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हज के शुभ अवसर पर विशेष कार्यक्रम- 1

हज के शुभ अवसर पर विशेष कार्यक्रम- 1

हज का मौसम आ गया है लोग हज की यात्रा की तैयारी कर रहे हैं।

अब लोग उस धार्मिक संस्कार को अंजाम देने की तैयारी कर रहे हैं जिसकी वे वर्षों से कामना कर रहे थे और उसके लिए रात- दिन गिनते थे। हज करने के लिए लोग वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश उतरने की भूमि की ओर जाने की तैयारी कर रहे हैं ताकि वहां हज संस्कार अंजाम दे सकें। जिस तरह नमाज़- रोज़े को अंजाम देने के लिए समय और स्थान को दृष्टि में रखा गया है उसी तरह हज अंजाम देने के लिए समय और स्थान को ध्यान में रखा गया है। इसका अर्थ यह है कि जिस तरह नमाज़ पढ़ने का एक समय होता है और उसे हर स्थान पर अंजाम नहीं दिया जा सकता है उसी तरह हज को न तो हर वक्त अंजाम दिया जा सकता है और न ही हर स्थान पर अंजाम दिया जा सकता है। हज केवल सऊदी अरब के पवित्र नगर मक्का में ही अंजाम दिया जा सकता है।

हज का अर्थ इरादा करके गंतव्य की ओर चलना है और हज का जो अर्थ प्रचलित है वह यह है कि ज़िलहिज्जा के महीने में काबे के दर्शन और हज संस्कार को अंजाम देने के लिए मक्का की ओर रवना होना है। महान ईश्वर ने बंदगी का यह मार्ग प्रशस्त करने और अपना सामिप्य प्राप्त करने के लिए हज़रत इब्राहीम को आदेश दिया कि वह उसके घर को हर उस चीज़ से पवित्र बनायें जो उस तक पहुंचने की दिशा में बाधा बने और उसके घर का दर्शन करने वाला केवल उसके बारे में सोचे और उसके घर की परिक्रमा करे और अंधकार से मुक्ति प्राप्त करे ताकि महान ईश्वर की असीम दया, कृपा और प्रेम के घर में उसका मेहमान बन सके और ब्रह्मांड के रचयिता अपने पालनहार की उपासना कर सके।

जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने बेटे हज़रत इस्माइल की सहायता से काबे की दीवार ऊंची कर रहे थे तो उन्होंने कहा हे पालनहार! मैंने अपनी बीवी- बच्चे को तेरे घर के पास सूखे मरुस्थल में बसा दिया है ताकि नमाज़ कायेम करें। उसके बाद उन्होंने महान ईश्वर से कहाः हे पालनहार! तू लोगों के दिलों को उनकी ओर कर दे और अपनी बर्कत व विभूति से उन्हें आजीविका प्रदान कर, ताकी वे तेरा आभार व्यक्त करें।

रवायत में है कि जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्लाम ने काबे का निर्माण पूरा कर लिया तो ईश्वरीय वाणी आयी कि हे इब्राहीम लोगों को इस घर के दर्शन के लिए बुलाओ। तो हज़रत इब्राहीम ने कहा हे मेरे पालनहार इस मरस्थल में मेरी आवाज़ कहां तक जायेगी? तो ईश्वरीय वाणी आयी कि तुम केवल घोषणा कर दो मैं उसे पहुचाऊंगा। इसके बाद हज़रत इब्राहीम अलैहिस्लाम महान ईश्वर के आदेश से एक पत्थर पर खड़े हो गये और उन्होंने आवाज़ दी हे लोगो! यह ईश्वर का घर है तो उसका दर्शन करो। महान ईश्वर ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की आवाज़ को प्रलय के दिन तक सबके कानों तक पहुंचा दिया और लोगों ने इस आवाज़ को सुना और उन्होंने इसका जवाब दिया लब्बैक अल्ला हुम्मा लब्बैक। उसके बाद से प्रतिवर्ष दुनिया के कोने- कोने से लाखों मुसलमानों हज करने जाते और उसके अनगिनत आध्यात्मिक व ग़ैर आध्यात्मिक फायदों से लाभ उठाते हैं।  

