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संकटों की छाया में बाइडन के राष्ट्रपति काल की शुरुआत!

संकटों की छाया में बाइडन के राष्ट्रपति काल की शुरुआत!

जो बाइडन ने आख़िरकार एक विवादित और बहुचर्चित चुनाव के बाद अमरीका के 46वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण कर ली।

उन्होंने अपने राष्ट्रपति काल के आरंभिक भाषण में दो अहम विषयों पर बल दिया, जिनमें से पहला अमरीकी प्रजातंत्र और दूसरा सभी अमरीकियों के बीच राष्ट्रीय एकता है। बाइडन ने चुनाव परिणाम को अमरीका में प्रजातंत्र की जीत बताया और सभी लोगों व राजनैतिक गुटों से अपील की कि वे अपने मतभेद किनारे रख दें। 

 

अपने इस भाषण के कुछ ही देर बाद बाइडन ने एक बयान में, जिसे वाइट हाउस ने जारी किया, बीस जनवरी को, जिस दिन राष्ट्रपति शपथ ग्रहण करता है, राष्ट्रीय एकता के दिन का नाम दिया। अलबत्ता पिछले कुछ महीनों में अमरीका में सामने आने वाली घटनाओं से पता चलता है कि इस देश में प्रजातंत्र की कमज़ोरी और समाज में पाई जाने वाली दरारें इससे कहीं अधिक गहरी हैं कि राष्ट्रपति के एक भाषण या वाइट हाउस की ओर से एक बयान से दूर हो जाएं। यह बात प्रत्याशित थी कि अमरीका की नई सरकार राष्ट्रीय एकता की रक्षा और प्रजातंत्र के कमज़ोर पड़ चुके स्तंभों को मज़बूत बनाने पर बल देगी लेकिन बुधवार को, जब ट्रम्प सत्ता से अलग हुए और बाइड हाउस में पहुंचे, जो दृश्य सामने आए उनसे पता चल गया कि अमरीका में मतभेद कितने गहरे हो चुके हैं।

 

ट्रम्प ने देश के अगले राष्ट्रपति के शपथग्रण समारोह में शामिल होना तक ज़रूरी नहीं समझा और बाइडन ने भी राष्ट्रपति बनने के बाद अपने पहले भाषण में अपने पूर्ववर्ती के बारे में कोई इशारा नहीं किया। इस शपथग्रहण समारोह के लिए 25 हज़ार सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था और उनकी संख्या समारोह में शामिल होने वाले लोगों से भी ज़्यादा थी। हालिया महीनों में अमरीकी प्रजातंत्र की उपयोगिता और उसकी रक्षक संस्थाओं पर अनेक सवाल खड़े किए गए हैं। ट्रम्प की ओर से चुनाव में धांधली के अनेक दावों की अनदेखी करते हुए, अमरीकी चुनाव में धन के व्यापक वर्चस्व को इस देश में प्रजातंत्र को कमज़ोर करने वाले एक अहम कारक के रूप में देखा जा सकता है। इसी तरह इलेक्टोरल वोट के आधार पर राष्ट्रपति के चुनाव की कमज़ोरियां भी खुल कर सामने आई हैं। बहुत से लोगों का कहना है कि अमरीका, डेमोक्रेटिक व्यवस्था पर नहीं बल्कि कैपिटलिज़म पर आधारित है।

 

दूसरी ओर अमरीका में राजनैतिक व सामाजिक दरारें भी दिन प्रतिदिन गहरी होती जा रही हैं। यहां तक कि पिछली गर्मियों में एक गोरे पुलिसकर्मी के हाथों एक अश्वेत जवान की हत्या ने अमरीका को कई महीने तक हिंसा, लूटपाट और चरमपंथ के मैदान में बदल दिया था। हालिया महीनों में चरमपंथी दक्षिणपंथी गुटों और आंतरिक आतंकियों के ख़तरे के बारे में कई बार चेतावनियां दी जा चुकी हैं। हर दिन इन गुटों की संख्या और इनके प्रभाव में बढ़ोतरी हो रही है और अमरीकी समाज चरमपंथ की तरफ़ बढ़ता जा रहा है।

 

इन हालात में अमरीकी प्रजातंत्र को मज़बूत बनाने और राष्ट्रीय एकता उत्पन्न करने का बाइडन का वादा किसी हद तक असंभव या कम से कम बहुत मुश्किल दिखाई देता है। इसी वजह से अमरीका के मशहूर लेखक फ़्रांसिस फ़ूकोयामा ने इस देश के राजनैतिक व सामाजिक हालात पर चिंता प्रकट करते हुए कहा है कि अमरीका को अधिक हिंसा की प्रतीक्षा में रहना चाहिए।


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