?>

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 9

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 9

इस ब्रह्मांड में मौजूद हर वस्तु महान ईश्वर का गुणगान करती है अंतर केवल इतना है कि हम दूसरी वस्तुओं द्वारा किये जा रहे गुणगान को न सुनत हैं न समझते हैं।

पवित्र कुरआन इस बारे में एक स्थान पर कहता है” सातों आसमान और ज़मीन और जो कुछ भी इन दोनों के बीच में है सब ईश्वर का गुणगान करते हैं” महान ईश्वर अपने गुणगान के दायरे को और विस्तृत करते हुए कहता है” ब्रह्मांड में कोई चीज़ ही नहीं है मगर यह कि वह ईश्वर का गुणगान करती है किन्तु तुम उनके गुणगान को नहीं समझते हो।“

यहां एक रोचक बिन्दु यह है कि ब्रह्मांड की हर वस्तु महान ईश्वर का गुणगान करती है किन्तु हम उनके गुणगान को नहीं समझते हैं तो इसका यह मतलब नहीं है कि वे बोध के बिना महान ईश्वर का गुणगान करती हैं। पवित्र कुरआन इस प्रकार के विचार और धारणा को रद्द करता और कहता है” क्या तुमने नहीं देखा कि जो कुछ आसमान और ज़मीन में है और वे पक्षी जो उड़ रहे हैं सबके सब ईश्वर का गुणगान करते हैं? समूचा ब्रह्मांड बोध व विवेश के साथ ईश्वर का गुणगान करता है और ईश्वर हर उस चीज़ को जानता है जो वे करते हैं”

आज के वैज्ञानिक शोधों से यह बात सिद्ध हो गयी है कि ब्रह्मांड में मौजूद वस्तुओं में बोध पाया जाता है। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर पवित्र कुरआन में उनमें से कुछ की ओर संकेत करता है।

हज़रत सुलैमान महान ईश्वर के एक दूत थे। उनका शासन पक्षियों पर भी था। एक दिन एक विचित्र घटना घटी। हुदहुद नाम का एक पक्षी था जो हज़रत सुलैमान की सरकार के कर्मियों में शामिल था। हज़रत सुलैमान ने जब देखा कि वह कई दिन से ग़ायब है तो उन्होंने कहा अगर उसने अपनी अनुपस्थिति का सही कारण नहीं बताया तो उसे दंडित करूंगा। कुछ ही दिनों के बाद हुदहुद आया और उसने हज़रत सुलैमान से कहा कि मैं सबा अर्थात वर्तमान यमन से आया हूं। मुझे एक बात पता चली है जो आपको नहीं पता है। मैंने सबा से एक पक्की ख़बर लायी है। मैंने देखा कि सबा की रानी और वहां के लोग ईश्वर को छोड़कर सूरज की पूजा कर रहे हैं और शैतान ने उनके कार्यों को सुन्दर करके पेश कर दिया है और उन्हें सही रास्ते से रोक रखा है और उन्हें गुमराह कर दिया है और वे मार्गदर्शन के लाएक़ नहीं हैं।

इस पूरी घटना के अध्ययन से पक्षी की बुद्धि का पता चलता है और यह बात सिद्ध होती है कि महान ईश्वर ने हर वस्तु को चाहे वह इंसान हो या ग़ैर इंसान सबको उसकी आवश्यकता के हिसाब से बुद्धि व विवेक दे रखा है। इसी संबंध में महान ईश्वर पवित्र कुरआन में एक दूसरा उदाहरण पेश करता है। एक बार हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम घोड़ों पर सवार होकर अपनी सेना के साथ कहीं जा रहे थे। जब उनका गुज़र एक क्षेत्र से हुआ तो चींटियों के सरदार ने दूसरी चींटियों से चिल्लाकर कहा कि अपनी- अपनी बिलों में चली जाओ ताकि कुचली न जाओ जबकि वे समझते नहीं हैं। चींटी की इस बात को सुनकर हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम मुस्कुरा दिये।