आज हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दुआ को बेहतरीन ढंग से कबूल हुए शताब्दियों का समय बीत रहा है। क्योंकि प्रतिवर्ष हज़ारों नहीं बल्कि लाखों मुसलमान प्रेम और निष्ठा के साथ पवित्र नगर मक्का जाते हैं और वहां वे महान ईश्वर की बंदगी का पवित्रतम व श्रेष्ठतम स्वरूप पेश करते हैं। हज अनगिनत शिक्षाओं, यादों और अनुभवों से भरा पड़ा है। जो लोग पवित्र नगर मक्का और मदीना के दर्शन के लिए जाते हैं वे एक विशेष आध्यात्मिक वातावरण में पहुंच जाते हैं। इन नगरों में जगह- जगह एतिहासिक यादें हैं और उन स्थानों को देख कर बहुत सारी एतिहासिक घटनाएं नज़रों में घुमने लगती हैं। हज को प्रथम पैग़म्बर हज़रत आदम, हज़रत इब्राहीम और अंतिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा से वचनबद्धता समझा जा सकता है।

जो लोग काबे के दर्शन के लिए जाते हैं उनके प्रेम का चित्रण हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस प्रकार करते हुए कहते हैं" प्यासे लोग जिस तरह पानी के सोते की ओर जाते हैं उस तरह हज करने वाले काबे की ओर जाते हैं और कबूतरों की भांति उसके प्रति प्रेम को दर्शाते हैं, वे पैग़म्बरों के स्थान पर खड़े होते हैं और जो फरिश्ते अर्श की परिक्रमा करते हैं उनकी तरह वे काबे की परिक्रमा करते हैं। वे उपासना के बाज़ार से लाभ कमाते हैं और क्षमा याचना की ओर जाते हैं। ईश्वर ने काबे को इस्लाम का चिन्ह करार दिया है और शरण चाहने वालों के लिए सुरक्षित घर करार दिया है।"

ईश्वरीय दूतों और पैग़म्बरों के मध्य हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का विशेष स्थान है। महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन के 25 सूरों में हज़रत इब्राहीम का 69 बार नाम लिया है और उनकी कुछ विशेषताओं व सद्गुणों को पवित्र कुरआन में बयान किया है। महान ईश्वर पवित्र कुरआन में उन्हें एक मुसलमान और मोमिन के रूप में पेश करता है। चूंकि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम लोगों के इमाम थे और मोमिनों के आदर्श थे इसलिए हज में उनके समस्त कार्य या वाजिब अर्थात अनिवार्य हैं या सुन्नत यानी ग़ैर अनिवार्य हैं और ये कार्य व परंपरायें सदैव के लिए हज्जे इब्राहीमी के रूप में बाकी हैं। अतः महान ईश्वर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के स्थान को बाकी रखने के लिए कहता है” उस समय को याद करो जब हमने काबे को वापसी का स्थान बना दिया और लोगों के लिए शांति व सुरक्षा का केन्द्र करार दिया और इब्राहीम के स्थान की याद को बाकी रखने के लिए उसका चयन अपनी उपासना के लिए करो।“

हज्जे इब्राहीमी से तात्पर्य वही हज है जिसे महान ईश्वर ने अपने बंदों पर अनिवार्य किया है और उसकी घोषणा का आह्वान उसने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से किया था और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के काल में उसे जीवित किया गया।

वास्तव में हज्जे इब्राहीमी वही वास्तविक हज है जिसे महान ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने और अनेकेश्वरवाद से विरक्कता जताने के लिए अंजाम दिया जाता है। हज्जे इब्राहीमी इंसान को अनेकेश्वरवाद और अत्याचार के प्रतीकों से संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। इसी प्रकार हज्जे इब्राहीमी इस्लाम और मुसलमानों की शक्ति और प्रतिष्ठा का निमंत्रण देता है और वह केवल हज के विदित संस्कारों को अंजाम देने के बारे में नहीं सोचता है बल्कि इसके अलावा वह इन संस्कारों के वास्तविक अर्थों पर भी ध्यान देता है और हर हाल में वह इन्हें दृष्टिगत रखता है।   

ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई भी इस संबंध में कहते हैं” हज्जे इब्राहीमी वही हज्जे मोहम्मदी है जिसमें एकेश्वरवाद, एकता और आध्यात्मिकता की ओर बढ़ना है और वह समस्त कार्यक्रमों व नारों का आदर्श है। हज बर्कत और मार्गदर्शन का माध्यम है। वह जीवन और एक इस्लामी राष्ट्र का असली स्तंभ है, हज ईश्वर की याद के लाभों व हितों से समृद्ध है, वह हज जिसमें मुसलमान राष्ट्र अपनी उपस्थिति का आभास करते हैं, भाईचारे और निकटता का आभास करते हैं और कमज़ोरी के आभास से मुक्ति पाते हैं। हज्जे इब्राहीमी वह हज है जिसमें मुसलमान बिखराव से एकता की ओर आगे बढ़ते हैं और उस काबे की ओर बढ़ते हैं जो एकेश्वरवाद की याद और अनेकेश्वरवाद व मूर्तिपूजा से विरक्तता का रहस्य है और मुसलमान उसके अर्थ को समझ कर उसकी परिक्रमा करते हैं और हज के विदित संस्कार से उसके आंतरिक रहस्य तक पहुंचते हैं और हज से अपने और इस्लामी राष्ट्र के जीवन के लिए लाभ उठाते हैं।“

हज अंजाम देने में जो एक सूक्ष्म बिन्दु निहित है वह यह है कि हज केवल उन लोगों पर अनिवार्य है जो आर्थिक दृष्टि से हज करने की क्षमता रखते हैं। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार जो व्यक्ति हज कर सकता है यानी हज संस्कार को अंजाम देने की शारीरिक क्षमता रखता है और आर्थिक दृष्टि से भी वह हज के खर्चे को आसानी से वहन कर सकता है तो उस पर हज करना अनिवार्य है। वास्तव में जिन लोगों के पास धन आदि की क्षमता अधिक होती है उनमें दूसरों की अपेक्षा बुराइयों की ओर जाने की अधिक संभावना होती है। दूसरे शब्दों में अगर इंसान के पास आर्थिक क्षमता है परंतु वह आत्मशुद्धि के साथ न हो तो वह इंसान की गुमराही व उद्दंडता का कारण बन सकती है। जिसके पास अधिक ईश्वरीय नेअमतें हैं उसके पास अधिक शारीरिक और आर्थिक क्षमता भी होती हैं इस आधार पर उसे चाहिये कि ज़िम्मेदारी का आभास भी अधिक करे और सदैव आत्म शुद्धि के साथ व्यक्तिगत और सामाजिक दायित्वों के अधिक से अधिक निर्वाह का प्रयास करे। इस आधार पर हज उस इंसान पर अनिवार्य है जो शारीरिक और आर्थिक दृष्टि से हज को अंजाम देने की क्षमता रखता है और वह आत्मशुद्धि के साथ हो ताकि हज समाज में गर्व, अहंकार करने या स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने या दूसरी सामाजिक बुराइयों का कारण न बने।

काबा ईश्वर के मेहमानों का घर है और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम उसकी दया व कृपा का निमंत्रण देने वाले हैं। हज के निमंत्रण की पावन ध्वनि समय के करोड़ो लोगों के कानों में गूंज रही है। यह ईश्वरीय निमंत्रण दूर, निकट, गांवों और शहरों के लोगों को अपनी ओर बुलाता है और महान ईश्वर से प्रेम करने वाले लाखों लोग उसके निमंत्रण पर लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक कहते हुए हज के लिए प्रतिवर्ष जाते हैं।




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