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हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम का शुभ जन्म दिवस

हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम का शुभ जन्म दिवस

ईश्वर ने यह दुनिया बनायी, सब कुछ बनाया और इन्सानों को पैदा किया फिर उन्हें एसे ही नहीं छोड़ा बल्कि उनके मार्गदर्शन के लिए इस संसार में जगह जगह अपने चिन्ह छोड़े और इसके साथ ही उसने पवित्र ग्रंथ उतारे और उन ग्रंथों को समझाने के लिए और लोगों को सही मार्ग पर लगाने के लिए अपने दूतों को भी इस धरती पर भेजा।

यह दूत आए मार्गदर्शन किया और इस संसार से चले  गये। यहां तक कि अंतिम ईश्वरीय दूत हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम का काल आया और फिर उनके स्वर्गवास के बाद, समाज के मार्गदर्शन की ज़िम्मेदारी हज़रत अली और फिर उनके वंश के ग्यारह इमामों पर आयी। इन सब ने इन्सानों को सही मार्ग दिखाने की राह में, अपना सब कुछ लुटा दिया। इसी लिए हम उन महापुरुषों के जन्मदिवसर पर खुश और बरसी पर दुखी होते हैं। यह  मार्गदर्शन के लिए इमामत श्रंखला के आठवें सदस्य इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के जन्म की तिथि है। हम आप सब की सेवा में हार्दिक बधाई पेश करते हैं।

अरबी कैलेंडर के ज़ीकादा महीने की 11 तारीख इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का जन्म दिवस है। पैगम्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का जन्म सन 148 हिजरी क़मरी में मदीना नगर में हुआ था किंतु उनका मज़ार, ईरान के मशहद नगर में है। यही वजह है कि इमाम रज़ा अलैहिस्लाम का जन्म दिवस, मशहद नगर में उनके मज़ार में विशेष रूप से मनाया जाता है। 

 

पैगम्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम रज़ा का नाम अली है । उनके पिता, सातवें इमाम, इमाम मूसा काज़िम और उनकी माता का नाम नजमा उम्मुलबनीन था। उनकी सब से प्रसिद्ध उपाधि रज़ा है। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम, को सांसारिक मोह माया से मुक्त, ईश्वर की उपासना में लीन रहने वाला बताया जाता है। विनम्रता, ज्ञान, दानशीलता, वाकपटुता जैसी विशेषताओं की वजह से उन्हें हमेशा इतिहास याद रखेगा। इमाम रज़ा अलैहिस्लाम ने लगभग बीस वर्षों तक समाज का मार्गदर्शन किया जिनमें से 17 साल मदीना नगर में गुज़रे और 3 साल , वर्तमान ईरान के खुरासान क्षेत्र में। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के काल में अब्बासी शासन श्रंखला के तीन शासक हारुन, मुहम्मद अमीन और मामून गुज़रे हैं। 


इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का काल शिया मुसलमानों के विकास व शक्तिशाली होने का काल कहा जाता है और यह सब कुछ उनके पिता इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम की कोशिशों का फल था। शिया इतने शक्तिशाली हो गये थे कि वह सत्ता अपने अधिकार में ले सकते थे यही वजह थी कि अब्बासी शासकों के मन में शिया मुसलमानों का भय बैठ गया और अन्ततः अब्बासी शासक मामून ने  उन्हें ईरान के मर्व नगर बुलाया  और इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम जब मर्व पहुंचे तो मामून ने  अपना उत्तराधिकारी बना दिया  मामून के बहुत अधिक दबाव की वजह से इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया लेकिन इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने शर्तें लगायीं उनसे पता चलता है कि इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम इस पद को स्वीकार करने के लिए कदापि  तैयार नहीं थे  । इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम को उत्तराधिकारी बनाने के पीछे मामून के कई उद्देश्य थे। सब से पहले तो वह अपने राज में शिया मुसलमानों को  खुश करना चाहता था इसी तरह वह अलवी समुदाय के आंदोलनों को भी खत्म करने का इरादा रखता था।  इमाम रज़ा को सत्ता में शामिल करने वह सत्ता पर ढीली पड़ती अपनी पकड़ को मज़बूत करना चाहता था। अब्बासी वंश के बाग़ियों को सज़ा भी देना चाहता था और इन सब के साथ वह इमाम रज़ा अलैहिस्लाम को सत्ता में शामिल करके उनकी अत्याधिक पवित्र हस्ती पर राजनीति का कीचड़ डालने का इरादा रखता था यह अलग बात है कि उसका कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं हुआ । इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की सूझबूझ से मामून अपने लक्ष्य को हासिल करने में  बुरी तरह से नाकाम रहा। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के उत्तराधिकारी बनने के कुछ समय बाद, मक्का, मदीना, सहित अहम इस्लामी शहरों में लोगों के मन से इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का महत्व कम नहीं हुआ बल्कि उनका आध्यात्मिक स्थान और ऊपर उठा, लोगों में इमाम की पहचान बढ़ी, लोग और अधिक संख्या में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पास जाने और  उनके ज्ञान के अथाह सागर से लाभान्वित होने लगे। 

