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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 8

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 8

जी हां दोस्तो इस्लाम धर्म में क़ानूनों और नियमों का बहुत अधिक महत्व है।

इस्लाम में बल दिया गया है कि उपासना जागरूकता और तत्वदर्शिता के साथ होनी चाहिए और जब कोई इंसान ईश्वरीय आदेश पर अमल करते हुए उपासना या इबादत करता है तो उसे उसके आदेश के समक्ष नतमस्तक हो जाना चहिए। उसने ईश्वर का बंद बनने पर गर्व करना चाहिए। ईश्वर की उपासनाओं में से एक उपासना नमाज़ है जो ईश्वर के नेक बंदों, ईश्वरीय दूतों और उसके निकटवर्तियों के निकट बहुत स्थान स्थान रखती है। रिवायतों में है कि नमाज़ मनुष्य की आत्मा को निखारती है और उसको परिपूर्णता तक पहुंचाती है।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्ल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम जो हमेशा एकांत में पूरे प्रेम और उत्साह के साथ अपने ईश्वर की उपासना करते थे, कहते हैं कि बेहतरीन इंसान वह है जो ईश्वर की उपासना और उसकी बंदगी प्रेम के साथ अंजाम दे, उसको अधिक प्यार की वजह से अपने अपने सीने में भींच ले और दिल की गहराईयों से उसे पंसद करे।

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम सन 61 हिजरी में आशूरा की रात जब दुश्मनों ने उनको और उनके परिवार को चारों ओर से घेर लिया था, उन्होंने उस कठिन समय में भी ईश्वर की ऐसी उपासना की कि इतिहास गवाह बन गया। वह फ़रमाते हैं कि मुझे नमाज़ बहुत पसंद है और मैं नमाज़ से प्रेम करता हूं।

 

निसंदेह अगर हम यह कहें कि नमाज़ का सबसे महत्वपूर्ण फ़लसफ़ा, मनुष्य के भीतर ईश्वर से प्रेम की जोत जगाना और ईश्वरीय प्रेम का पौधा उसके भीतर उगाना है, इस प्रेम का प्रभावी दिलों के भीतर छिपा होता है और उसका आनंद दुनिया की कोई भी ज़बान बयान नहीं कर सकती।

पवित्र क़ुरआन के सूरए बक़रा की आयत संख्या 165 में आया है कि लोगों में से कुछ ऐसे भी हैं जो एक ईश्वर के स्थान पर कई को ईश्वर के रूप में मानते हैं और उनको ईश्वर की भांति ही चाहते हैं परन्तु जो लोग ईमान लाए, ईश्वर के प्रति उनका प्रेम कहीं अधिक है। और जिन लोगों ने अत्याचार किया (और ईश्वर के अतिरिक्त किसी और को पूज्य माना) यदि वे उस समय को देखते कि जब उन्हें दण्ड दिया जा रहा होगा तो समझते कि सभी शक्ति ईश्वर की है और उसका दण्ड अत्यंत कड़ा है।

पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम जो ईश्वर से प्रेम का जीता जागता प्रमाण थे और इसी बात को दृष्टि में रखते हुए नमाज़ के बारे में कहते हैं कि हे मेरे पालनहार नमाज़ की हालत में मेरी आंखों को प्रमाशमान कर दे और नमाज़ को मेरे लिए लोकप्रिय बना दे, जैसे कि खाना भूखे लोगों के लिए लोकप्रिय होता है और पानी प्यासों के लिए लोकप्रिय होता है, अंतर केवल इतना होता है कि भूखा जब भी खाना खाता है उसका पेट भर जाता है और प्यासा जब भी पानी पीता है उसकी प्यास बुझ जाती है, लेकिन मैं कभी भी नमाज़ और ईश्वर से अपने मन की बात करने, आवश्यकता मुक्ति का एहसास नहीं करता बल्कि हमेशा मेरे उत्साह में वृद्धि ही होती है।

 

दोस्तो आपको यह भी बताते चलें कि ईश्वरीय दूतों को भेजे जाने और ईश्वरीय नियम और धर्म की संयुक्त वजह नमाज़ थी क्योंकि नमाज़ के रास्ते वह सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर सकते हैं और अपने प्रिय ईश्वर के निकट पहुंच सकते हैं, बंदा अपनी विनम्रता ईश्वर के समक्ष पेश कर सकते हैं, ईश्वरीय दूत अपने अनुयायियों को भी इस प्रकार की उपासनाएं दिखाकर उन्हें बंदगी और इबादत का पाठ सिखाते हैं और उनको अनकेश्वरवादियों और सीमा से अधिक बढ़ने वालों के चंगुल से बचाए और पथभ्रष्टता से उनकी रक्षा करे।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम एकेश्वरवाद के ध्वजवाहक थे, वे ईश्वर से दुआ करते हुए कहते हैं कि प्रभुवर! मुझे नमाज़ स्थापित करने वालों में रख तथा मेरे वंश के साथ भी ऐसा ही कर। प्रभुवर! मेरी प्रार्थना को स्वीकार कर। हज़रत ईसा मसीह जब पालने में थे और हज़रत मरियम ने अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए नवजात की ओर संकेत किया और वहां उपस्थित लोगों से कहा कि उससे पूछो तो अचानक झूले में पड़ा बच्चा बोला और कहा मैं ईश्वर का दास हूं, उसने मुझे (आसमानी) किताब दी है और मुझे अपना पैग़म्बर बनाया है, और ईश्वर ने मुझे विभूति का कारण बनाया मैं जहां भी रहूं तथा मुझे जीवन भर नमाज़ व ज़कात की सिफ़ारिश की।