महान ईश्वर पवित्र कुरआन में एक अन्य घटना को बयान करता है जो इस बात की सूचक है कि ब्रह्मांड में मौजूद हर वस्तु के अंदर अपने- अपने हिसाब से विवेक और बुद्धि होती है। हज़रत सुलैमान आसमानी किताब ज़बूर की तिलावत बहुत ही सुन्दर व मनमोहक आवाज़ में करते थे। जब वह ज़बूर की तिलावत करते थे तो उड़ने वाले पक्षी और पर्वत भी हज़रत सुलैमान के साथ तिलावत करने लगते थे।

पवित्र कुरआन की रोशनी में यह बात सिद्ध हो गयी कि ब्रह्मांड में मौजूद हर वस्तु यानी समूचा ब्रह्मांड महान ईश्वर का गुणगान करता है। यहां सवाल यह किया जाता है कि ब्रह्मांड की वस्तुएं यह गुणगान ज़बान से करती हैं या दिल से। इस संबंध में जो अध्ययन किये गये हैं उसका नतीजा यह निकला है कि महान ईश्वर का गुणगान दोनों तरह से होता है यानी ज़बान और दिल दोनों से।

यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि प्रलय के दिन इंसान के खिलाफ वे चीज़ें भी गवाही देंगीं जिनके न तो दिल हैं और न ज़बान। जैसे खुद इंसान के शरीर के अंग। जैसाकि महान ईश्वर पवित्र कुरआन में कहता है कि प्रलय के दिन इंसान के हाथ और पैर भी उसके खिलाफ गवाही देंगे। यानी इंसान के शरीर का हर अंग उसके खिलाफ गवाही देगा इस प्रकार से कि महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरेह यासिन में कहता है” आज के दिन यानी प्रलय के दिन हम इनके मुंह पर मौन का ताला लगा देंगे और उनके हाथ हमसे बात करेंगे और गवाही देंगे।“

आम तौर पर कोई भी इंसान यह नहीं सोचता है कि एक दिन एसा भी वक्त आयेगा जब उसके शरीर का हर अंग उसके ही खिलाफ गवाही देगा। इंसान के पास इंकार का कोई बहाना नहीं होगा। इंसान के शरीर के अंग ही उसके कर्मपत्र को खोलने के लिए काफी हैं। जब इंसान अपने ही शरीर के अंगों से कहेगा कि क्यों मेरे खिलाफ गवाही दे रहे हो? तो वे कहेंगे जिस ईश्वर ने हर वस्तु को बोलने वाला बनाया है उसी ने हमें बोलने वाला बना दिया है और उसने तुम्हें पैदा किया है और तुम उसी की ओर पलट कर जाओगे।“

इस बहस का सारांश है कि ब्रह्मांड में कोई एसी वस्तु नहीं है जो अपने पालनहार और रचयिता का गुणगान न करती हो। अंतर केवल इतना है कि हम हर चीज़ के गुणगान को न सुनते हैं न समझते हैं और इंसान को इस बात को याद रखना चाहिये कि प्रलय के दिन उसके शरीर के अंग भी उसके खिलाफ गवाही देंगे। इसलिए इंसान को चाहिये कि वह शरीर और शरीर की शक्ति का प्रयोग उन्हीं कार्यों में करे जिन्हें अंजाम देने का आदेश महान ईश्वर और उसके दूतों ने दिया है। कितने भाग्यशाली वे लोग हैं जिन्होंने इस पवित्र महीने में स्वयं को पापों से पवित्र कर लिया। यह वह महीना है जिसमें नरक के द्वार बंद कर दिये गये हैं और महान ईश्वर की कृपा के द्वार खोल दिये गये हैं। जो इंसान इस महीने से लाभ उठाना चाहता है उसे चाहिये कि वह स्वयं को पवित्र बनाये। इसलिए कि जो इंसान स्वयं को पवित्र नहीं करेगा वह इस महीने से वह लाभ नहीं उठा सकेगा जो लाभ उठाना चाहिये।

                         

