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विज्ञान की डगर ईरान का सफ़रः ईरानी वैज्ञानिकों ने ऐसी किट बनायी है जिससे व्यक्ति की सूंघने की क्षमता का पता चल सकता है

विज्ञान की डगर ईरान का सफ़रः ईरानी वैज्ञानिकों ने ऐसी किट बनायी है जिससे व्यक्ति की सूंघने की क्षमता का पता चल सकता है

यह मेडिकल किट स्टैन्डर्ड की नज़र से, ईरान में सूंघने की क्षमता को मात्रा की दृष्टि से सुनिश्चित करने वाली पहली किट है।

यह मेडिकल किट स्टैन्डर्ड की नज़र से, ईरान में सूंघने की क्षमता को मात्रा की दृष्टि से सुनिश्चित करने वाली पहली किट है।

इस किट को वायू प्रदूषण की वजह से सूंघने की क्षमता में आए विकार की स्थिति में उपयोग करते हैं। इसी तरह इस किट के ज़रिए पार्किन्सन और अल्ज़ायमर जैसी स्नायु तंत्र को प्रभावित करने वाली बीमारियों का अनुमान लगाने या बच्चों में ऑटिज़्म, हाइपर एक्टिविटी और फ़ोकस न कर पाने जैसे सिम्पटम का पता लगा सकते हैं। इसी तरह इस किट की मदद से उपचार व शोध केन्द्रों में पेशावराना काम करने वालों में सूंघने की क्षमता या सूंघने की क्षमता में आए विकार का पता लगाया जा सकता है।

ईरान के रोयान इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने ऐसे प्रोटीन का पता लगाया है जो महिलाओं के बांझ होने का कारण बनता है। इस शोध के मुताबिक़, प्रोटीन का स्तर ज़्यादा होना, पोलिसिस्टिक ओवरी सिन्ड्रोम से ग्रस्त महिलाओं के बांझ होने का एक कारण है। प्रोटीन ज़्यादा होने से गर्भ की भीतरी परत में भ्रूण के ठहरने की संभावना कम हो जाती है। अंतर्राष्ट्रीय मैग्ज़ीन रिसर्च इन मेडिकल साइंसेज़ में छपे इस शोध का परिणाम दर्शाता है कि पोलिसिस्टिक ओवरी सिन्ड्रोम से ग्रस्त महिलाओं में अपोलिपोप्रोटीम ए-वन, स्वस्थ महिला की तुलना में ज़्यादा होता है। अधिक अध्ययन के ज़रिए आने वाले समय में इस प्रोटीन को नियंत्रित करके बांझपन पर क़ाबू पाया जा सकेगा

मिशिगन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने ऐसे प्रोटीन का पता लगाया है जो महिलाओं की ओवरी में कैंसर के सेल को बढ़ाता है। नए एंटीबॉडी के ज़रिए इस प्रोटीन को घेरा जाता है और मेटास्टैटिस रुक जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि नए शोध के ज़रिए महिलाओं में ओवरी के कैंसर की पूर्व रोकथाम या उसे सीमित किया जा सकता है। 

सेमनान यूनिवर्सिटी में एक ईरानी वैज्ञानिक ने कार्बन नैनोट्यूब से नैनोकम्पोज़िट पोलिमर बनाया है जिसकी विशेषता शेप मेमोरी है। यानी अगर इनका रूप बदल जाए तो विशेष तापमान में यह फिर अपने अस्ली रूप में वापस आ जाता है। ये नैनोकम्पोज़िट पोलिमर, ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री और एरोस्पेस उद्योग में बहुत उपयोगी है। शेप मेमोरी मटीरियल में यह विशेषता होती है कि उन्हें विशेष स्तर के तापमान में अगर गर्म करें तो वे अपनी पहली वाली शक्ल में वापस आ जाते हें। ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में एक मुश्किल एक्सिडेंट के वक़्त बम्पर का टूटना या उसका रंग बदलना है। एक्सिडेंट में बम्पर टूट जाए तो उसे बदल देते हैं लेकिन अगर टेढ़ा हो जाए या पिचक जाए तो उसे उसकी पहले जैसी शक्ल में वापस लाना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि कुछ न कुछ निशान बाक़ी रह जाता है। इस मुश्किल को नैनोकम्पोज़िट पोलिमर दूर कर सकता है।

ईरान की निजी सेक्टर की यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने लैब में किए गए शोध में ऐसा सूती कपड़ा बनाया है जिसमें कई विशेषताएं हैं। यह कपड़ा अल्ट्रावॉयलेट किरणों से रक्षा करता है, ख़ुद से साफ़ हो जाता है, फ़ायर प्रूफ़ है, एंटी बैक्टेरियल, वॉटर प्रूफ़ और ऑयल प्रूफ़ भी है। इसी तरह यह कपड़ा इलेक्ट्रिकल कन्डक्टिविटी की भी विशेषता रखता है। सूती कपड़ों के अधिक इस्लेमाल और ज़िर्कोनियम ऑक्साइड के नैनोपार्टिकल ज़हरीले नहीं होते, इस उत्पाद को अस्पतालों और उन जगहों पर इस्तेमाल किया जा सकता है जहां आग लगने का ख़तरा होता है। इस शोध में एक सादा शैली से बना सूती कपड़ा, ख़ुद से साफ़ होने सहित कई दूसरी विशेषताओं से संपन्न है।    

    ईरान के केमिस्ट्री एन्ड केमिकल इंजीनियरिंग रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने कैंसर के इलाज में प्रभावी दवा कैर्बोप्लाटिन बनाने में सफलता हासिल की है। इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य तकनीकी ज्ञान हासिल करना और कैंसर से पीड़ित मरीज़ों की कीमियोथ्रेपी के ख़र्च को कम करना है। कैर्बोप्लाटिन या पैराप्लाटिन, एन्टिनियोप्लास्टिक दवा है जिसे कई तरह के कैंसर जैसे ब्रेस्ट कैंसर, ओवरी कैंसर, मुत्राशय के कैंसर, फेफड़ों के कैंसर, सिर और गर्दन के कैंसर में इस्तेमाल करते हैं। कैर्बोप्लाटिन कैंसर का इलाज करने वाली दवाओं के उस परिवार से है जिसका कम्पाउंड प्लैटीनियम बेस होता है। यह दवा बिनाइन सेल के बढ़ने की रफ़्तार को कम करती है और इसे बिनाइन कैंसर के इलाज में इस्तेमाल करते हैं।

इस दवा के बनाने की प्रौद्योगिकी कुछ गिने चुने देशों के पास है। सालाना 5 से 8 किलो कैर्बोप्लाटिन दवा ईरान आयात होती है। ईरानी वैज्ञानिक इस दवा को लैब में बनाने में सफल हुए हैं और इसका ख़र्च विदेश से आने वाली इस दवा की तुलना में एक तिहाई है। जब इस दवा का मास प्रोडक्शन होगा तो इसकी लागत इससे भी कम हो जाएगी। 






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