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सुप्रीम कोर्ट इलेक्टरल बॉन्डस के संबंध में गोपनीयता को हटा सकती थी, ऐसा हुआ नहीं जो बहुत बुरा है, राजनैतिक पार्टियों को 200 करोड़ तक चंदा, क्या कोई फ़्री में देगा?

सुप्रीम कोर्ट इलेक्टरल बॉन्डस के संबंध में गोपनीयता को हटा सकती थी, ऐसा हुआ नहीं जो बहुत बुरा है, राजनैतिक पार्टियों को 200 करोड़ तक चंदा, क्या कोई फ़्री में देगा?

भूतपूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2017 के बजट भाषण में कहा था कि राजनैतिक फ़न्डिंग में पारदर्शिता के बिना, साफ़ सुथरा चुनाव मुमकिन नहीं है।

वित्त मंत्रालय ने हर तिमाही को राजनैतिक दलों के लिए इलेक्ट्रल बॉन्ड्स बेचने के लिए अपनी खिड़की 1-10 अप्रैल तक खोल दी है। ऐसा उसने पिछले हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट के इस स्कीम को बाक़ी रखने से इंकार के बाद किया है।

सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने नया मुद्दा उठाया-राजनैतिक दलों को मिलने वाले पैसों का आतंकवाद या हिंसक प्रदर्शन जैसी ग़लत गतिविधियों में इस्तेमाल -और केन्द्र सरकार से पूछा कि क्या वह इसके आख़िरी इस्तेमाल पर कंट्रोल रखती है। मेरी आरज़ू थी कि काश सुप्रीम कोर्ट ने जनादेश को बदलने के लिए चुनाव बाद एमएलए की ख़रीदारी जैसे संदिग्ध ख़र्च के नए क्षेत्र का भी ज़िक्र किया होता।

यह मुद्दा फ़रवरी 2017 से कार्यवाही का इंतेज़ार कर रहा है जब अपने बजट भाषण में भूतपूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दो अहम बयान दिए। एक राजनैतिक फंडिंग में पारदर्शिता के बिना साफ़ सुथरा चुनाव मुमकिन नहीं है और दूसरा 70 साल से चिंता के बावजूद हम ज़रूरी पारदर्शिता हासिल करने में नाकाम रहे।

चुनावी बॉन्डस वजूद में आए और पारदर्शिता की मौत हो गयी। तब तक 20000 से ज़्यादा के लेन-देन की इलेक्शन कमीशन को सूचना दी जाती थी लेकिन अब 20 करोड़ से 200 करोड़ रूपये बिना नाम ज़ाहिर किए दान हो सकते हैं। इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि दानकर्ता अपना नाम ज़ाहिर करना नहीं चाहता।

सवाल यह उठता है कि दानकर्ता अपना नाम क्यों छिपाना चाहता हैॽ बदले में मिलने वाले फ़ायदों को छिपाने के लिए जैसे ठेके, लाइसेंस और बैंक लोन जिसके साथ कुछ विदेश फ़रार कर जाएंॽ 7 दशक से उद्योग जगत सभी पार्टियों को चंदा देता है। कभी कभी तो एक ही चंदा देने वाले प्रतिद्वंद्वी पार्टी को भी चंदा देता है। क्या कभी किसी सत्ताधारी पार्टी ने कभी किसी चंदा देने वाले को प्रतिद्वंद्वी पार्टी को चंदा देने पर डरायाॽ क्या मौजूदा सत्ताधारी पार्टी ने ऐसा कियाॽ अगर नहीं तो फिर माफ़ी एक ढोंग है। यह पूरी तरह पारदर्शिता में निजी हित का जनहित से टकराव का केस है।

2017 के फ़ायनेन्स ऐक्ट ने रिज़र्ब बैंक ऑफ़ इंडिया ऐक्ट, कंपनीज़ ऐक्ट, इन्कम टैक्स ऐक्ट, रिप्रेज़ेन्टेशन ऑफ़ पीपल ऐक्ट और फ़ॉरेन कन्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन ऐक्ट में बदलाव को पेश किया ताकि चुनावी बॉन्ड्स का रास्ता साफ़ हो।

अगर कोई भी दूसरा देश हमारा चुनावी ख़र्च उठा रहा होगा तो अब उसकी, राज़ के तौर पर रक्षा होगी। दूसरे देशों के चुनावों में विदेशी हस्तक्षेप एक सच्चाई बन कर सामने आ चुका है। यहाँ तक कि सुपरपावर अमरीका ख़ुद को इस अतिक्रमण से नहीं रोक सका वह भी अपने घोषित नंबर एक दुश्मन से। यह गंभीर चिंता का विषय है और किसी भी प्रजातंत्र के चुनावी सिस्टम में क्लंक का टीका है।

सुप्रीम कोर्ट की फ़न्ड के ग़लत इस्तेमाल पर चिंता उचित है। हमें आय के स्रोत  और इसके ख़र्च दोनों में पारदर्शिता लाने की ज़रूरत है। चुनाव आयोग मांग कर रहा है कि ऐसा क़ानून पास हो जिसमें राजनैतिक पार्टियों के लिए अपने अपने खातों की सीएजी या चुनाव आयोग के पैनल द्वारा पेश किए गए ऑडिटर से ऑडिट अनिवार्य हो, पार्टियों के कार्डधारकों से नहीं जो खाते का सफ़ाया कर देते हैं।

अंत में मौजूदा वित्त मंत्री को उनके पूर्ववर्ती के 2017 के बजट भाषण की याद दिलाना चाहते हैं कि राजनैतिक चंदे में पारदर्शिता के बिना साफ़ सुथरा चुनाव मुमकिन नहीं है। (साभारः इंडियन एक्सप्रेस)


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