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हज के शुभ अवसर पर विशेष कार्यक्रम- 2

हज के शुभ अवसर पर विशेष कार्यक्रम- 2

काबा वह पवित्र घर है जो लोगों के दिलों को अपनी ओर खींचता है और लोग उसकी परिक्रमा करते हैं।

जिस तरह कबूतर तेज़ी से अपने घरों की ओर जाते हैं उसी तरह महान व सर्वसमर्थ ईश्वर के घर का दर्शन करने वाले तेज़ी से उसकी ओर बढ़ते हैं। काबा दुनिया का सबसे पहला और पवित्रतम घर है। यह इंसान के आवास का पहला बिन्दु है। काबा अंधेरी दुनिया में चेराग़ और मानवता के मार्गदर्शन के दीप की भांति प्रज्वलित है।

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम फरमाते हैं" जब आदम स्वर्ग से दुनिया में आये तो वह जिस स्थान पर थे वहां के एकांतवास से उन्होंने ईश्वर से शिकायत की। ईश्वर ने स्वर्ग से उनके लिए एक ख़ैमा भेजा। जिब्राइल वह ख़ैमा वहीं लेकर आये जहां काबे को होना चाहिये था और उसे लगा दिया। उस खैमे के जो मूल स्तंभ थे वह लाल रंग के माणिक थे। उसकी जो चार कीलें थीं वह पीले रंग की शुद्ध सोने की थीं और उसकी जो रस्सी थी वह जामुनी रंग के धागों से बुनी गयी थी। उसके चारों कोनों पर क्रम से चार पत्थर रखे गये थे। एक पत्थर सफा पर्वत का, एक पत्थर सीना पर्वत का, एक पत्थर सलाम पर्वत का और एक पत्थर अबू कुबैस पर्वत का।

सर्वसमर्थ व महान ईश्वर सूरे हिज्र की 21वीं आयत में कहता हैः कोई चीज़ नहीं है किन्तु यह कि उसका खज़ाना और वास्तविकता हमारे पास है और हम उसे नाज़िल नहीं करते हैं किन्तु नियत मात्रा में। इसी प्रकार महान ईश्वर सूरे अनआम की 75वीं आयत में कहता है" और इस प्रकार हमने इब्राहीम को ज़मीन और आसमान के ख़ज़ाने को दिखा दिया ताकि वह विश्वास करने वालों में से हो जायें। यह आयत और इस जैसी दूसरी आयतें इस वास्तविकता की सूचक हैं कि दुनिया, आसमान और ज़मीन और जो कुछ इन सबमें है उन सबके के विदित रूप के अलावा एक आंतरिक, वास्तविक और मलकूती रूप भी हैं। इस आधार पर पवित्र नगर मक्का में जो काबा है उसका एक आंतरिक व आसमानी रूप भी है। दूसरे शब्दों में दुनिया में जो काबा है आसमान में मौजूद उस काबे की भांति है जिसकी परिक्रमा फरिश्ते करते हैं और उस काबे का नाम बैतुल मामूर है और फरिश्ते महान ईश्वर का गुणगान करते हैं और उसके बंदों के लिए क्षमा याचना करते हैं जबकि इंसान फरिश्तों की भांति दुनिया में मौजूद काबे की परिक्रमा करते हैं।

काबे के नाम से ही ज्ञात है कि वह एक घनाकार मकान है जिसे काले और विभिन्न प्रकार के कठोर पत्थरों से बनाया गया है। काबे का हर छोर चारों दिशाओं पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में से किसी एक की ओर है और हर छोर को रुक्न कहा जाता है। यह रुक्न इस प्रकार हैं रुक्ने शर्की और उसे रुक्ने हजरुल असवद भी कहा जाता है। एक अन्य रुक्न का नाम रुक्ने शुमाली है और वह रुक्ने इराकी के नाम से प्रसिद्ध है जबकि एक दूसरे रुक्न का नाम रुक्ने ग़र्बी है। इसी प्रकार एक रुक्न का नाम रुक्ने जुनूबी है और उसे रुक्ने यमानी भी कहते हैं। रुक्ने यमानी काबे का दक्षिणी छोर है और लगभग उसके सामने यमन देश है और वह रुक्ने हजरुल असवद से पहले है। इस रुक्न के बगल में वह दीवार है जो हज़रत फातेमा बिन्ते असद के लिए फटी थी ताकि वह काबे में जाकर अपने बच्चे हज़रत अली अलैहिस्सलाम को जन्म दें। इस जगह को बारमबार सीसा या चांदी से भरा गया ताकि वह निशान मिट जाये परंतु शताब्दियों का समय बीत जाने के बाद काबे की दीवार जो फटी थी और उसके फटने से जो चिन्ह बन गया था उसे आज तक नहीं मिटाया जा सका और अब सऊदी अरब की तानाशाही सरकार ने इस वास्तविकता को छिपाने के लिए उस दीवार पर बड़ा पर्दा डाल दिया है।

