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सऊदी अरब और क़तर की सुलह, रियाज़ की एक और हार!

सऊदी अरब और क़तर की सुलह, रियाज़ की एक और हार!

सऊदी अरब, क़तर के साथ अपने संबंधों में पैदा होने वाले संकट से इज़्ज़त के साथ निकलना चाहता था और इसी लिए उसने अमरीका से मध्यस्थता की अपील की।

कुवैत के विदेश राज्य मंत्री ख़ालिद जारुल्लाह ने क़तर और सऊदी अरब के संबंधों में पाए जाने वाले संकट की समाप्ति की सूचना देते हुए बताया है कि दोनों के बीच अंतिम सहमति हो गई है। हालांकि उन्होंने इस संबंध में अधिक ब्योरा नहीं दिया लेकिन उनका यह बयान, सऊदी अरब के विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फ़रहान के उस बयान के बाद सामने आया जिसमें उन्होंने सऊदी अरब और क़तर के दृष्टिकोणों को निकट लाने में अमरीका व कुवैत की कोशिशों की सराहना की। सऊदी अरब ने संयुक्त अरब इमारात, बहरैन और मिस्र के साथ मिल कर क़तर पर आतंकवाद के समर्थन का आरोप लगाया था और 5 जून 2017 को इन देशों ने क़तर के साथ अपने सभी संबंध पूरी तरह तोड़ लिए थे। इसके बाद इन देशों ने क़तर के साथ मिलने वाली अपनी सभी जल, थल और वायु सीमाओं को बंद कर दिया था। इन देशों ने क़तर की घेराबंदी समाप्त करने के लिए 13 शर्तें रखी थीं जिनमें से क़तर ने अब तक एक भी शर्त नहीं मानी है।

 

कुवैत ने ऐसी हालत में क़तर और सऊदी अरब के बीच सुलह की ख़बर दी है कि जब अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के दामाद और सलाहकार जेरेड कूश्नर ने हाल ही में क़तर और सऊदी अरब का दौरा किया है। ज़्यादातर संचार माध्यमों ने कहा कि यह दौरा, मध्यस्थता के लिए हुआ है या दूसरे शब्दों में अपने संबंधों को सामान्य बनाने के लिए सऊदी अरब और क़तर पर दबाव डालने के लिए कूश्नर ने इन देशों का दौरा किया है। क़तर की ओर से सऊदी अरब की एक भी शर्त न माने जाने के बावजूद उसके साथ संबंध सामान्य बनाने के सऊदी अरब के फ़ैसले के बारे में दो विचार पाए जाते हैं। पहला यह कि सऊदी अरब, अमरीका की वर्तमान सरकार के दबाव पर यह फ़ैसला करने पर मजबूर हुआ है और दूसरा यह कि रियाज़ ख़ुद ही इस संकट से इज़्ज़त के साथ निकलना चाह रहा था और उसने अमरीका से मध्यस्थता की अपील की है।

 

टीकाकारों का कहना है कि यह दोनों ही विचार सही हो सकते हैं क्योंकि एक तरफ़ सेंचुरी डील के निर्माता के रूप में जेरेड कूश्नर ज़ायोनी शासन के साथ अरब देशों के संबंध स्थापित कराने की योजना को आगे बढ़ाने के लिए इस तरह के अवसर की ताक में थे और दूसरी तरफ़ सऊदी अरब और विशेष कर इस देश के युवराज मुहम्मद बिन सलमान ने भी, जिन्हें विभिन्न समस्याओं का सामना है और जो अमरीका की अगली सरकार के रवैये की ओर से भी चिंतित हैं, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अमरीका से निवेदन किया होगा कि वह इस संबंध में मध्यस्थता करे और क़तर पर दबाव डाले। दूसरे विचार के परिप्रेक्ष्य में यह भी कहा जा सकता है कि सऊदी अरब अमरीका की अगली सरकार के सामने अपनी सकारात्मक छवि पेश करने की कोशिश में है।

 

उधर यह बात भी दृष्टिगत रहनी चाहिए कि सऊदी अरब और क़तर के मतभेदों का समाधान, क्षेत्र में अपनी शैतानी साज़िशों को आगे बढ़ाने के लिए इस्राईल की इच्छा के भी अनुकूल है। अलबत्ता इस बारे में जो चीज़ बहुत अहम है, वह यह है कि सऊदी अरब को यमन युद्ध में हार और अन्य मामलों में फ़ज़ीहत के बाद साढ़े तीन साल बाद क़तर की घेराबंदी ख़त्म करने पर एक और हार का सामना करना पड़ा है जबकि उसकी कोई भी शर्त पूरी नहीं हुई है। सऊदी अरब ने क़तर के सामने जो शर्तें रखी थीं उनमें ईरान व तुर्की से कूटनैतिक संबंध तोड़ना, अपनी धरती से हमास व मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों को निकालना, अलजज़ीरा टीवी का प्रसारण बंद करना और इस चैनल के प्रसारण के कारण फ़ार्स की खाड़ी सहयोग परिषद के पांच सदस्यों से माफ़ी मांगना शामिल है। इसके अलावा इस दौरान मुसलमानों की नज़र में सऊदी अरब की जो हैसियत थी, उस पर बुरी तरह से बट्टा लग गया है।


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