 

मामून शुरु से ही लोगों के मन में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के  प्रति अथाह श्रद्धा देख कर जलता था लेकिन इमाम रज़ा अलैहिस्लाम को अपना उत्तराधिकारी बना कर वह स्वंय अपने ही जाल में फंस गया। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने उत्तराधिकारी का पद स्वीकार करने के लिए कई शर्तें रखी थीं और उन शर्तों के आधार पर उन्होंने स्वंय को सरकारी काम काज से पूरी तरह दूरी अपना ली थी लेकिन उत्तराधिकार के पद पर आसीन होने की वजह से वह बड़े आराम से आध्यात्मिक रूप से पूरे समाज का मार्गदर्शन कर रहे थे जो मामून नहीं चाहता था किंतु अगर वह उन्हें अपदस्त करता तो उन्हें उत्तराधिकारी बनाने की उसकी योजना पर पानी फिर जाता और यदि उन्हें छोड़ देता तो वे समाज को जागरूक बना देते इसी लिए उसने एक साज़िश के तहत उन्हें ज़हर देने  का फैसला किया और इस तरह से सदगुणों से भरे इस महापुरुष का काल समाप्त हो गया। 

 उपाधि वास्तव में किसी भी हस्ती की विशेषताओं को बयान करती है इसी लिए इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने से पहले उनकी कुछ उपाधियों की यदि जानकारी प्राप्त कर ली जाए तो निश्चित रूप से इस महान मार्गदर्शक को समझने में आसानी होगी। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम  की सब से प्रसिद्ध उपाधि रज़ा है। इसकी वजह यह है कि इमाम रज़ा अलैहिस्लाम की करनी और कथनी से यही सिद्ध होता था कि वह ईश्वर की इच्छा के आगे पूरी तरह से नतमस्तक थे और दूसरी वजह यह भी है कि उनकी मदद से ही दास, ईश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं। वास्तव में ईश्वर के हर फैसले से प्रसन्न होना, ईश्वर पर आस्था का बहुत बड़ा दर्जा है और इस चरण तक पहुंचना, इतना सरल नहीं है। 

 

इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की एक अन्य उपाधि " पुकार सुनने वाला"  है। कहा जाता है कि इमाम रज़ा, हर ज़रूरत मंद की पुकार सुनते हैं और उसकी मदद करते हैं। उदाहरण स्वरूप अगर कोई भूखा हो और उसकी कोई भूख मिटा दे तो वह अरबी में " गौस" होता है अर्थात दुसरों की ज़रूरत पूरी करने वाला। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की एक उपाधि " गौस" इसी लिए है क्योंकि वह लोगों की पुकार सुनते हैं और आज भी उनका मज़ार पूरी दुनिया से मशहद जाने वाले श्रद्धालुओं से भरा रहता है। 

 