काबे के आस- पास मकामे इब्राहीम जैसे बहुत से पवित्र और ऐतिहासिक स्थल हैं। मक़ामे इब्राहीम वह स्थान है जहां हज़रत इब्राहीम महान ईश्वर की उपासना के लिए खड़े होते थे और हर हाजी को चाहिये कि वह काबे की परिक्रमा करने के बाद हज़रत इब्राहीम का अनुसरण करते हुए मकामे इब्राहीम पर खड़ा हो और काबे की ओर मुंह कर नमाज़ पढ़े। इसी प्रकार काबे के पास चांद के स्वरूप की एक छोटी दीवार बनाई गयी है और यह दीवार हिज्रे इस्माईल के नाम मशहूर है। यह वह जगह है जहां हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम का घर था और वहीं पर हज़रत इस्माईल, हाजर और कुछ पैग़म्बरों को दफ्न भी किया गया है।

मस्जिद के कोने में कुंआ या ज़मज़म नाम का सोता भी है। यह वही सोता है जो चमत्कारिक रूप से फूटा था और हज़रत हाजर एवं उनके बेटे हज़रत इस्माईल प्यासे थे। यह उस वक्त की बात है जब मक्का में प्रचंड गर्मी पड़ती थी और वहां किसी प्रकार की सुविधा नहीं थी। मस्जिद के बाहर दो पत्थर के टीले हैं एक का नाम सफ़ा है जबकि दूसरे का नाम मरवा है और हज करने वाले को चाहिये कि वह इन दोनों पहाड़ियों के बीच सात बार आये- जाये और हज के विशेष वस्त्र एहराम के साथ और पूर्ण निष्ठा के साथ महान ईश्वर से दुआ करे और स्वयं को महान ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए तैयार करे।

काबे की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह ईश्वर का घर है यानी वहां से एकेश्वरवाद का संदेश पूरी दुनिया में फैला है।

इमाम जाफ़र सादिक अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं" चार छोर होने की वजह से काबे का नाम काबा रखा गया है। जब इमाम से पूछा गया कि काबे के चार छोर क्यों हैं तो इमाम ने जवाब में फरमाया चूंकि बैतुल मामूर के चार छोर हैं। इमाम से फिर सवाल किया गया कि बैतुल मामूर के चार छोर क्यों हैं? इमाम ने जवाब में फरमाया क्योंकि अर्शे एलाही के चार छोर हैं। फिर इमाम से सवाल किया गया कि अर्शे एलाही में चार छोर क्यों हैं? तो इमाम ने इसके जवाब में फरमाया चूंकि इस्लाम की बुनियाद चार शब्दों पर रखी गयी है। सुब्हानल्लाह, वलहम्दो लिल्लाह, व ला एलाहा इल्लल्हो वल्लाहो अकबर। अतः नमाज़ और दूसरे कार्यों के समय काबे की ओर मुंह करना वास्तव में तौहीद अर्थात एकेश्वरवाद की ओर मुंह करना है। हम अपने विदित चेहरों को काबे की ओर करते हैं ताकि हमारा आंतरिक रूप भी बैतुल मामूर की ओर हो जाये और हमारे दिल का संपर्क अर्शे एलाही से हो जाये और हमारी आत्मायें महान ईश्वर के नामों से मुलाकात करें।

काबा इस्लामी उपासनाओं और मुसलमानों के सामाजिक जीवन में केन्द्रीय भूमिका रखता है। मुसलमान एक दिन रात में पांच बार काबे की ओर मुंह करके नमाज़ पढ़ते हैं। इस समय दुनिया के लाखों और करोड़ों मुसलमान रात- दिन में एक नियत समय पर नमाज़ पढ़ते हैं और यह कार्य उनके दिलों को एक दूसरे के साथ निकट होने का कारण बनता है। महान ईश्वर ने मुसलमानों का आह्वान किया है कि वह विश्व के जिस कोने में भी हों काबे की ओर मुंह करके नमाज़ पढ़ें।

यहां यह जानना रोचक होगा कि चूंकि ज़मीन अंडाकार है और दुनिया के बहुत से शहरों की किबले की दिशा भिन्न है इसलिए कोई न कोई व्यक्ति हर वक्त किबले की ओर नमाज़ पढ़ता और दुआ करता रहता है। इस प्रकार से कि यह सिलसिला हमेशा जारी है और कभी भी बंद नहीं होता यानी जिस तरह से फरिश्ते हर  वक्त अर्शे एलाही का तवाफ और उसका गुणगान करते रहते हैं उसी तरह पूरी दुनिया के मुसलमान हर वक्त और हर स्थान से काबे की ओर नमाज़ पढ़ते- रहते हैं।

