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लेबनान के ख़िलाफ़ किसी भी संभावित युद्ध में इस्राईल की पराजय निश्चित हैः रायुल यौम

लेबनान के ख़िलाफ़ किसी भी संभावित युद्ध में इस्राईल की पराजय निश्चित हैः रायुल यौम

मशहूर अरबी समाचारपत्र रायुल यौम ने लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन के महासचिव के शुक्रवार के भाषण की समीक्षा करते हुए लिखा है कि ज़ायोनी, लेबनान के ख़िलाफ़ किसी भी युद्ध में जीत नहीं पाएंगे।

रायुल यौम के प्रधान संपादक अब्दुल बारी अतवान ने लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन के महासचिव सैयद हसन नसरुल्लाह के शुक्रवार के भाषण के अहम बिंदुओं और लेबनान व फ़िलिस्तीन में प्रतिरोधकर्ताओं की सैन्य सफलताओं की तरफ़ इशारा करते हुए लिखा है कि ज़ायोनी शासन भविष्य में लेबनान के ख़िलाफ़ किसी भी युद्ध में विजयी नहीं हो सकेगा। सैयद हसन नसरुल्लाह के भाषण पर ध्यान देना उनकी सटीक सूचनाओं व समीक्षा के कारण ही नहीं बल्कि क्षेत्र के भविष्य और क्षेत्रीय परिस्थितियों के सही आकलन से अवगत होने के लिए भी ज़रूरी है। अगर हम यह कहें तो अतिशयोक्ति न होगी कि सैयद हसन नसरुल्लाह, नए मोर्चे के औपचारिक प्रवक्ता हैं। यह वह मोर्चा है जो शिया-सुन्नी मतभेदों से इतर है और इसके विभिन्न कोण स्पष्ट होते और फैलते जा रहे हैं। यह मोर्चा, मध्यपूर्व के देशों और प्रतिरोध की केंद्रीय शाखाओं पर आधारित है और अमरीका व इस्राईल के वर्चस्ववाद के सामने एक मज़बूत प्रतिद्वंद्वी है।

 

सैयद हसन नसरुल्लाह ने दक्षिणी लेबनान में प्रतिरोध के केंद्र बिंते जुबैल शहर में वर्ष 2006 के 33 दिवसीय युद्ध में मिलने वाली महान विजय की 13वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में शुक्रवार को भाषण दिया जिसमें उन्होंने अनेक अहम पहलुओं का उल्लेख किया और समीक्षात्मक निष्कर्ष से पहले उनकी ओर इशारा करना आवश्यक है।

  1. वर्ष 2006 का युद्ध अमरीका का युद्ध था और नए मध्यपूर्व के गठन, लेबनान व फ़िलिस्तीन में प्रतिरोध को जड़ से उखाड़ फेंकने, सीरिया में सरकार बदलने और इराक़ में अमरीका के अतिग्रहण को मज़बूत बनाने के लिए इस युद्ध में इस्राईल, अमरीका का एक साधन था।
  2. यह युद्ध लेबनान के प्रतिरोध ने नहीं बल्कि इस्राईल ने रोका था क्योंकि उसमें युद्ध जारी रखने की शक्ति नहीं रह गई थी। इसी लिए इस्राईल ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अमरीका के तत्कालीन प्रतिनिधि जाॅन बोलटन से संपर्क किया जिन्होंने उससे पहले संघर्ष विराम की कुछ अरब देशों की अपीलों को ठुकरा दिया था। इस्राईल जानता था कि अगर यह युद्ध जारी रहा तो उसे भयानक परिणामों का सामना करना पड़ेगा।
  3. अतीत में लेबनानी प्रतिरोध को सैन्य शक्ति के जो साधन हासिल थे, आज वे काफ़ी बदल चुके हैं और यह वह सच्चाई है जिसमें किसी को भी संदेह नहीं है यहां तक कि इस्राईली सैन्य अधिकारियों ने भी इस बात को स्वीकार किया है। इस वास्तविकता ने एक प्रकार की रणनैतिक प्रतिरोधक क्षमता पैदा कर दी है जिसने इस्राईली सेना को लेबनान पर एक गोली भी फ़ायर करने से रोक दिया है और दक्षिणी लेबनान, लेबनान और मध्यपूर्व के सबसे सुरक्षित क्षेत्रों में शामिल हो गया है।
  4. इस्राईली कमांडरों ने पिछले 13 बरसों में अपनी सेना के विश्वास को बहाल करने की बहुत कोशिश की है। इस युद्ध में ज़ायोनी सेना को बहुत बड़ी पराजय का सामना करना पड़ा और उसे बहुत मामूली परिणाम हासिल हुए क्योंकि वह न केवल लेबनान बल्कि घेराव किए गए ग़ज़्ज़ा पट्टी में भी वह किसी भी प्रकार की ज़मीनी व हवाई सैन्य कार्यवाही करने में अक्षम है।

सैयद हसन नसरुल्लाह का पश्चिमी तट की ओर प्रतिरोध की प्रभुत्वशाली वापसी की ओर इशारा और इसी तरह 14 साल से कम के किशोरों द्वारा शहीद होने से पहले अतिग्रहित बैतुल मुक़द्दस में इस्राईली सैनिकों पर चाक़ुओं से किए गए वारों की तरफ़ उनका संकेत और इसी तरह ग़ूश अत्सियून काॅलोनी के निकट एक इस्राईली सैनिक को पकड़ने और एक अन्य की हत्या की ओर इशारा इस बात को दर्शाता है कि प्रतिरोध के मोर्चे का लक्ष्य पश्चिमी तट पर ध्यान केंद्रित करना है, अर्थात वह क्षेत्र जहां अतिग्रहणकारी इस्राईल अधिक कमज़ोर है। प्रतिरोध ने केवल ग़ज़्ज़ा पट्टी को ही पर्याप्त नहीं समझा है बल्कि संभव है कि नई नस्ल, पश्चिमी तट में साहस और शूरवीरता के साथ प्रतिरोध का ध्वज उठाए।

 

अमरीका के विदेश मंत्रालय ने तुरंत ही परोक्ष रूप से लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन के महासचिव सैयद हसन नसरुल्लाह के भाषण पर आपत्ति की और उसके ख़तरनाक परिणामों की बात कही। इससे पता चलता है कि अमरीकियों को कितनी तकलीफ़ और इस्राईलियों को कितना भय है। यह बात इस्लामी जगत में बहुत से लोगों को प्रसन्न कर गई है। (HN)


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