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वियना में परमाणु समझौते की वार्ता पर सऊदी अरब और इस्राईल की चीत्कारें!

वियना में परमाणु समझौते की वार्ता पर सऊदी अरब और इस्राईल की चीत्कारें!

जैसा की अपेक्षा थी, परमाणु समझौते में अमरीका की वापसी और ईरान पर लगे एकपक्षीय प्रतिबंधों की समाप्ति के लिए वियना में ईरान व गुट चार धन एक की बातचीत का विश्व समुदाय द्वारा स्वागत किए जाने से सऊदी-ज़ायोनी गठजोड़ खिन्न है। इसे रोकने के लिए इस्राईल अपना एक सुरक्षा व सैन्य प्रतिनिधि मंडल वाॅशिंग्टन भेजना चाहता है जबकि सऊदी सरकार भी "ईरान के ख़तरे" के बारे में घिसे-पिटे दावे दोहरा रही है।

इस्राईल के प्रधानमंत्री बेनयामिन नेतनयाहू ने अपने निराशा से भरे हुए अंतिम क़दम के रूप में अगले हफ़्ते वाॅशिंग्टन जाने वाले प्रतिनिधि मंडल से मुलाक़ात की ओर उसे जो बाइडन को उनका यह संदेश देने का दायित्व सौंपा कि परमाणु समझौते में लौटना, इस्राईल के लिए एक ख़तरा है, वे वियना वार्ता का स्वागत नहीं करते और तेल अवीव को ईरान के साथ किसी भी तरह के परमाणु समझौते में कोई रुचि नहीं है, और यह कि इस्राईल, ईरान के ख़िलाफ़ अपनी कार्यवाहियां जारी रखेगा।

 

सऊदी सरकार भी अपने स्तर पर ईरान के ख़िलाफ़ सक्रिय हो गई है और संयुक्त राष्ट्र संघ में उसके स्थायी प्रतिनिधि अब्दुल्लाह मुअल्लेमी ने सुरक्षा परिषद में अपने एक भाषण में ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने की मांग की है। उन्होंने दावा किया है कि उनके देश को, ईरान के परमाणु कार्यक्रम समेत क्षेत्र की सुरक्षा व स्थिरता को ख़तरे में डालने वाली ईरान की भड़काऊ कार्यवाहियों पर गहरी चिंता है। टीकाकारों का मानना है कि इस सऊदी कूटनयिक को इस तरह का बयान ज़ायोनी शासन के बारे में देना चाहिए था जिसके पास 200 से ज़्यादा परमाणु वाॅरहेड हैं, उसने फ़िलिस्तीन पर अवैध क़ब्ज़ा कर रखा है, बैतुल मुक़द्दस को यहूदी बनाने की कोशिश में है, फ़िलिस्तीनियों को बेघर कर रहा है, मस्जिदुल अक़सा में नमाज़ में रुकावट डालता है और आए दिन अरब देशों व राष्ट्रों पर हमले करता रहता है, कुल मिला कर यह कि यह शासन न सिर्फ़ इस इलाक़े बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा व स्थिरता के लिए ख़तरा है।

 

वियना में ईरान व गुट चार धन एक के बीच जारी बातचीत के बारे में सऊदी-ज़ायोनी गठजोड़ के शत्रुतापूर्ण रुख़ के बावजूद समीक्षकों का कहना है कि जो बाइडन की सरकार, ईरान के साथ परमाणु समझौते को बहाल करने का संकल्प रखती है और वियना से मिलने वाली रिपोर्टें इसकी पुष्टि करती हैं। विशेष कर इस लिए कि आर्थिक प्रतिबंध, अधिकतम दबाव, सैन्य धमकी और मानसिक युद्ध जैसे ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका के सभी विकल्प नाकाम हो चुके हैं। इस लिए सऊदी अरब और इस्राईल की ये चीत्कारें, परमाणु समझौते में लौटने के बाइडन के संकल्प को प्रभावित नहीं कर सकतीं।

 

ध्यान योग्य बात यह है कि सऊदी-इस्राईली गठजोड़ ने बराक ओबामा के शासन काल में इस संबंध में की गई अपनी कोशिशों से सबक़ नहीं सीखा है। नेतनयाहू ने मार्च 2015 में वाॅशिंग्टन की यात्रा की थी और ओबामा से मिले बना अमरीकी कांग्रेस में एक भाषण करके सांसदों को उनके राष्ट्रपति यानी बराक ओबामा के ख़िलाफ़ भड़काने व वरग़लाने की कोशिश की थी ताकि वे परमाणु समझौते को परिणाम तक न पहुंचा सकें। ज़ायोनियों से पूरे समन्वय के साथ सऊदी अरब के तत्कालीन विदेश मंत्री सऊद अलफ़ैसल ने भी ईरान व ओबामा प्रशासन के बीच परमाणु वार्ता पर आपत्ति स्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में भाषण का बहिष्कार कर दिया था।

 

यह बात तो निश्चित है कि सऊदी-ज़ायोनी गठबंधन अपनी इन ग़लत कार्यवाहियों और सच्चाई में उलट-फेर के माध्यम से, ईरान के बारे में अपने विचारों को विश्व समुदाय पर थोपने की कोशिश में है। ये दोनों सरकारें ऐसी स्थिति में ईरान को क्षेत्र की सुरक्षा व स्थिरता के लिए ख़तरा बताने की कोशिश कर रही हैं कि जब विश्व समुदाय इस तरह के झूठ को पूरी तरह से ख़ारिज करके अमरीका को, ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते में वापस लौटने की ओर बढ़ाने का संकल्प रखता है और सऊदी-ज़ायोनी गठबंधन की चीत्कारों और चीख़-पुकार पर ज़रा भी ध्यान नहीं देना चाहता। दूसरी ओर अतीत और वर्तमान के अनुभवों ने भी सिद्ध किया है कि इस्राईल, इलाक़े के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है और इस सच्चाई की पुष्टि, अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन, सीरिया, यमन और पूरे क्षेत्र के तथ्यों, दुखों व पीड़ाओं और समस्याओं से होती है। 


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