काबा केवल पत्थरों से बनी एक चीज़ नहीं है कि अगर उसे दूसरी जगह ले जाया जाये तो दूसरे काबे का निर्माण किया जा सकता है। अतः काबे को परिवर्तित नहीं किया जा सकता और वह उसी स्थान पर रहेगा जहां वह हमेशा से था। वास्तव में काबे का निर्माण हज़रत आदम के काल से हुआ है तब से लेकर आज तक उसका स्थान परिवर्तित नहीं हुआ है। अबरहा और हाथियों पर सवार उसके सिपाहियों की प्रसिद्ध कहानी इसका स्पष्ट उदाहरण व प्रमाण है।

अबरहा ने सौगंध खा रखी थी कि वह खाने काबा को ध्वस्त कर देगा। वह और उसके सिपाही हाथियों पर सवार होकर मक्का की ओर रवाना हो गये। मक्का के लोगों ने जब अबरहा की भारी सेना को देखा तो वे डर गये और भयभीत होकर पास के पहाड़ों में शरण ली। इस बीच मक्का वासियों में केवल पैग़म्बरे इस्लाम के दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब अलैहिस्सलाम थे जो अबरहा की सेना के आ जाने के बाद भी मक्का से नहीं हटे और इस बहुत ही संवेदनशील स्थिति में वह परेशान हो गये और उन्होंने महान ईश्वर की शरण ली। उन्होंने काबे के उपर डाले पर्दे में अपने हाथों को लटका लिया और महान ईश्वर से इस प्रकार प्रार्थना की। हे मेरे पालनहार! जिसके पास जो कुछ है उससे वह काबे की रक्षा करेगा तू भी अपने घर की रक्षा कि यह तेरी महानता का प्रतीक है। अगले दिन सुबह महान ईश्वर की अनुमति से आसमान में परिन्दे दिखाई दिये जबकि उनकी चोंचों में एक- एक कंकरी और दो- दो कंकरी उनके पंजों में थी। परिन्दों ने उन कंकरी को अबरहा के सिपाहियों पर फेंक दिया जिससे उसकी सेना तबाह हो गयी और अबरहा भी भाग  गया। इस प्रकार ईश्वर की सहायता से काबा ध्वस्त होने से बच गया।

काबा ज़मीन पर पवित्रता का प्रतीक है। इसे हज़रत आदम, हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माइल जैसे पैग़म्बरों ने बनाया है और वह हर प्रकार की अपवित्रता से पवित्र है। जैसाकि महान ईश्वर सूरे हज की 26वीं आयत में कहता है” उस वक्त को याद करो जब हमने काबे की जगह को इब्राहीम के लिए तैयार कर दिया ताकि वह उसका निर्माण करें और हमने उन्हें संदेश भेजा कि किसी भी चीज़ को हमारा समतुल्य करार न देना और मेरे घर को परिक्रमा करने वालों, नमाज़ पढ़ने वालों, रुकूअ करने वालों और सज्दा करने वालों के लिए पवित्र बनाओ।“

पैग़म्बरे इस्लाम ने भी मक्का की ऐतिहासिक विजय के अवसर पर खानये काबा को हर प्रकार की मूर्तियों से पवित्र किया। उस समय काबे के अंदर और बाहर लगभग 360 मूर्तियां थीं। इसके अलावा पहले के कुछ पैग़म्बरों की प्रतिमायें भी काबे की दीवारों में लगाई गयीं थीं। पैग़म्बरे इस्लाम ने मक्का विजय के अवसर पर इन सबको भी काबे से हटा दिया। जर्मन विशेषज्ञ बरखर्ट,,,,, काबे के अंदर और बाहर मौजूद मूर्तियों को तोड़ने के रहस्य के बारे में लिखते हैं” अगर काबा इंसानों का दिल हो तो उसके अंदर मौजूद मूर्तियां इच्छाओं की सूचक होंती हैं जो दिलों को घेरे रखती हैं और वह ईश्वर तक पहुंचने के मार्ग की रुकावट और बाधा होती हैं। इस आधार पर मूर्तियों को तोड़ना और हर उस चीज़ को हटा देना जिसके मूर्ति होने की संभावना है दिल को पवित्र बनाने और महान ईश्वर तक पहुंचने का सबसे अच्छा रास्ता है और ला एलाहा इल्लल्लाहो यानी ईश्वर के सिवा कोई पूज्य नहीं है इस वाक्य के सही अर्थ को समझने का बहुत अच्छा माध्यम है।




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