इमाम रज़ा की उपाधियों में से एक, रऊफ़ अर्थात कृपालु है।  इसका भी यही  कारण यह है कि वे अमीर-ग़रीब, पढे लिखे और अनपढ़, दोस्त  व दुश्मन  सबके साथ समान रूप से व्यवहार करते थे।  वे किसी का मन नहीं दुखाते थे।  वे अत्याचार  व अन्याय के प्रबल विरोधी थे।  इमाम रज़ा  के एक चाहने वाले का कहना है कि इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम अपने परिवार के सदस्यों के साथ बहुत ही कृपालु  थे।  खाने के समय वे सबके साथ बैठकर खाना खाते थे।  उस काल में कि जब दास और दासियों को कोई सामाजिक महत्व प्राप्त नहीं था, इमाम रज़ा  अलैहिस्सलाम  उनसे बहुत ही विनम्रता  व सम्मान के साथ पेश आते ।  उनके घर में एेसे लोगों को पूरा सम्मान मिलता था।  इमाम कहते थे कि यदि इन लोगों के साथ विनम्रतापूर्ण व्यवहार न किया जाए तो यह वास्तव में उनपर अत्याचार के समान है।

 

इमाम रज़ा  अलैहिस्सलाम की एक उपाधि “आलिमे आले मुहम्मद अर्थात मोहम्मद के वंश के ज्ञानी है। यद्यपि सारे इमाम ज्ञानी हैं किंतु इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को उनके युग की विशेष सामाजिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर यह उपाधि दी गयी थी।  यह उपाधिज्ञान पर उनके नियंत्रण की परिचायक है अर्थात वे बहुत बड़े ज्ञानी थे। 

 

इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का युग ऐसा था जब इस्लामी जगत में दर्शन शास्त्र और शास्त्रार्थ का चलन आरंभ हुआ था। इस काल में यूनान के दर्शन की किताबों का अरबी भाषा में अनुवाद होता था और उस पर भरपूर चर्चा होती थी। मामून को यूनान और ईरान की किताबों के अनुवाद में बेहद रूचि थी और वह कुछ लोगों को कुस्तुनतुनिया भेज कर दर्शन शास्त्र, अंक गणित , चिकित्सा और संगीत की दुर्लभ किताबें मंगवाता और फिर उसका अनुवाद कराता था। इब्ने नदीम का कहना है कि मामून ने रोम के राजा से कहा कि वह अपने संग्रह की किताबें मामून के लिए भेंज दे और जब उसने भेजा तो मामून ने सभी किताबों का अरबी में अनुवाद करा लिया । निश्चित रूप से अनुवाद का यह काल मुसलमानों में ज्ञान विज्ञान के विकास में बेहद महत्वपूर्ण रहा लेकिन उसमें कई समस्याएं भी थीं क्योंकि इस्लाम से संबंध न रखने वाले अनुवाद, के दौरान में अपनी राय भी शामिल कर देते थे यही वजह थी कि समाज में विचारों का टकराव बढ़ गया था और लोग पथ भ्रष्ट भी होने लगे थे। इसी लिए इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का काल और उनकी वैज्ञानिक गतिविधियां , बेहद महत्वपूर्ण व निर्णायक समझी जाती हैं। 

 

मामून ने इस प्रकार से ज्ञानियों को तैयार करने के बाद इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को मदीना से मर्व बुलाया और मर्व नगर में अक्सर व शास्त्रार्थ कराता और वैज्ञानिक बहसें आयोजित कराता जिसका उसका उद्देश्य, इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के ज्ञान पर प्रश्न चिन्ह लगाना था लेकिन उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और लोगों के मन में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के ज्ञान विज्ञान की छाप और गहरी हो गयी। इन सब कारणों के आधार पर इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को  " आलिमे आले मुहम्मद " अर्थात मुहम्मद के वंश का ज्ञानी, की उपाधि मिली। 

 

इमाम रज़ा को साबिर अर्थात संयमी भी कहा जाता था क्योंकि उन्हों ने हर अवसर पर सब्र व संयम व सहनशीलता का प्रदर्शन किया इसी प्रकार उन्हें सिद्दीक़ अर्थात सच्चा कहा जाता है क्योंकि वह हमेशा और हर हाल में सच बोलते थे और सब को सच बोलने की सिफारिश करते थे। आप सब की सेवा में एक बार फिर इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के जन्म दिन की बधाई हो। 


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