जनाब मुख़्तार की ज़िंदगी पर एक निगाह

जनाब मुख़्तार की ज़िंदगी पर एक निगाह

मैं कैसे उस शख़्स से संबंध ख़त्म करने का ऐलान कर सकती हूं जो अल्लाह के अलावा किसी दूसरे पर भरोसा नहीं करता, जो दिनों में रोज़ा रखता है और रातों में सारी रात अल्लाह की इबादत करता है, जिसने अपनी ज़िंदगी अल्लाह और उसके रसूल स.अ. की राह में और पैग़म्बर स.अ. के अहलेबैत अ.स. की मोहब्बत में उनके बहे हुए ख़ून का इंतेक़ाम लेने के लिए वक़्फ़ कर दी।

 जनाब मुख़्तार ने अपनी ज़िंदगी की शुरूआत से ही बहुत उतार चढ़ाव देखे हैं, आप इस्लाम की तालीमात और इस्लामी तहज़ीब के फैल जाने के बाद इस दुनिया में पैदा हुए और आपने कुफ़्र और जाहिलियत का दौर नहीं देखा, आपकी तरबियत इस्लामी तरीक़े से हुई। 
आपने मदीने और इराक़ में बहुत सारी इस्लामी घटनाओं और बहुत सारे बदलाव को देखा था जिसके चलते तजुर्बे और अनुभव की दुनिया में आपका बड़ा नाम है, पैग़म्बर स.अ. की वफ़ात के बाद पेश आने वाली घटनाओं को अच्छी तरह जानते थे और हक़ को बातिल से हमेशा अलग रखते थे। 
अल्लामा इब्ने नुमा जनाब मुख़्तार के बारे में लिखते हैं, जनाब मुख़्तार ने बड़े बड़े कारनामे अपने नाम किए, वह ज़हीन, हाज़िर जवाब और ऊंची सोंच रखने वाले इंसान थे, बहुत सारी नेक सिफ़ात के मालिक और बेहद सख़ी थे, आप वह बुलंद हिम्मत इंसान थे जो शराफ़त और इज़्ज़त की ऊंचाईयों पर थे, आपका अंदाज़ा और अनुमान कभी ग़लत नहीं होता था, और अपनी भरपूर ताक़त और हिम्मत से जंग के मैदान में सामने वाले को मात देते थे, उन्होंने सच्चाई और हक़ीक़त को अच्छी तरह पहचान लिया था और बातिल अक़ीदों को पहचान कर उनसे दूरी बनाते हुए अपने अक़ीदों को पाक कर लिया था। (नक़्ल अज़- बिहारुल अनवार, जिल्द 45, पेज 350) 
बेशक आपने इंसानी वैल्यूज़ की बुलंदियों को हासिल कर लिया था और शराफ़त और करामत की ऊंचाईयों पर पहुंच चुके थे और हक़ की राह में हक़ को बचाने और उसे साबित करने की ख़ातिर अपनी आख़िरी सांस तक जंग जारी रखी। 
राजनीतिक मैदान का महारथी 
अल्लामा शरीफ़ अल-क़रशी जनाब मुख़्तार की शख़्सियत के बारे में इस तरह लिखते हैं कि, मुख़्तार अरब की उन मशहूर शख़्सियतों में से हैं जिनका ज़िक्र इस्लामी इतिहास में मिलता है, उन्होंने अपने दौर के बहुत से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों में ऐसा ऐतिहासिक रोल निभाया है जिससे बहुत सारे मौक़ों पर अपनी ऐसी छाप छोड़ी कि आज भी उनका रोल और उनका किरदार इस्लामी इतिहास में सुनहरे शब्दों में मौजूद है। 