ध्यान योग्य बात यह है कि इन आयतों पर नज़र डालने से पता चलता ह  कि ईश्वर ने हज़रत ईसा को नमाज़ का आदेश दिया और उनसे कहा कि वह जीवन के अंतिम क्षण तक इसको स्थापित करें, यह नमाज़ के चरम को सिद्ध करने वाली बात है क्योंकि नमाज़ ईश्वर का सीधा आदेश है और जो व्यक्ति चाहता है कि उसका ईश्वर से निकट और गहरा संबंध हो तो उसे चाहिए कि वह नामज़ स्थापित करे।

 

दोस्तो इस्लाम धर्म में नमाज के महत्व के बारे में हमने आपको क़ुरआने मजीद की आयतों और हदीसों के रोशनी में आपको बताया। निसंदेह जो लोग ईमान से संपन्न हैं और उन्होंने ईश्वर की उपासना के क्षेत्र में क़दम रख दिया तो उन्हें नमाज़ के उच्च स्थान के बारे में अच्छी तरह पता है। नमाज़ पूर्वजों और ईश्वरीय दूतों का सबसे बेहतरीन रास्ता है। ईश्वर सूरए इब्राहीम की आयत संख्या 37 में कहता है कि प्रभुवर! मैंने अपनी संतान को इस बंजर भूमि में तेरे सम्मानीय घर के निकट बसा दिया है। प्रभुवर! (ऐसा मैंने इस लिए किया) ताकि वे नमाज़ स्थापित करें तो कुछ लोगों के ह्रदय इनकी ओर झुका दे और विभिन्न प्रकार के फलों से इन्हें आजीविका दे, कदाचित ये तेरे प्रति कृतज्ञ रह सकें।

इस आयत से यह परिणाम निकाला जा सकता है कि जो वास्तविक नमाज़ी है उसके एक ओ अल्लाह के साथ निकट और सच्चे संबंध हैं और दूसरी ओर उसके लोगों से निकट संबंध होते हैं ताकि वंचितों और ज़रूरतमंदों के कष्टों को समझे और ईश्वर के मार्ग में ख़र्च करके उनकी समस्याओं को दूर करे।

रोचक बात यह है कि अपनी ज़िम्मेदारियों पर अमल करने वाले रोज़ेदार इस बात की अनदेखी करते हुए कि ख़ुद को ईश्वर का बंदा समझें और अच्छी तरह पता है कि इबादत करना और वंचितों और ज़रूरतमंदों की मदद करना, परलोक का सामान है। यहां पर सूरए बक़रा की आयत संख्या 278 में ईश्वर कहता कि हे अल्लाह पर ईमान रखने वालो! अल्लाह से डरो और सूद का जो बचा भाग है उसे छोड़ दो अगर तुम मोमिन हो।

वास्तव में नमाज़ इंसान को ईश्वर से निकट कर देती है और इंसान की आत्मा को शांति और सुकून प्रदान करती है, ग़ैरों के लिए इस बात को समझना बहुत मुश्किल है। वह ईश्वर जिसने नमाज़ को इंसान पर अनिवार्य किया है, उसका इंसान बनान सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य, मनुष्य को परिपूर्णता तक पहुंचाना और अपना निकटवर्ती बनाना है। रिवायत में मिलता है कि बंदे को नमाज़ के अलावा कोई भी चीज़ जिसे मैने वाजिब किया है, मुझसे निकट नहीं करती।

पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही ने जो नमाज़ को अपनी आंख का तारा क़रार देते हैं, ईश्वरीय उपासना से प्रेम करते हैं, नमाज़ के बारे में इस प्रकार कहते हैं कि नमाज़ , ईश्वरीय धर्म के आदेशों में से है, ईश्वर की प्रसन्नता इस पर निर्भर है और यह ईश्वरीय दूतों की रीति रिवाज है, फ़रिश्ते नमाज़ पढ़ने वालों को पसंद करता है और नमाज़ ईश्वर के मार्गदर्शन और ईमान के रास्ते पर क़दम रखना है, नमाज़ ज्ञान का प्रकाश और इंसान की पहचान है जो आजीविका का कारण बनती है और मनुष्य का जिस्म और जान स्वस्थ्य रहता है और यह अनेकेश्वरवादियों से युद्ध के लिए बहुत ही अच्छा हथियार है और इससे शैतान नाराज़ होता है।


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