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सीरिया से निकलने के ट्रम्प के फ़ैसले का अमरीका के भीतर और बाहर गहरा असर, इस्राईल में चिंता, ट्रम्प की नज़र आर्थिक मुनाफ़े पर

सीरिया से निकलने के ट्रम्प के फ़ैसले का अमरीका के भीतर और बाहर गहरा असर, इस्राईल में चिंता, ट्रम्प की नज़र आर्थिक मुनाफ़े पर

अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान से सैनिकों को वापस बुलाने के एलान के बाद अमरीका के भीतर और बाहर प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं मगर डोनल्ड ट्रम्प अपने फ़ैसले से संतुष्ट दिखाई देते हैं।

डोनल्ड ट्रम्प के बारे मे कहा जाता है कि वह राजनेता से अधिक एक व्यापारी की हैसियत से अपनी पहिचान रखते हैं और रियल स्टेट के बड़े कारोबारी हैं अतः वह हर चीज़ से बढ़कर वित्तीय मुनाफ़े पर ध्यान केन्द्रित रखते हैं। डोनल्ड ट्रम्प को अच्छी तरह पता है कि सीरिया या अफ़ग़ानिस्तान में सैनिकों को तैनात रखकर उन्हें कोई आर्थिक लाभ मिलना बहुत कठिन है क्योंकि हक़ीक़त यह है कि सैनिकों की तैनाती के बावजूद इन दशों में अमरीका अपनी पैठ नहीं बना पाया है।

डोनल्ड ट्रम्प कई बार कह चुके हैं कि अमरीका ने मध्यपूर्व में दो ट्रिलियन डालर ख़र्च कर दिए लेकिन उसके हाथ कुछ नहीं लगा। हालांकि यह बिंदु महत्वपूर्ण है कि अमरीका ने इस इलाक़े में जो भी पैसा ख़र्च किया है वह तबाही फैलाने और आतंकवाद की समस्या को प्रबल करने पर खर्च किया है ताकि इस क्षेत्र की सरकारों को अमरीका की मदद की ज़रूरत रहे जबकि हालात का रुख़ व नहीं रहा जो अमरीका चाहता था। यही कारण है कि ट्रम्प को इस इलाक़े में कोई आर्थिक लाभ नहीं दिखाई दे रहा है।

सीएनएन ने सोमवार को अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प और तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान के बीच होने वाली टेलीफ़ोनी वार्ता के कुछ अंशों को प्रसारित किया जिसमें ट्रम्प ने कहा कि सीरिया का पूरा का पूरा तुम्हारा हमें जो करना था वह हम कर चुके।

ट्रम्प का यह बयान सीरिया की सरकार के लिए आपत्तिजनक है। ट्रम्प के यह कहने का क्या मतलब है कि सीरिया पूरा का पूरा अर्दोग़ान के लिए है। सीरिया एक संप्रभु राष्ट्र है जो संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अनेक अंतर्राष्ट्रीय व क्षेत्रीय संगठनों व संस्थाओं का सदस्य देश है। एसे देश के बारे में किसी अन्य देश के राष्ट्रपति से कहना कि वह पूरा का पूरा तुम्हारा, बहुत निंदनीय बयान है लेकिन ट्रम्प से इस प्रकार के बयानों की हमेशा अपेक्षा रहती है।

ट्रम्प के फ़ैसले से सीरिया में कुर्द फ़ोर्स और उन उग्रवादी संगठनों को ज़ोरदार का झटका लगा है जो अमरीका की मदद से सीरिया के भीतर गतिविधियां कर रहे थे और सीरिया सरकार और सीरियाई सेना के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलना चाहते थे। अब इन संगठनों के पास यही रास्ता बचा है कि वह सीरियाई सरकार से समझौता करें और हथियार डालकर देश में शांति की बहाली की प्रक्रिया में मदद करें।

डोनल्ड ट्रम्प के फ़ैसले से इस्राईल को भी बड़ा झटका लगा है। तेल अबीब युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर इयाल ज़ीसर ने कहा कि ट्रम्प ने जिस तरह फ़ैसला किया है और जिस शैली में वह सीरिया से अपने सैनिकों को निकालना चाहते हैं वह इस्राईल के लिए गहरी चिंता का विषय है।

इस्राईल को यह भय है कि अमरीकी सैनिकों के चले जाने के बाद सीरिया में इस्लामी गणतंत्र ईरान का प्रभाव बढ़  जाएगा। मगर यह भी सच्चाई है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान और सीरिया एक दूसरे के स्ट्रैटेजिक साझीदार हैं अमरीका के रहने या न रहने का उनके आपसी सहयोग  पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है और दूसरी बात यह है कि अब तक ईरान और सीरिया का आपसी सहयोग अमरीका और इस्राईल के कड़े विरोध के बावजूद जारी रहा और इसमें लगातार विस्तार होता रहा है तो भविष्य में भी न अमरीका इसमें रुकावट बन सकता था और न ही इस्राईल के बस में एसा कोई क़दम उठाना था।

ट्रम्प के फ़ैसले से अमरीका के भीतर भी एक तूफ़ान शुरू होने के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। युद्ध मंत्री जेम्ज मैटिस त्यागपत्र दे चुके हैं और दूसरे अधिकारी भी त्यागपत्र देने के इशारे दे रहे हैं। अब तो कुछ लोग यह तक कह रहे हैं कि ट्रम्प के पास अब अपने दामाद और सलाहकार जेयर्ड कुशनर के अलावा बहुत कम ही लोग बचे हैं। बचे हुए लोगों में उनकी बेटी इवान्का और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जान बोल्टन का नाम लिया जा सकता है।

वैसे जेम्ज़ मैटिस और ट्रम्प के बीच मतभेद नया नहीं है। यह तो बाब वुडवर्ड की किताब में भी बताया गया है कि ट्रम्प ने जेम्ज़ मैटिस से कहा था कि वह वेनेज़ोएला के राष्ट्रपति मादोरो की हत्या की योजना तैयार करें जिसे मैटिज़ ने मूर्खतापूर्ण विचार समझ कर टाल दिया था।

अमरीका में बहुत से लोगों का यह विचार है कि ट्रम्प ने जिस प्रकार से फ़ैसला किया है उससे सारी दुनिया को यह संदेश गया है कि पश्चिमी एशिया के इलाक़े में अमरीका का एजेंडा विफल हो चुका है और इस इलाक़े से बाहर निकलने के अलावा अमरीका के पास कोई चारा नहीं है।

वैसे यह संदेश जाए या न जाए तथ्य सबके सामने है कि पश्चिमी एशिया का इलाक़ा अमरीका या उसके घटकों की इच्छ के अनुसार नहीं चल रहा है बल्कि क्षेत्रीय सहयोग की स्थिति बन रही है और इसमें इस्लामी गणतंत्र ईरान की भूमिका निर्णायक है।


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