उन्होंने अपनी राजनीति और हिकमते अमली से साबित कर दिया कि वह एक बेहद सूझबूझ वाले इंसान हैं, जैसाकि कुछ इतिहासकारों ने उनके बारे में लिखा है कि वह एक बेहतरीन मनोविज्ञानी, समाजशास्त्री और बुध्दिमान थे, वह लोगों के जज़्बात और भावनाओं को ऐसा ललकारते कि उनकी अक़्ल पर क़ब्ज़ा कर लेते, उन्होंने तबलीग़ के आम और सादा तरीक़े जैसे शायरी या ख़ेताबत या इन जैसे और दूसरे रास्तों को ही केवल नहीं चुना बल्कि उन्होंने अपनी तबलीग़ में अमली तरीक़े जैसे लोगो द्वारा हुकूमत के ग़लत फ़ैसलों और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करना और एक ख़ास माहौल तैयार करना वग़ैरह का इस्तेमाल किया। उन्होंने अपनी इसी सियासी सूझबूझ और तेज़ दिमाग़ के चलते अपने मिशन को बढ़ाया और एक बेहतरीन मौक़ा देख कर अपनी तबलीग़ और मिशन को ज़ालिम के ख़िलाफ़ बग़ावत और विद्रोह में बदल दिया, (जैसाकि कूफ़े के गवर्नर इब्ने ज़ुबैर से कूफ़े की हुकूमत छीन ली)। (हयातुल इमामिल हुसैन (अ.स.), पेज 454) 
जनाब मुख़्तार के क़ेयाम का अगर आप विश्लेषण करें तो समझ जाएंगे कि उनका हर हर क़दम एकदम सटीक रहता था और उनका हर क़दम पूरी समझदारी और होशियारी के साथ होता था और वह कय्यिस लक़ब के हक़दार थे। 
इबादत और ज़ोहद में बे मिसाल 
जनाब मुख़्तार के फ़ज़ाएल में से एक अहम पहलू आपकी मानवियत आपकी इबादत और आपका तक़वा है, आप एक बहादुर, दानी, आदिल होने के साथ साथ आबिद, ज़ाहिद और मुत्तक़ी थे। उनके बहुत से साथियों ने नक़्ल किया है कि मुख़्तार अपनी हुकूमत के दिनों में इमाम हुसैन अ.स. के क़ातिलों की हलाकत पर अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए रोज़ा रखते थे, आप कर्बला के नन्हे मुजाहिद हज़रत अली असग़र अ.स. को शहीद करने वाले हुर्मुला के क़त्ल होने के बाद घोड़े से नीचे उतरे और दो रकअत नमाज़ पढ़ी और फिर बहुत देर सजदे में सर रख कर अल्लाह का शुक्र अदा करते रहे। (बिहारुल अनवार, जिल्द 45, पेज 333) मिन्हाल इब्ने अम्र का बयान है कि एक दिन जनाब मुख़्तार, इमाम हुसैन अ.स. के क़ातिलों की तलाश में थे, यह वही दिन था जिसमें हुर्मुला को क़त्ल किया गया था और इस दिन बहुत ज़्यादा गर्मी थी और अमीर मुख़्तार बहुत थके हुए लग रहे थे, मैंने उनकी भूख और प्यास को महसूस करते हुए अपने घर आने को कहा ताकि उनकी भूख और प्यास दूर हो सके, लेकिन उन्होंने मना कर दिया, फिर उनके एक साथी ने बताया अमीर आज रोज़ा रखे हुए हैं। (बिहारुल अनवार, जिल्द 45, पेज 333)
मुसअब इब्ने ज़ुबैर ने इराक़ पर हमला कर क़ब्ज़ा कर लेने के बाद मुख़्तार की दोनों बीवियों को गिरफ़्तार कर लिया और उनको मजबूर किया कि वह मुख़्तार से बग़ावत करें और उनसे हर तरह के संबंध ख़त्म करने का ऐलान करें, तब उनमें से एक बीवी ने जवाब दिया मैं कैसे उस शख़्स से संबंध ख़त्म करने का ऐलान कर सकती हूं जो अल्लाह के अलावा किसी दूसरे पर भरोसा नहीं करता, जो दिनों में रोज़ा रखता है और रातों में सारी रात अल्लाह की इबादत करता है, जिसने अपनी ज़िंदगी अल्लाह और उसके रसूल स.अ. की राह में और पैग़म्बर स.अ. के अहलेबैत अ.स. की मोहब्बत में उनके बहे हुए ख़ून का इंतेक़ाम लेने के लिए वक़्फ़ कर दी। (मुरव्वजुज़ ज़हब, मसऊदी, जिल्द 3, पेज 107) 
