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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 7

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 7

रोज़ा उपासना का वह भाग है जिसके बारे में ईश्वर ने आदेश दिया है और समस्त इस्लामी किताबों में इसका उल्लेख किया है।

ईश्वरीय दूतों के इतिहास में आया है कि हज़रत ईसा मसीह भी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की भांति चालीस दिन तक लोगों से दूर रहें और इबादत करने और रोज़ा रखने में व्यस्त रहे।

हज़रत ईसा मसीह चालीस दिन के लिए जंगलों और मरुस्थल में निकल गये और वहां उन्होंने रोज़ा रखा और प्रायश्चित किया और ईश्वर से निकटता हासिल की। कहते हैं कि इन दिनों शैतान उनके पास गया और उन्हें बहकाने का प्रयास किया और उन्हें ईश्वर की याद से निश्चेत करे लेकिन हज़रत ईसा मसीह इस परीक्षा में भी सफल रहे और उन्होंने शैतान को पराजित कर दिया। ईसाईयों का कहना है कि हज़रत ईसा मसीह का लोगों से चालीस दिन दूर रहना, ईश्वर से निकटता हासिल करने, अपने दिल की बात करने, रोज़ा रखने, तौबा करने और चिंतन मनन का बेहतरीन अवसर था।

इंजील या बाइबिल में आया है कि जब ईसा ले जाए गये एक विशेष स्थान पर ताकि शैतान उनकी परीक्षा ले, फिर उन्होंने चालीस दिन रोज़ा रखा और अंत में भूख से उनका बुरा हाल हो गया। हज़रत ईसा मसीह आधिकारिक रूप से ईश्वरीय दूत बनाए जाने से पहले और उनके मार्गदर्शन की ज़िम्मेदारी शुरु होने से पहले निसंदेह एक यहूदी मोमिन भांति अमल करते थे।

यह यहूदी धर्म में प्रचलित यौम किपुर के दिनों में रोज़े रखते थे और यहूदी धर्म की आस्थाओं पर अमल करते थे और उन आस्थाओं पर पूरी तरह विश्वास रखते थे। इतिहास में भी मिलता है कि हज़रत ईसा मसीह के काल तक यहूदी परंपराएं और नियम ही प्रचलित थे।  रोज़ा रखना, खाने से बचना, न बोलने वाला रोज़ा इत्यादि जैसी परंपराएं प्रचलित थीं।

हज़रत ईसा मसीह ख़ुद भी रोज़ा रखते थे और अपने शिष्यों अर्थात हवारियों और निकटवर्तियों को भी रोज़ा रखने के निर्देश देते थे और इस बात पर विशेष रूप से ध्यान देते थे, यहां पर इस बात का उल्लेख भी आवश्यक है कि हज़रत ईसा मसीह के शिष्य भी रोज़े पर विशेष रूप से ध्यान दिया करते थे।

जेम्स हाक्स इस बारे में कहते हैं कि अतीत में ईसाई मोमिनों और हवारियों का जीवन, चिंतन मनन, आनंद, अनेक कष्टों और रोज़ेदारी से भरे हुए थे। पवित्र बाइबिल में रोज़े के अनिवार्य होने पर बल दिया गया है और रोज़ेदार की प्रशंसा और तारीफ़ की गयी है और उसे दिखावे से दूर रहने के लिए कहा गया है।

बाइबिल के 6वें अध्याय की आयत संख्या 16 से 18 तक में रोज़े के बारे में कहा गया है कि चूंकि रोज़ेदार हो, तो दिखावा करने वालों की तरह न रहो, क्योंकि वह अपने चेहरे को बदल लेते हैं ताकि लोगों की नज़र में रोज़ेदार लगें, हम तुमको बता रहे कि उन्होंने अपना पारितोषिक पा लिया, लेकिन तुम चूंकि रोज़दार हो, अपने सिर पर तेल लगाओ और अपने चेहरे को धो, ताकि लोगों की नज़र में रोज़दार न लगो, बल्कि अपने पिता अर्थात ईश्वर के निकट ही केवल रोज़ेदार लगे, तुम्हारा पिता तुम्हें खुला पारितोषिक देगा।

