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हज़रत फ़ातेमा मासूमा के जन्म दिवस पर विशेष कार्यक्रम

हज़रत फ़ातेमा मासूमा के जन्म दिवस पर विशेष कार्यक्रम

पहली ज़ीक़ादा सन् 173 हिजरी क़मरी में पवित्र नगर मदीना में हज़रत फ़ातेमा सलामुल्लाह अलैहा का जन्म हुआ था।

पवित्र नगर क़ुम ईरान का वह नगर है जहां ज्ञान- विज्ञान के क्षेत्र में हज़ारों लोग पैदा हुए हैं और आज यह नगर पूरे ईरान में सबसे बड़े धार्मिक शिक्षा केन्द्र के रूप में मशहूर हो गया है और देश- विदेश के हज़ारों छात्र धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने में व्यस्त हैं। इसी नगर में हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की महान बहन हज़रत फ़ातेमा सलामुल्लाह अलैहा का पवित्र रौज़ा है जिसके दर्शन के लिए प्रतिदिन हज़ारों तीर्थयात्री वहां जाते हैं।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र हैं और हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा उन्हीं की महान बेटी और हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की बहन हैं। हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा का जन्म पहली ज़ीक़ादा 173 हिजरी क़मरी में पवित्र नगर मदीना में एसे परिवार में हुआ था जो शिक्षा और नैतिकता का स्रोत था और हज़रत फ़ातेमा सलामुल्लाह अलैहा ज्ञान की दृष्टि से एक महान महिला होने के अलावा समस्त सदगुणों से सुसज्जित थीं। हज़रत फ़ातेमा मामूमा सलामुल्लाह अलैहा के पिता इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम को अत्याचारी शासक अब्बासी ने कारावास में बंद कर रखा था परंतु उनकी प्रशिक्षा अपने भाई इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की देखरेख में हुई। हज़रत फ़ातेमा मामूमा सलामुल्लाह अलैहा की महानता व पवित्रता के कारण इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने उन्हें मामूसा अर्थात हर प्रकार के पापों से पवित्र महिला की उपाधि प्रदान की और फरमाया था कि जो भी क़ुम में मासूमा की ज़ियारत करेगा वह उस व्यक्ति की भांति है जिसने मेरी ज़ियारत की है।

ईश्वरीय धर्म इस्लाम ज्ञान और ईमान को इंसानों के व्यक्तित्व की महानता का कारण मानता है और इंसान जितना इस दिशा में आगे बढ़ता जाता है उतना ही परिपूर्णता का मार्ग तय करता जाता है। पवित्र कुरआन कहता है” जो लोग ईमान लायें हैं और जिन्हें उसने ज्ञान दिया है ईश्वर उन्हें ऊंचे दर्जे प्रदान करेगा और जो कुछ तुम अंजाम देते होते हो उससे ईश्वर पूर्णरूप से अवगत है।

महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरए मुजादेला की 11वीं आयत में हर प्रकार की श्रेष्ठता को रद्द करते हुए कहता है कि ईश्वर के निकट सबसे श्रेष्ठ वह है जिसका तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय सबसे अधिक है। तक़वा वह चीज़ है जो इंसान की आत्मिक पूरिपूर्णता का कारण है कोई भी इंसान चाहे वह मर्द हो या औरत तक़वा के बिना आध्यात्मिक पूरिपूर्णता का मार्ग तय नहीं कर सकता। तक़वा एक आंतरिक शक्ति है जो इंसान को पाप करने और उद्दंडी होने से रोकती है। वास्तव में तक़वा इंसान के अंदर वही काम करता है जो गाड़ी के अंदर ब्रेक करता है। जिस तरह ब्रेक गाड़ी को हर प्रकार के ख़तरे से बचाता है उसी प्रकार तक़वा इंसान को हर प्रकार की बुराई, पाप और उद्दंडता से बचाता है। जो लोग तक़वा से सुसज्जित हैं अंदर से उनकी सोच और उनका दिल इस प्रकार के आराम का आभास करता है कि दुनिया में आने वाले किसी भी तूफान से वे भयभीत नहीं होते हैं। इसी तरह किसी भी प्रकार के तूफान से वे परेशान व विचलित नहीं होते हैं। इस आधार पर वे न केवल किसी प्रकार का ग़म व चिंता नहीं करते बल्कि महान ईश्वर लोक-परलोक में उन्हें जो नेअमतें प्रदान करता है और करेगा उससे वे प्रसन्न हैं पर जिन लोगों के दिल तक़वा से खाली हैं उन्हें इस प्रकार की शांति व आराम नसीब नहीं है।

