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सीरिया से अमरीका के निकलने का एलान, इस युद्ध में आख़िर हार और जीत किसकी हुई?

सीरिया से अमरीका के निकलने का एलान, इस युद्ध में आख़िर हार और जीत किसकी हुई?

सीरिया से अपने समस्त सैनिकों को निकालने के अमरीकी राष्ट्रपति के एलान से यह साबित होता है कि अमरीका ने क्षेत्र में ईरान और इस्लामी प्रतिरोध के मुक़ाबले में अपनी पराजय को स्वीकार कर लिया है।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने इसी हफ़्ते आदेश दिया है कि अमरीका के सभी सैनिक अगले 30 दिन में सीरिया से बाहर निकल जायें।

इस्राईल, पेंटागन, ज़ायोनी लॉबी और अमरीका के कई वरिष्ठ अधिकारियों के कड़े विरोध के बावजूद, ट्रम्प ने राष्ट्रपति एकाधिकार का इस्तेमाल करते हुए सीरिया से अमरीकी सैनिकों के निकलने का आदेश जारी किया है।

अमरीका और विश्व में ट्रम्प के इस क़दम का जहां कुछ लोग स्वागत कर रहे हैं तो वहीं कुछ लोग इसका कड़ा विरोध भी कर रहे हैं।

अमरीका ने 2015 में तकफ़ीरी आतंकवादी गुट दाइश के ख़िलाफ़ लड़ाई के बहाने और दमिश्क़ सरकार की बिना अनुमति के सीरिया में अपने सैनिक तैनात किए थे।

यही कारण है कि सीरिया और उसके सहयोगी देशों ने ट्रम्प के सीरिया से निकलने के फ़ैसले पर सधी हुई प्रतिक्रिया जताते हुए इसका स्वागत किया है।

सीरिया में युद्ध और आतंकवाद का समर्थन करने वालों ने जिनमें इस्राईल और सऊदी अरब प्रमुख हैं, ट्रम्प के इस क़दम से ख़ुश नहीं हैं। इन लोगों का मानना है कि सीरिया से अमरीकी सैनिकों के निकलने से दमिश्क़, तेहरान, मास्को, अंकारा और हिज़्बुल्लाह को सबसे अधिक लाभ होगा और बशार असद फिर से पूरे देश पर निंयत्रण कर लेंगे। इससे इस्राईल के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाएगा, क्योंकि इस्राईल ने बशार असद को सत्ता से हटाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था।

हालांकि अभी भी अमरीका के भीतर और बाहर कुछ शक्तियां ट्रम्प पर दबाव बना रही हैं कि सीरिया से निकलने के अपने फ़ैसले पर वह पुनर्विचार करें।

ट्रम्प ने सीरिया से निकलने की घोषणा करते हुए कहा है कि इस देश में हमारा मिशन दाइश को पराजित करना था और हम अपने इस मिशन में सफल रहे हैं। जबकि वास्तविकता कुछ और ही है। सीरिया के मामलों में अमरीकी दूत जेम्स जफ़्री ने नाटो परिषद के सम्मेलन में इस वास्तविकता को स्वीकार किया था। जफ़्री ने कहा था कि वह ज़माना अब गुज़र गया है कि जब अमरीका विश्व की एकमात्र सुपर पॉवर था और अकेले फ़ैसले लेता था, अमरीका को अब दुनिया को उसी रूप में स्वीकार करना होगा जैसी वह है।

हक़ीक़त यही है कि आज की तेज़ी से बदलती दुनिया में ईरान क्षेत्र की एक बड़ी शक्ति है, जिसने आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में सीरियाई और इराक़ी सरकारों का समर्थन किया और फ़िलिस्तीनी एवं लेबनानी इस्लामी प्रतिरोधी आंदोलनों का समर्थन जारी रखे हुए है। 


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