सैयद हसन नसरुल्लाह का भाषण किसी बम धमाके से कम नहीं, प्रतिरोध आंदोलन की ताक़त इस्राईल से ज़्यादा होने का खुला एलान!

सैयद हसन नसरुल्लाह का भाषण किसी बम धमाके से कम नहीं, प्रतिरोध आंदोलन की ताक़त इस्राईल से ज़्यादा होने का खुला एलान!

विचारकों और पत्रकारों का ध्यान हिज्बुल्लाह लेबनान के प्रमुख सैयद हसन नसरुल्लाह के इस बयान पर केन्द्रित हो गया है जो उन्होंने गत मंगलवार की शाम को दिया।

वर्ष 2006 में 33 दिनों तक चलने वाले युद्ध में इस्राईल पर  लेबनान की विजय की 12वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में भाषण देते हुए सैयद हसन नसरुल्लाह ने यह कह कर सबको चौंका दिया कि हिज़्बुल्लाह की ताक़त अब इस्राईल से अधिक हो गई है।

कुछ लोग यह समझते हैं कि सैयद हसन नसरुल्लाह ने अतिशयोक्ति कर दी है क्योंकि अतिग्रहणकारी इस्राईल के पास आधुनिक वायु सेना और हथियार हैं जिनमें अमरीका के बने एफ़-15, एफ़-16 और एफ़-35 शामिल हैं। इसके अलावा उसके पास आयरन डोम नाम की मिसाइल डिफ़ेन्स व्यवस्था है जो वायु हमलों की रोक थाम के लिए स्थापित की गई है।

कोई भी हो इस्राईल की भारी सैनिक शक्ति को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। लेकिन यह भी सच्चाई है कि इतनी अधिक मात्रा में और इतने आधुनिक हथियार होने के ब बावजूद इस्राईल कई दशकों से कोई भी युद्ध नहीं जीत पा रहा है। हालांकि जब तक इस्राईल की लड़ाई कुछ अरब सरकारों से थी तब तक होता था कि इस्राईल के हमले के आगे यह सरकारें तत्काल हार मान लेती थीं और सुरक्षा परिषद को बीच में लाकर युद्ध विराम करवाती थीं।

सरकारों से इस्राईल की जो जंग सबसे अधिक चली वह कुछ दिन की थी कुछ युद्ध को कुछ घंटों के भीतर ही समाप्त हो गए इस क्रम की अंतिम लड़ाई 1973 में हुई जो दस दिन से ज़्यादा नहीं चल सकी। मगर इसके बाद से समीकरण बदल गए। वर्ष 2006 में लेबनान पर इस्राईल ने हमला किया और यह युद्ध 33 दिन चला। वर्ष 2014 में इस्राईल ने ग़ज़्ज़ा पर हमला किया और यह युद्ध 45 दिन चला। दोनों ही युद्ध में इस्राईली सेना एक इंच भी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पायी क्योंकि उसे हिज़्बुल्लाह और हमास की ओर से बहुत भीषण प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।

हम यह मानते हैं कि हम कोई रिटायर्ड जनरल नहीं हैं और न ही सामरिक मामलों के विशेशज्ञ हैं लेकिन हम समस्त अरब जनरलों का पूरा सम्मान करते हुए जो टीवी चैनलों पर नज़र आते हैं यह कहना चाहेंगे कि इनमें से अधिकतर जनरल वह हैं जिन्होंने ने कभी भी एक युद्ध भी नहीं लड़ा और यदि लड़ा है तो वह उसमें जीते नहीं हैं। सैयद हसन नसरुल्लाह हालांकि धर्मगुरुओं का लेबास पहनते हैं लेकिन हम उन्हें अरब जगत का सबसे महत्वपूर्ण स्ट्रैटेजिक जनरल मानते हैं क्योंकि वह जिस युद्ध में भी शामिल हुए उसे जीता ज़रूर है। सैयद हसन नसरुल्लाह ने अपने बयान में जो बात कही उसके आगे हमें कुछ और बयान जोड़ना चाहते हैं। यह बयान इस्राईली जनरलों के हैं।