दोस्तो अब हम आप को यह बतायेंगे कि नमाज़ के दो आयाम हैं एक विदित और एक आंतरिक। जब इंसान नमाज़ पढ़ने के लिए खड़ा होता है तो सबसे पहले वह हाथ उठा कर कहता है कि ईश्वर सबसे बड़ा व महान है और उसके अलावा कोई पूज्य नहीं है। यानी नमाज़ी सबसे पहले महान ईश्वर की महानता की गवाही देता है और उसके बाद इस बात का इंकार करता है कि उसके अलावा कोई पूज्य नहीं है। नमाज़ वह चीज़ है जो इंसान की आत्मा को पवित्र करती है जिस तरह पानी इंसान के शरीर को पवित्र करता है उसी तरह नमाज़ इंसान की आत्मा को पवित्र व विशुद्ध करती है। दूसरे शब्दों में नमाज़ से इंसान की आत्मा की सिंचाई होती है और नमाज़ इंसान की आत्मा को परवान चढ़ाती है। रिवायतों में आया है कि नमाज़ मोमिन की मेराज है। नमाज़ इंसान को बुराइयों से रोकती है। यहां कोई यह सवाल कर सकता है कि बहुत से लोग नमाज़ पढ़ते हैं परंतु नमाज़ पढ़ने के बाद भी उनके व्यवहार में किसी प्रकार का बदलाव नज़र नहीं आता है? तो इसके जवाब में कहा जाता है कि अगर कोई इंसान नमाज़ पढ़ता है और उसके बाद उसके व्यवहार में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं आता है तो उसने वह नमाज़ नहीं पढ़ी जो पढ़नी चाहिये थी। उसने नमाज़ का बाह्यरूप अंजाम दिया है। मिसाल के तौर पर अगर कोई बीमार इंसान कोई दवा खाये और दवा के कुछ समय के बाद उसकी हालत में सुधार होने लगे तो लोग यही कहते हैं कि दवा फायदा कर रही है। महान ईश्वर कह रहा है कि नमाज़ इंसान को बुराइयों से रोकती है। अगर कोई नमाज़ पढ़ता है परंतु नमाज़ के बाद भी उसके आचरण में कोई बदलाव नहीं आता है तो इसका मतलब यह है कि उसने वास्तविक नमाज़ नहीं पढ़ी और इंसान को इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि उपासना के विदित स्वरूप से उसे वह लाभ नहीं मिलेगा जो मिलना चाहिये।  

पवित्र रमज़ान का महीना आत्मशुद्धि का कितना अच्छा अवसर है। यह वह महीना है जिसमें रोज़दार की सांस महान ईश्वर का गुणगान है। यह ईश्वरीय कृपा, दया, विभूती और अनुकंपा का महीना है। कितने खुशनसीब और भाग्यशाली वे लोग हैं जिन्हें महान ईश्वर ने यह अवसर प्रदान किया है। यह तौबा व प्रायश्चित का महीना है। यह वह महीना है जिसमें इंसान को दूसरों को क्षमा करना सीखना चाहिये। यह वह महीना है जिसमें इंसान अपनी आत्मा के अलावा अपने अमल को भी शुद्ध बना सकता है। रमज़ान का पवित्र महीना इस बात को समझने और चिंतन- मनन का बेहतरीन अवसर है कि महान ईश्वर ने उसे व्यर्थ और अकारण नहीं पैदा किया है। जिस महान ईश्वर ने ब्रह्मांड की किसी भी वस्तु को अकारण पैदा नहीं किया है वह महान ईश्वर सर्वश्रेष्ठ प्राणी यानी इंसान को कैसे व्यर्थ पैदा कर सकता है? जिस तरह महान ईश्वर ने इंसान को सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनाया है उसी तरह इंसान की रचना का उद्देश्य भी सर्वश्रेष्ठ है। पवित्र कुरआन के अनुसार हमने इंसान और जिन्नात को पैदा ही नहीं किया मगर यह कि वह मेरी उपासना करें। पवित्र कुरआन के अनुसार इंसान की रचना का उद्देश्य महान ईश्वर की उपासना है।

 


अपना कमेंट भेजें

आपका ईमेल शो नहीं किया जायेगा. आवश्यक फ़ील्ड पर * का निशान लगा है

*