तक़वा इंसान को सही और ग़लत को समझने और उनके मध्य अंतर करने की शक्ति प्रदान करता है। इसी प्रकार तक़वा इंसान को वह शक्ति प्रदान करता है जिसकी वजह से इंसान शांति के साथ जीवन के उतार- चढ़ाव से घबराता नहीं है। दूसरे शब्दों में जो इंसान मुत्तक़ी है यानी महान ईश्वर से डरता है उसके हाथों में प्रज्वलित दीप है जो इंसान को सीधा रास्ता दिखाता है और उसे गुमराही और बर्बादी के रास्ते से सुरक्षित रखता है। पैग़म्बरे इस्लाम अपने एक निष्ठावान साथी व अनुयाइ अबूज़र से कहते हैं” तक़वा समस्त भलाइयों का स्रोत है।“

महान धार्मिक हस्तियों ने तक़वे को इंसान की परिपूर्णता की सीढ़ी बताया है और उस तक पहुंचने के लिए इंसान को हर प्रकार के ग़लत कार्यों व पापों से परहेज़ करने की ज़रूरत है।

महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन में कहा है कि अगर तक़वा करोगे तो हम तुम्हें सत्य- असत्य को पहचानने की शक्ति प्रदान करेंगे।

पैग़म्बरे इस्लाम के एक साथी ने उनसे पूछा कि तक़वा क्या है? तो आपने फ़रमाया क्या तुम कभी कांटों से भरे रास्ते में चले हो? उसने कहा हां। मैं कांटों से भरे रास्ते में चला हूं। तब पैग़म्बरे इस्लाम ने उससे कहा किस प्रकार चले हो? इस पर उसने कहा जहां भी कांटा था वहां क़दम नहीं रखा और वहां से नहीं चला। उस वक्त पैग़म्बरे इस्लाम ने उस सहाबी से कहा जान लो कि जीवन में बहुत कांटे हैं अगर वहां से नहीं गये जहां जाने से ईश्वर ने मना किया है तो यही तक़वा है।

बहरहाल तक़वा ही वह चीज़ है जो इंसान को शिखर पर पहुंचाता है। और हज़रत फ़ातेमा मासूमा वह महान महिला हैं जिन्होंने अपने तक़वे, उपासना, पवित्रता, सदाचारिता और निष्ठा आदि की वजह से महान ईश्वर के निकट और दुनिया की महान महिलाओं के मध्य विशेष स्थान प्राप्त कर लिया है। हज़रत फ़ातेमा मासूमा करीमये अहलेबैत यानी अहलेबैत की दानी महिला के नाम से मशहूर हैं।   हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा इस्लाम और पवित्र कुरआन की शिक्षाओं के परिप्रेक्ष्य में सफल जीवन की व्याख्या करती थीं और महान व कृपालु ईश्वर से प्रेम और उसकी याद में जीवन गुज़ारती थीं। उन्होंने पूरी तरह धार्मिक शिक्षाओं का पालन किया और कभी भी धार्मिक शिक्षाओं की सीमा से बाहर नहीं निकलीं जिसकी वजह से वह परिपूर्णता के शिखर पर पहुंच गयीं।

