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सऊदी अरब नामक टाइटैनिक जहाज़ अपने तमाम लाव-लश्कर व ताम-झाम के साथ डूब रहा है, जिसे बचाना अब मुश्किल ही नहीं नामुमिक भी है

सऊदी अरब नामक टाइटैनिक जहाज़ अपने तमाम लाव-लश्कर व ताम-झाम के साथ डूब रहा है, जिसे बचाना अब मुश्किल ही नहीं नामुमिक भी है

मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि यह एक युग का अंत है। फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों के युग का अंत, जिनके पास बेतहाशा पैसा था, वह अब ख़त्म हो रहा है। यह शब्द हैं, वाशिंगटन स्थित ब्रूकिंग्र्स में वरिष्ठ शोधकर्ता और पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ ब्रूस रिडेल के।

सऊदी अरब ने पिछले साल हथियारों की ख़रीदारी पर 62 अरब डॉलर ख़र्च किए। दूसरे शब्दों में रियाज़ ने यमनी जनता के सिरों पर 62 अरब डॉलर के बम गिरा दिए। 2018 में तेल से माला-माल इस अरब देश ने इससे भी ज़्यादा पैसा हथियारों पर ख़र्च किया था।

लेकिन तेल की क़ीमतों में भारी गिरावट और कोरोना वायरस महामारी की मार झेल रही अर्थव्यवस्था कब तक यह भारी बोझ अपने कांधों पर उठा सकती है?

यहां यह भी सवाल है कि सऊदी अरब दशकों से हथियारों पर इतना ज़्यादा ख़र्च क्यों कर रहा है?

भ्रष्टाचार और वैश्विक हथियार व्यापार के विशेषज्ञ एंड्रयू फेंस्टीन का कहना हैः अगर सऊदी अरब अरबों डॉलर के हथियार नहीं ख़रीदेगा, तो उसे पश्चिम का समर्थन कैसे हासिल होगा। हथियारों की ख़रीदारी का मतलब यह है कि आप रिश्तों को ख़रीद रहे हैं।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प इस कड़वी सच्चाई को कई बार स्पष्ट शब्दों में बयान कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि सऊदी अरब हमसे हथियार ख़रीदता है, जिससे हमारे देश में लाखों नौकरियां उत्पन्न होती हैं। वह कई बार फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों को दूध देने वाली गाय तक बता चुके हैं।

मार्च 2015 में जबसे सऊदी अरब ने यमन के ख़िलाफ़ ख़ूंख़ांर ख़ूनी खेल शुरू किया है, ब्रिटेन इस देश को क़रीब 5 अरब पाउंड के हथियार बेच चुका है।

इसके अलावा, रियाज़ ने अमरीका और पश्चिमी देशों से आने वाले वर्षों में अरबों डॉलर के हथियार ख़रीदने के समझौतों पर दस्तख़त कर रखे हैं।

सऊदी अरब ने अपने भारी ख़र्चों को पूरा करने के लिए अब जमा पूंजी यानी विदेशी मुद्रा भंडार ख़र्च करना शुरू कर दिया है। इस देश को पिछले कई वर्षों से भारी बजट घाटे का सामना करना पड़ रहा है। एक अनुमान के मुताबिक़, इस साल सऊदी अरब ने 60 डॉलर प्रति बैरल तेल की क़ीमतों को नज़र में रखकर बजट बनाया था, जो अब 25 से 30 डॉलर प्रति बैरल से ज़्यादा नहीं बिक रहा है। इससे भी बड़ी बात यह है कि खोजने से भी कोई तेल का ख़रीदार नहीं मिल रहा है।

इसलिए इस नतीजे पर पहुंचना मुश्किल नहीं है कि सऊदी अरब नामक टाइटैनिक जहाज़ अपने तमाम तामो-झाम और चमक-दमक के साथ डूब रहा है, जिसे बचाना अब मुश्किल ही नहीं नामुमिक भी है।


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