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सीरिया से सेना निकालना ट्रम्प का बिल्कुल सही फ़ैसला, अब इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान से भी अमरीका को निकल जाना चाहिए!

सीरिया से सेना निकालना ट्रम्प का बिल्कुल सही फ़ैसला, अब इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान से भी अमरीका को निकल जाना चाहिए!

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने सीरिया से सेना बाहर निकालने का फ़ैसला किया तो बहुत से लोगों को जैसे करंट लग गया।

इस फ़ैसले से सबसे बड़ा झटका इस्राईल को लगा क्योंकि इस्राईल को यह महसूस होने लगा कि जिस तरह अमरीका ने मदद का भरोसा दिलाने के बाद सीरियाई कुर्दों को अकेला छोड़ दिया उसी तरह किसी भी मोड़ पर इस्राईल को भी वह अकेला छोड़ देगा।

दूसरा बड़ा झटका सऊदी अरब और इमारात को लगा उन्होंने भी इलाक़े में अमरीका की सैनिक उपस्थिति से बड़ी उम्मीदें लगा रखी थीं। उनको यह आशा थी कि अमरीका में वह सरकार से समझौते करके बड़े बड़े निवेश करेंगे जिसके बदले अमरीकी सेना मध्यपूर्व के इलाक़े में तैनात रह कर उनकी रक्षा ही नहीं करेगी बल्कि उनकी दादागीरी को भी संरक्षण देती रहेगी।

कुर्दो को तो ख़ैर झटका लगना ही था जिन्होंने अमरीकी समर्थन के सहारे न जाने क्या क्या सपने देखना शुरू कर दिए थे।

ख़ुद अमरीका के भीतर ट्रम्प के इस फ़ैसले पर आपत्ति जताई जा रही है यहां तक मांग उठी है कि अमरीकी कांग्रेस ट्रम्प के फ़ैसले पर विचार करे और ज़रूरत पड़े तो इस फ़ैसले को बदल दे।

मगर इस बीच ब्रिटेन के गार्डियन अख़बार ने लेखक साइमन जेन्किन्स का एक लेख छापा है जिसमें लेखक ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि सीरिया से सेना बाहर निकालने का फ़ैसला बिल्कुल सही लेकिन अधूरा है, यह फ़ैसला तब पूरा होगा जब ट्रम्प प्रशासन इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान से भी अपने सैनिकों को बाहर निकाल ले। उन्होंने लिखा कि अभी यह नहीं पता चला है कि ट्रम्प ने कुर्दों का साथ क्यों छोड़ा है लेकिन यह तय है कि बाहरी लड़ाइयों में अमरीका का लगातार शामिल रहना त्रासदीजनक हो सकता है। अमरीकी सेना के पास अब सीरिया में बने रहने का कोई स्ट्रैटेजिक कारण नहीं है और अगर अमरीकी सेना अधिक समय तक यहां रुकती है तो और भी गहरे दलदल में फंस जाने की आशंका बनी रहेगी। दाइश के ख़िलाफ़ जब लड़ाई चल रही थी तब तक तो समझ में यह बात आती थी कि कुर्दों की या दूसरे संगठनों की मदद की जाए लेकिन अब जब दाइश की कमर टूट गई है और पुरानी आपसी लड़ाइयां फिर शुरू हो गई हैं तो अब कुर्दों की कोई मदद करने की ज़रूरत नहीं है।

साइमन के अनुसार ट्रम्प और इससे पहले ओबामा दोनों ने युद्ध समाप्त करने का नारा दिया लेकिन बाद में यह ज़ाहिर हुआ कि अमरीका की हथियार बनाने वाली कंपनियां ज़्यादा ताक़तवर हैं। अब अगर ट्रम्प सारी जंगें समाप्त कर देते हैं तो वह वाक़ई प्रशंसा के हक़दार हैं।


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