इस्लामी विद्वानों और इतिहासकारों का मानना है कि इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की लड़कियों में हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा का विशेष स्थान है। पवित्रता, तक़वा और सदाचारिता आदि सदगुणों में हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा का स्थान बहुत ऊंचा है। इतिहासकारों ने इस बात का वर्णन किया है कि हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा हदीस बयान करती थीं और इस संबंध में उनका विशेष स्थान है। जब इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम उपस्थित नहीं होते थे तो हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा लोगों के प्रश्नों का जवाब देती थीं। एक दिन शीया मुसलमानों का एक गिरोह इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम से कुछ सवालों का जवाब पूछने के लिए पवित्र नगर मदीना गया। उस समय इमाम यात्रा पर थे। उस गिरोह के सवालों का जवाब हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा ने दिया और यह वह समय था जब वह छोटी थीं। उसके अगले दिन वही गिरोह दोबारा इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के घर आया पर उस वक्त तक इमाम यात्रा से वापस नहीं आये थे पर जब इमाम अलैहिस्सलाम यात्रा से वापस आये और उन्होंने हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा द्वारा दिये गये सवालों के जवाब को पढ़ा तो बहुत प्रसन्न हुए और शीया मुसलमानों का गिरोह हतप्रभ व चकित रह गया और इमाम ने फरमाया” बाप बेटी पर न्यौछावर हो जाये।“

प्रलय के दिन महान ईश्वर उस व्यक्ति की शिफाअत को क़बूल करेगा जिसे उसकी अनुमति प्राप्त होगी। स्वयं महान ईश्वर पवित्र कुरआन में कहता है” उस दिन किसी की शिफाअत काम नहीं आयेगी मगर जिसे शिफाअत करने की अनुमति ईश्वर दे।“

शिफाअत करने का सौभाग्य उसे प्राप्त होगा जो अपनी उपासना और पवित्रता की वजह से महान ईश्वर के निकट विशेष स्थान प्राप्त कर लिया हो। इस आधार पर शिफाअत करने वाले के स्थान को प्राप्त करने के लिए बड़े अध्यात्मिक परिश्रम की ज़रूरत है और यह कोई सामान्य स्थान नहीं है यह वह स्थान है जो पैग़म्बरों और ईश्वरीय दूतों व इमामों को प्राप्त है। रिवायतों में इस बात का उल्लेख हुआ है कि जिन लोगों को शिफाअत का अधिकार प्राप्त है उनमें से हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा भी हैं। इस संबंध में इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” उनकी शिफाअत से यानी हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा की शिफाअत से समस्त शीया स्वर्ग में जायेंगे।“

हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा ने अपने पिता इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम से सीखा कि कठिन से कठिन समय में सच बोलना चाहिये और सच का बचाव व रक्षा करना चाहिये और इस संबंध में कभी भी असमंजस का शिकार नहीं होना चाहिये। हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा अपने भाई इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम से बहुत प्रेम करती थीं। सन 201 हिजरी कमरी में जब इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को विवश करके मदीना से खुरासान लाया गया तो भाई के वियोग में हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा बहुत दुःखी हुईं और विलाप किया यहां तक कि वह अपने भाई से मिलने के लिए मदीना से खुरासान के लिए निकल पड़ीं और रास्ते में बहुत सी कठिनाइयों को सहन किया यहां तक कि क़ुम पहुंची। जब कुम के लोगों को हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के आने की शुभ सूचना मिली तो वे सब बहुत खुश हुए और उन्होंने उनका स्वागत किया। रियावत है कि हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा 17 दिनों तक कुम में ठहरीं और वह काफी बीमार थीं   और इसी बीमारी में वह इस दुनिया से परलोक सिधार गयीं और कुम में ही उन्हें दफ्न कर दिया गया और उनकी समाधि पर एक भव्य रौज़े का निर्माण किया गया है और उनकी ज़ियारत के लिए आज देश- विदेश के हज़ारों लोग वहां जाते हैं। इसी प्रकार यह नगर आज धार्मिक शिक्षा का पालना व केन्द्र बना हुआ है जहां हज़ारों छात्र व लोग धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने में व्यस्त हैं।

 


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