  1. इस्राईल के सामरिक मामलों के विशेषज्ञ यूसी मीलमैन ने मआरीव अख़बार में इस्राईली जनरलों द्वारा तैयार की गई काल्पनिक स्थिति को पेश किया है हिज़्बुल्लाह और इस्राईल के बीच युद्ध की यह काल्पनिक स्थिति वरिष्ठ इस्राईली जनरलों ने तैयार की है जिनमें चीफ़ आफ़ आर्मी स्टाफ़ गैडी आइज़नकोट शामिल हैं। यह काल्पनिक स्थिति एक सप्ताह पहले इस्राईली मंत्रियों की बैठक में रखी गई। इसमें कहा गया कि हिज़्बुल्लाह के पास कम से कम 1 लाख 20 हज़ार मिसाइलों का भंडार है और युद्ध की स्थिति में हिज़्बुल्लाह रोज़ाना 700 मिसाइल फ़ायर कर सकता है। इनमें 45 किलोमीटर की रेंज वाले मिसाइल भी शामिल हैं जिन पर 15 किलोग्राम का वारहेड फ़िट होता है। आयरन डोम के लिए इन मिसाइलों को गिरा पाना बहुत कठिन होगा। यह तो उन मिसाइलों के अलावा हैं जो लंबी रेंज के हैं और 500 किलोग्राम भारी वारहेड ले जा सकते हैं।
  2. इस्राईली इतिहासकार और तेल अबीब युनिवर्सिटी उप प्रमुख इयाल सीज़र ने नेतनयाहू के क़रीबी समझे जाने वाले अख़बार यसराईल हायूम में प्रकाशित होने वाले अपने लेख में लिखा है कि हिज़्बुल्लाह ने 12 साल से जारी शांति की स्थिति का फ़ायदा उठाया और अपने शस्त्रागार को बहुत व्यापक तथा आधुनिक बना लिया जबकि इस बीच इस्राईली सेना ने संयुक्त रूप से कोई काम नहीं किया है। हमा संगठन भी ग़ज़्ज़ा में हिज़्बुल्लाह का अनुभव दोहराना चाहता है।
  3. इस्राईल के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख जैकब एमिडरोर ने कहा है कि सीरिया में ईरान की बढ़ती ताक़त इस्राईल की सरकार के लिए सबसे बड़ी समस्या है और हमास इस बड़े और वास्तविक ख़तरे से इस्राईली जनरलों का ध्यान ग़ज़्ज़ा पट्टी कोर मोड़ने में सफल रहा।

हमारे विचार में इन तथ्यों को जिस बात से बल मिलता है वह यह है कि इस्राईली नेतृत्व 12 साल से ग़ज़्ज़ा पट्टी पर हमला और क़ब्ज़ा करने की योजना बना रहा है, वह वर्ष 2006 के लेबनान युद्ध में अपनी पराजय का बदला लेना चाहता है उसकी पूरी कोशिश है कि सीरिया में ईरान के अस्तित्व को पूरी तरह समाप्त कर दे मगर वह अपनी एक भी योजना पर अमल नहीं कर सका है और न ही भविष्य में वह अपनी किसी भी धमकी को व्यवहारिक कर पाएगा क्योंकि इस्राईल का मुक़ाबला करने वाला प्रतिरोधक मोर्चा बहुत शक्तिशाली हो गया है और टकराव की स्थिति में इस्राईल को भारी नुक़सान पहुंच सकता है इसलिए वह कोई भी मूर्खता करने से घबरा रहा है।

पश्चिम ने ईरान को युद्धक विमानों की बिक्री रोक कर वास्तव में ईरान की बहुत बड़ी सेवा की है। पश्चिम के इस फ़ैसले के बाद ईरान ने मिसाइल कार्यक्रम को विकसित किया और इतना विकसित कर लिया कि आधुनिक युद्धक विमानों की उपयोगिता ही समाप्त कर दी। ईरान ने हाल ही में एस-300 मिसाइल सिस्टम भी रूस से हासिल कर लिया है।

हिज़्बुल्लाह और हमास के पास ज़ोरदार प्रतिरोधक ताक़त आ गई है जिसका ख़ौफ़ इस्राईली जनता और नेतृत्व दोनों पर बैठ चुका है। इसलिए कि यह दोनों संगठन मिसाइल ताक़त डेवलप करने में सफल रहे हैं और उन्होंने भूमिगत प्रोडक्शन लाइनों का निर्माण करके इस क्षेत्र में चमत्कार किया है।

आख़िर में हम यह कहना चाहते हैं कि प्रतिरोधक आंदोलनों के पास सबसे शक्तिशाली और स्ट्रैटेजिक हथियार जो है और जिसकी चौथाई शक्ति भी इस्राईल के पास नहीं है वह है मज़बूत इच्छा शक्ति, अपनी विजय का यक़ीन तथा शहादत तक लड़ते रहने का जज़्बा। यही कारण है कि इस्राईल वर्ष 1973 के बाद से इस्राईल कोई भी युद्ध नहीं जीत सका है। इसलिए कि इस शक्तिशाली हथियार का सब कुछ अलग है। इस जज़्बे ने युद्धों की स्ट्रैटेजी को बदल दिया है।

इन हालात में इस्राईली युद्ध मंत्री एविग्डर लेबरमैन के लिए असंभव है कि ग़ज़्ज़ा पट्टी या दक्षिणी लेबनान पर क़ब्ज़ा कर लेने की अपनी धमकी पर अमल करने की हिम्मत करें या सीरिया में ईरान की सैनिक उपस्थिति के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही करने की हिम्मत जुटा पाएं। इसलिए कि प्रतिरोधक आंदोलनों की ताक़त अब इस्राईल की सैनिक ताक़त से बढ़ चुकी है। सीरिया में मिलने वाली विजय, इससे पहले ग़ज़्ज़ा पट्टी की विजय और उससे पहले लेबनान की विजय हमारे इस विचार के प्रमाण हैं। अगर किसी के पास इसके विरुद्ध कोई तर्क है तो पेश करे।


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