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सऊदी अरब, ईरान के बाद अब सीरिया से भी अपने संबंध बहाल करने की कोशिश में!

सऊदी अरब, ईरान के बाद अब सीरिया से भी अपने संबंध बहाल करने की कोशिश में!

सऊदी अरब की ख़ुफ़िया एजेंसी के चीफ़ ख़ालिद हमीदान के नेतृत्व में एक सऊदी प्रतिनिधि मंडल ने सीरिया की यात्रा करके इस देश के राष्ट्रपति बश्शार असद से मुलाक़ात की है। दोनों पक्ष सभी मैदानों में अपने संबंधों की बहाली के लिए पहले क़दम के रूप में दमिश्क़ में सऊदी दूतावास को फिर से खोलने पर सहमत हुए हैं। सऊदी प्रतिनिधि मंडल ने कहा है कि रियाज़, अरब लीग में सीरिया की वापसी और इसी तरह इस लीग के अगले सम्मेलन में उसकी सम्मिलिति का स्वागत करता है।

सीरिया के साथ अपने संबंधों को बहाल करने की सऊदी अरब की कोशिश के कारणों की समीक्षा के लिए पहले, पिछले एक दशक में सीरिया के बारे में रियाज़ की नीतियों पर एक नज़र डालनी होगी। पिछले एक दशक में सऊदी अरब सीरिया सरकार का कड़ा विरोधी और इस देश में मौजूद आतंकी गुटों के सबसे बड़े समर्थकों में से एक रहा है। उसने सीरिया की सरकार को गिराने के लिए अरबों डाॅलर ख़र्च किए। रियाज़ समझ रहा था कि अरब जगत में आने वाले बदलाव और चार तानाशाहों को उनकी राजगद्दी से उतार दिए जाने के बाद क्षेत्र में प्रतिरोध का मोर्चा अधिक मज़बूत हो जाएगा और शक्ति का संतुलन प्रतिरोध के मोर्चे के पक्ष में न जाने देने के लिए सीरिया की सरकार को गिरा देना चाहिए जो इस मोर्चे के केंद्र में है। सऊदी अरब के साथ ही अमरीका, संयुक्त अरब इमारात, तुर्की, ज़ायोनी शासन और कुछ यूरोपीय देशों ने भी सीरिया की सरकार के ख़िलाफ़ काम शुरू किया और आतंकी गुटों का समर्थन किया।

 

अब सवाल यह पैदा होता है कि सऊदी अरब ने सीरिया के बारे में अपना रुख़ क्यों बदल दिया है? इस सवाल के जवाब में तीन अहम कारण पेश किए जा सकते हैं।

  1. पहली वजह ये है कि सीरिया की सरकार को गिराने की सारी कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं। सऊदी अरब और सीरिया विरोधी सरकारों को लग रहा था कि वे आतंकी गुटों का समर्थन करके और दमिश्क़ पर चौतरफ़ा दबाव डाल कर सीरिया की सरकार को बदल सकते हैं लेकिन इस देश के संकट के 11वें  साल में सीरिया के 90 प्रतिशत इलाक़े इस देश की सरकार के नियंत्रण में हैं और देश के भीतर और बाहर उसकी राजनैतिक स्थिति भी काफ़ी मज़बूत है।
  2. दूसरा कारण यह है कि सीरिया की सरकार को गिराने में विफलता की वजह से सीरिया विरोधी ख़ैमे में फूट पड़ गई है। सीरिया विरोधी गठजोड़ में सऊदी अरब के एक मुख्य घटक के रूप में संयुक्त अरब इमारात काफ़ी पहले ही उससे अलग हो चुका है और उसने दमिश्क़ से संबंध बहाल कर लिए हैं। अन्य अरब देश भी चाहते हैं कि सीरिया, अरब लीग में वापस आ जाए। दूसरी तरफ़ अमरीका की नई सरकार के रुख़ को देखते हुए भी यह बात अच्छी तरह समझ में आ जाती है कि अब पश्चिमी एशिया का इलाक़ा, वाॅशिंग्टन के लिए प्राथमिकता नहीं रखता।
  3. तीसरी वजह यह है कि रियाज़ इस नतीजे पर पहुंच गया है कि क्षेत्र के बारे में उसने जो सपने देख रखे थे वे चकनाचूर हो चुके हैं। सीरिया व यमन में सऊदी अरब की सरकार न सिर्फ़ यह कि अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी बल्कि उसे खुली पराजय का भी मुंह देखना पड़ा है। इन पराजयों के साथ ही ईरान व क़तर से तनाव जैसी समस्याएं इस बात का कारण बनी हैं कि क्षेत्र में सऊदी अरब की पोज़ीशन पहले की तुलना में काफ़ी कमज़ोर हो जाए। इस लिए सऊदी अरब की सरकार ने हालिया महीनों में अपनी कई क्षेत्रीय नीतियों विशेष कर ईरान व सीरिया के बारे में अपने रुख़ में पूरी तरह बदलाव किया है। 

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