अल्लामा मुक़र्रम लिखते हैं कि, मुख़्तार का ज़ोहद और तक़वा, इल्म और अदब और एक ऐसी फ़ज़ीलत के साथ था जिसे अहलेबैत अ.स. से सीख कर हासिल किया था और वह हमेशा लोगों को अल्लाह की मर्ज़ी हासिल करने की तरफ़ दावत देते थे। (मक़तुल हुसैन (अ.स.), मुक़र्रम, पेज 172) आपका ख़ानदान अहलेबैत अ.स. की मोहब्बत आपके पूरे ख़ानदान की पहचान थी, आपके चचा साद इब्ने मसऊद सक़फ़ी इस्लाम की शुरूआत से ही पैग़म्बर स.अ. के क़रीबी सहाबियों में शामिल थे। (आयानुश-शिया, मोहसिन अमीन, जिल्द 7, पेज 230) 
इसी तरह इस्तीआब, उस्दुल ग़ाबह और अल-एसाबह नामी किताबों में भी ऊपर नक़्ल की गई बात मौजूद है और शिया सुन्नी दोनों साद इब्ने मसऊद को नामचीन सहाबियों में शुमार करते हैं। वह हर छोटे बड़े मौक़ों पर इमाम अली अ.स. के साथ रहे और आप इमाम अली अ.स. से बेहद मोहब्बत करते थे, शैख़ तूसी र.ह. ने आपको इमाम अली अ.स. के असहाब में से ज़िक्र किया है।
ख़तरनाक मशविरा 
जिस समय जनाब मुख़्तार के चचा मदाएन के गवर्नर थे और इमाम हसन अ.स. और माविया के बीच सुलह होने के बाद जो हालात पेश आए और इमाम अ.स. ने ज़ख़्मी होने के बाद ख़ुद मुख़्तार के चचा के घर जाने का इरादा ज़ाहिर किया (रेजाले नज्जाशी, पेज 12) तो कुछ लोगों के नक़्ल के हिसाब से जनाब मुख़्तार ने अपने चचा को एक ऐसा मशविरा दिया जिससे उनके चचा बहुत नाराज़ हुए और उनको डांटा, मुख़्तार ने कहा क्यों न इमाम हसन अ.स. को माविया के हवाले कर के कुछ पैसा और कोई ख़ास पद हासिल कर लिया जाए। (बिहारुल अनवार, जिल्द 44, पेज 33, अवालिम, बहरानी, पेज 196, अन्साबुल अशराफ़, बेलाज़री, जिल्द 5, पेज 214) 
फिर जब मुख़्तार के चचा ने उनको डांटा तो वह कहने लगे कि मैं तो आपका इम्तेहान लेना चाह रहा था। (आयानुश-शिया, जिल्द 7, पेज 230) 
आयतुल्लाह ख़ूई र.ह. इस रिवायत के बारे में फ़रमाते हैं कि पहली बात यह कि यह रिवायत बिल्कुल भरोसे के क़ाबिल नहीं है, क्योंकि यह रिवायत मुरसला है यानी एक ऐसी रिवायत जिसकी सनद में एक या कुछ रावी ग़ायब हों, 
दूसरी बात यह कि अगर रिवायत को सही मान भी लिया जाए तो (माविया ने हालात कुछ ऐसे बना दिए थे कि मुख़्तार जैसे अहलेबैत अ.स. पर जान छिड़कने वालों को अपने क़रीबियों तक पर भरोसा नहीं था) 
मुख़्तार ने अपने चचा के इरादे को जानने के लिए ऐसा कहा था कि अगर (पिछले कई सालों से सत्ता में रहते रहते उनके चचा को पद की लालच हो गई हो) उनके चचा का ऐसा कुछ इरादा हो तो सामने आ जाए ताकि इमाम हसन अ.स. को बचाने के लिए कोई दूसरा रास्ता निकाला जा सके। (मोजमुर रेजालिल हदीस, आयतुल्लाह ख़ूई र.ह., जिल्द 18, पेज 97

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