शान का प्रतीक है इसलिए ज़रूरी है कि इसके मेहमानों की उचित सेवा हो। ईश्वर के घर का दर्शन करने वालों के लिए सुरक्षा, शांति और सुविधा हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दुआ की विषयवस्तु और ईश्वर का इरादा है। ऐसी स्थिति में जो सरकार हज का प्रबंधन कर रही है उसकी कुछ ज़िम्मेदारी बनती है। उसकी ज़िम्मेदारी है कि वह न सिर्फ़ काबे और हज के संस्कार से संबंधित स्थलों की देखभाल करे बल्कि हर हाजी के लिए सुरक्षा व सुविधा का प्रबंध करे चाहे वह हाजी किसी भी राष्ट्र व जाति का हो। समय और स्थान की दृष्टि से सुरक्षा का आभास इंसान को सुकून देता है। इसी तरह हाजी अशांति के तत्वों की ओर से निर्धारित समयावधि के लिए सुकून का आभास करता है। क्या यह कह सकते हैं कि 2015 में हज के समय मिना में हुयी त्रासदीपूर्ण घटना के लिए सऊदी सरकार ज़िम्मेदार नहीं है? स्पष्ट सी बात है कि सरकारों में मतभेद का मेहरबान ईश्वर के मेहमानों से कोई लेना देना नहीं है। ख़ास तौर पर इस बात के मद्देनज़र की हाजी ईश्वर की प्रसन्नता और उसके आदेश को पूरा करने के लिए सभी भौतिक संबंध से नाता तोड़ लेता है और वतन को छोड़ने जैसी कठिनाई सहन करता है। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया हैः "जो कोई ईश्वर और प्रलय पर आस्था रखता है उसे अपने मेहमान का सम्मान करना चाहिए।"

इस संबंध में इस्लामी क्रान्ति के नेता ने हज विभाग के कर्मचारियों से कहा हैः सऊदी अरब सहित जो लोग हज के मामलों के मक्का और मदीना में ज़िम्मेदार हैं उन पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। इन लोगों पर हाजियों की सुरक्षा सुनिश्चित बनाने की ज़िम्मेदारी है। हाजियों की प्रतिष्ठा व सम्मान को सुनिश्चित करें। हाजियों का सम्मान ज़रूरी है क्योंकि वे मेहरबान ईश्वर के मेहमान हैं। उनका सम्मान होना चाहिए। किसी  भी व्यवहार से हाजियों की प्रतिष्ठा को नुक़सान पहुंचना हाजियों के अपमान के समान है जिसकी रोकथाम होनी चाहिए। अलबत्ता सुरक्षा के नाम पर बहुत ज़्यादा कड़ाई भी नहीं होनी चाहिए। हाजियों की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाएं लेकिन माहौल ऐसा न हो कि हाजी सुरक्षा के नाम पर घुटन का आभास करे। शांतिपूर्ण माहौल होना चाहिए।

अंत में एक अहम बिन्दु हाजियों से संबंधित है। चूंकि वे एकेश्वरवाद के मुसाफ़िर और इस्लामी सम्मान व शक्ति के अग्रदूत हैं इसलिए इस भव्य अवसर पर शिष्टाचार व सदाचारिता का नमूना बनें। विनम्रता, सहयोग, एकता, प्रेम और ईश्वर पर आस्था के साथ वास्तविक मुसलमानों की छवि पेश करें। अगर इस तरह हज हो तो वह ऐसी महासभा बन जाएगा कि उससे, आंदोलन व बदलाव की बयार बहेगी।


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