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शहादते इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम

शहादते इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम

बनी उमय्या और बनी अब्बासी ख़लिफाओं ने अपने शासन काल में पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के प्रति जो लोगों में प्रभाव था उसे रोकने व कम करने का बहुत प्रयास किया।

क्योंकि वे इन महान हस्तियों के पवित्र अस्तित्व को अपनी अत्याचारपूर्ण और पाखंडी व धूर्त नीतियों के मार्ग की सबसे बड़ी रुकावट समझते थे इसी कारण वे पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों पर अधिक से अधिक दबाव डालते थे और उनके लिए कठिन से कठिन परिस्थिति उत्पन्न करते थे। अब्बासी शासकों ने इमाम अली नक़ी और इमाम हसन अस्करी अलैहिमस्सलाम के खिलाफ जो कठिनाइयां, समस्यायें और सीमाएं उत्पन्न की थीं वे अपने चरम पर पहुंच गयीं थीं इस प्रकार से कि वे लोगों विशेषकर अपने चाहने वालों के मध्य उपस्थित नहीं हो सकते थे। अब्बासी ख़लिफ़ाओं ने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम को उनके पिता इमाम अली नक़ी अलैहिस्लाम के साथ सामर्रा ले गये और वहां पर इन महान हस्तियों पर कड़ी नज़र रखी और उनके लिए कठिन से कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर दी। इराक का सामर्रा नगर  अब्बासी ख़लिफाओं की सरकार का केन्द्र था।

अब्बासी ख़लिफ़ाओं में सबसे अधिक मोअतमिद अब्बासी ने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम और उनके चाहने के साथ सख्तियां बरती और कुछ समय तक इमाम को जेल में डाल दिया। मोअतमिद अब्बासी सत्ता का भूखा इंसान था और वह जानता था कि अगर इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम आज़ादी के साथ लोगों का मार्ग दर्शन करते रहे तो देर- सवेर उनके चाहने वाले उसकी सत्ता का अंत कर देंगे। दूसरी ओर मोअतमिद और दूसरे अब्बासी शासकों ने पैग़म्बरे इस्लाम के हवाले से यह हदीस सुन रखी थी कि इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के यहां एक बेटा पैदा होगा जो पूरी दुनियां से अत्याचार और अत्याचारी सरकारों का अंत कर देगा। इसी कारण इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम पर कड़ी नज़र रखी जाती था। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम इस संबंध में फरमाते हैं” बनी अब्बासी और बनी उमय्या ने दो कारणों से हमें अपनी तलवारों का लक्ष्य बनाया। पहली वजह यह है कि वे जानते थे कि ख़िलाफत और इस्लामी सरकार उनका अधिकार नहीं है और उसमें उनका कोई हक़ नहीं है। वे इस बात से डरते थे कि कहीं हम सही सरकार की स्थापना के लिए आंदोलन न कर दें और दूसरी वजह यह है कि वे सही व स्पष्ट हदीसों से यह समझ गये थे कि अत्याचारी सरकारों का अंत इमाम महदी के हाथों होगा और वे अच्छी तरह जानते थे कि वे अत्याचारी हैं। इन सबने पैग़म्बरे इस्लाम के वंश की हत्या करने का प्रयास किया ताकि इमाम महदी का जन्म ही न हो परंतु ईश्वर नहीं चाहता था कि वे उसके स्थान को जानें यहां कि उसकी सरकार अस्तित्व में आये यद्यपि काफिरों को भी यह बात पसंद नहीं थी”

अब्बासी शासकों ने पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के साथ जो भी अत्याचार कर सकते थे किया परंतु उनका यह अत्याचार और सख्ती इस बात का कारण न बन सकी कि इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम लोगों का मार्गदर्शन न करें। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम हर क्षेत्र में अपने समय के सबसे बड़े नेता और विद्वान थे। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के काल में एक दल था जो हदीसों को बयान करता था और हदीस बयान करने वाले दल के सदस्य लोगों का आह्वान पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों और विशुद्ध इस्लाम का अनुसरण करने के लिए करते थे। 

इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम अपने ज़माने की बहुत सारी कठिनाइयों एवं समस्याओं के बावजूद उन चीज़ों से मुकाबला करते थे जो धर्म के नाम पर धर्म में शामिल की जा रही थीं। शुद्ध इस्लाम धर्म की शिक्षाओं को बयान करना, शीयों के साथ संपर्क करने के साधनों को बनाना और महामुक्तिदाता इमाम महदी अलैहिस्सलाम की ग़ैबत अर्थात नज़रों से ओझल होने के काल के लिए उन्हें तैयार करना उन कार्यों में से हैं जिसे इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने अंजाम दिये हैं। महान ईश्वर की उपासना करने में भी इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम सर्वोपरि और सबके आदर्श थे। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के एक अनुयाई अबूहाशिम जाफ़री कहते हैं” जब नमाज़ का समय हो जाता था तो इमाम हर काम छोड़ देते थे और किसी भी काम को नमाज़ पर प्राथमिकता नहीं देते थे। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम का अस्तित्व ईश्वर की बारगाह में उपासना व विन्रमता का सुन्दर उदाहरण था। इतिहास में आया है कि अब्बासी शासकों के कुछ कारिन्दों विशेषकर कारावास के कुछ कर्मियों ने इमाम की उपासना व प्रार्थना को देख कर सत्य को समझा और इस तरीक़े से उन्होंने मुक्ति व कल्याण का रास्ता प्राप्त किया।

इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम अपने समय के सबसे बड़े दानी थे और अधिकांश इस्लामी क्षेत्रों में उन्होंने अपना प्रतिनिधि निर्धारित कर रखा था ताकि लोगों से धार्मिक कर वसूल करने के बाद ग़रीबों, निर्धनों और दरिद्रों में बांट दें और अपने प्रतिनिधियों से वचन कर रखा था कि इस माल को मुसलमानों के मध्य मतभेदों को दूर करने और उनके कल्याण के दूसरे कार्यों पर खर्च करें। साथ ही इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम जीवन की कठिनाइयों का मुकाबला करने के साथ लोगों का आह्वान धैर्य से काम लेने के लिए करते थे। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम अपने एक साथी व अनुयाई से फरमाते हैं” जहां तक धैर्य कर सकते हो करो और किसी से न कहो क्योंकि हर दिन के लिए नई आजीविका है और जान लो कि लोगों से कहने व मांगने में आग्रह करने से इंसान का मूल्य ख़त्म हो जाता है तो धैर्य करो ताकि ईश्वर तुम्हारी ओर द्वार खोल दे। समस्त नेअमतों का एक समय है तो जिस फल का समय अभी नहीं हुआ है उसे मांगने में जल्दी न करो अपने समय पर ही उससे लाभांवित होगे।“

इसी प्रकार इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम अपने समस्त अनुयाइयों से अपेक्षा रखते हैं कि वे चिंतन- मनन से काम लें। वह फरमाते हैः सोच- विचार से काम लो! वास्तव में सोच, जागरुक जीवन का कारण और हिकमत व तत्वदर्शिता का द्वार है” जो इंसान चिंतन- मनन नहीं करते हैं और वास्तविकताओं को देखने में वे ध्यान से काम नहीं लेते हैं प्रलय के दिन उन्हें अंधा उठाया जायेगा। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने इस्हाक़ बिन इस्माईल नीशापुरी के नाम एक पत्र लिखा है उसमें उन्होंने इस वास्तविकता को बयान किया है। इमाम लिखते हैं" हे इस्हाक़! तुम पर और तुम जैसों पर, जिन पर ईश्वर ने कृपा की है और तुम्हारी तरह देखते व समझते हैं, ईश्वर ने अपनी नेअमत पूरी कर दी है। तो हे इस्हाक़ निश्चित रूप से जान लो कि जो भी इस दुनिया से अंधा जायेगा यानी वास्विकता को नहीं देखेगा तो उसे परलोक में भी अंधा उठाया जायेगा। हे इस्हाक़ आंखें अंधी नहीं होती हैं बल्कि सीने में जो दिल हैं वे अंधे होते हैं।“

उसके बाद इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम चिंतन- मनन और सोच- विचार के महत्व के बारे में कहते हैं" नमाज़- रोज़ा बहुत अधिक करने का नाम उपासना नहीं है बेशक ईश्वर के कार्यों में बहुत अधिक चिंतन- मनन का नाम उपासना है।"

स्पष्ट है कि ईमान का स्रोत चिंतन- मनन है और उसके बाद अच्छा अमल और महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की याद उपासना है। इसी प्रकार उन चीज़ों को अंजाम देना चाहिये जो मूल्यवान हैं। इसी कारण इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ईश्वर और मौत को याद करने की सिफारिश करते हैं। इसी प्रकार इमाम पवित्र कुरआन की सदैव तिलावत करने और पैग़म्बरे इस्लाम पर दुरूद व सलाम भेजने की सिफारिश करते हैं। इसी प्रकार इमाम फरमाते हैं” सबसे होशियार व बुद्धिमान वह व्यक्ति है जो मौत के बाद की याद में रहे और अपनी अंतरआत्मा को अपने कर्मों के हिसाब- किताब के लिए न्याय करने वाले के समक्ष पेश करे।“

बहरहाल इस प्रकार की महान हस्ती के पावन अस्तित्व को अब्बासी ख़लीफ़ा मोअतमिद सहन न कर सका और उसने अपने एक निकटवर्ती से इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम को ज़हर दिलवा दिया। इमाम इस ज़हर के कारण कई दिनों तक बीमार रहे। इस दौरान अब्बासी ख़लीफ़ा मोअतमिद दरबारी चिकित्सकों को इमाम के पास भेजता रहता था ताकि लोग यह समझें कि इमाम प्राकृतिक व स्वाभाविक रूप से बीमार हैं। कई दिनों के बाद इमाम की बीमारी बहुत बढ़ गयी और शुक्रवार के दिन रबीउल अव्वल महीने की आठ तारीख़ 256 हिजरी कमरी को सुबह की नमाज़ के वक्त इमाम शहीद हो गये और इराक के सामर्रा नगर में उन्हें अपने पिता इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के किनारे दफ्न कर दिया गया।

इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के भाई जाफ़र  बिन अली हैं जो जाफ़रे कज़्ज़ाब अर्थात झूठे जाफ़र के नाम से मशहूर हैं। अवैध ढंग से उन्होंने स्वयं को इमाम बताया और 20 हज़ार दीनार अब्बासी ख़लीफ़ा को भेजा और उसके लिए पत्र लिखा कि हे अमीरुल मोमिनीन! मेरे भाई का स्थान मुझे दे दीजिये” अब्बासी ख़लीफा का दिल यद्यपि इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के द्वेष और दुश्मनी से भरा था परंतु जवाब में उसने लिखा” तुम्हारे भाई का पद व स्थान हमारी ओर से नहीं था बल्कि ईश्वर की ओर से था हमने उनके मूल्य व स्थान को हमेशा नीचे करने का प्रयास किया परंतु पवित्रता, सदाचरण, ज्ञान और उपासना के कारण उनकी महानता में वृद्धि होती गयी। अगर अपने भाई के अनुयाइयों के निकट तुम्हारा भी वही स्थान है तो हमारी पुष्टि की ज़रूरत नहीं है और अगर एसा नहीं है तो मैं कुछ नहीं कर सकता।“

अब्बासी ख़लीफ का यह बयान इस वास्तविकता का सूचक है कि पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों ने सत्य और प्रकाश का जो दीप जलाया है वह कभी भी नहीं बुझेगा और वह लोगों का सदैव पथप्रदर्शन करता रहेगा। जैसाकि पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है" मेरे अहले बैत नूह की नाव की भांति हैं जो भी इस नाव में सवार हो गया वह मुक्ति पा गया और जो भी उसमें सवार नहीं हुआ वह डूब गया।

दोस्तो कार्यक्रम के अंत में एक बार इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की शहादत के दुःखद अवसर पर आप सबकी सेवा में हार्दिक संवेदना प्रस्तुत करते हैं।


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