हज़रत ईसा मसीह अपने साथियों और हवारियों से दिखावे जैसे बुरे बर्ताव से दूर रहने की सलाह देते हैं और वह रोज़ा जिसका विदित दिखावा हो वह स्वीकार नहीं है। टाम्स मैकएल्विन एक ईसाई शोधकर्ता हैं, वे इस बारे में कहते हैं कि अलबत्ता ईसा मसीह ने यह नहीं बताया कि किस प्रकार रोज़ा रखना है क्योंकि हज़रत ईसा मसीह की बात सुनने वालों को यह पता था कि रोज़ा कैसे रखते हैं, क्या वह रोज़ा, आज के ईसाईयों का ही रोज़ा था अर्थात विशेष प्रकार के खानों से बचना? नहीं, वह रोज़ा पूरी तरह से खाने और पीने से बचना है, ठीक उसी तरह जैसा हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने तूर की पहाड़ी पर रखा था। इस प्रकार का रोज़ा हज़रत ईसा मसीह के काल तक बाक़ी था और उसमें किसी भी प्रकार का फेर बदल नहीं किया गया, मत्ता के अनुसार ईसा स्वयं भी इसी प्रकार का रोज़ा रखते थे।

इस बारे में मत्ता की इन्जीन में हज़रत मूसा और हज़रत ईसा के बारे में दो जगहों पर अलग अलग आया है कि चालीस दिन और चालीस रात वहां पर ईश्वर के निकट थे, रोटी नहीं खाई, पानी नहीं पिया, उन्होंने दस बातें श्यामपट पर लिख दीं। एक अन्य स्थान पर आया है कि जब ईसा ले जाए गये एक विशेष स्थान पर ताकि शैतान उनकी परीक्षा ले, फिर उन्होंने चालीस दिन रोज़ा रखा और अंत में भूख से उनका बुरा हाल हो गया। हज़रत ईसा मसीह आधिकारिक रूप से ईश्वरीय दूत बनाए जाने से पहले और उनके मार्गदर्शन की ज़िम्मेदारी शुरु होने से पहले निसंदेह एक यहूदी मोमिन भांति अमल करते थे।

ईसाई भी अन्य धर्मों के अनुयाइयों की भांति रोज़ा और खाने पीने की चीज़ों से बचने पर विश्वास रखते थे। यहां पर यह जानना रोचक होगा कि ईसाई धर्म में रोज़े और बचने के दो शब्द मौजूद हैं और इनमें काफ़ी अंतर है। इस प्रकार से कि जिन दिनों में परहेज़ करना होता है उन दिनों में केवल मांसे परहेज़ करना होता है किन्तु जिन दिनों में रोज़ा रखने के साथ परहेज़ होता है उनमें खाना और खाने के टाइम भी सीमित होते हैं।

ईसाइयों में मुख्ययतः तीन समुदाय हैं, कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट और ऑर्थोडॉक्स और तीनों में रोज़े के अर्थ अलग अलग हैं। कैथोलिक सम्प्रदाय में पोप को सर्वोच्च धर्मगुरु मानते हैं।ऑर्थोडॉक्स रोम के पोप को नहीं मानते, पर अपने-अपने राष्ट्रीय धर्मसंघ के पैट्रिआर्क को मानते हैं और परम्परावादी होते हैं। प्रोटेस्टेंट किसी पोप को नहीं मानते है और इसके बजाय पवित्र बाइबल में पूरी श्रद्धा रखते हैं। मध्य युग में जनता के बाइबिल पढने के लिए नकल करना मना था। जिससे लोगो को ख्रिस्ती धर्म का उचित ज्ञान नहीं था। कुछ बिशप और पादरियों ने इसे सच्चे ख्रिस्ती धर्म के अनुसार नहीं समझा और बाइबिल का अपनी अपनी भाषाओ में भाषान्तर करने लगे, जिसे पोप का विरोध था। उन बिशप और पादारियों ने पोप से अलग होके एक नया सम्प्रदाय स्थापित किया जिसे प्रोटेस्टेंट कहते हैं।

ईस्टर, ईसाई पूजन-वर्ष में सबसे महत्वपूर्ण वार्षिक धार्मिक पर्व है। ईसाई धार्मिक ग्रन्थ के अनुसार, इस दिन ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाए जाने के तीसरे दिन ईसा मसीह मरे हुओं में से पुनर्जीवित हो गए थे। इस मृतोत्थान को ईसाई ईस्टर दिवस या ईस्टर रविवार मानते हैं। ये दिन गुड फ्राईडे के दो दिन बाद और पुन्य बृहस्पतिवार या मौण्डी थर्सडे के तीन दिन बाद आता है।

रोज़े का पहला दिन जो ईसाई कैलेन्डर में ईस्टर से पहले सातवां बुधवार होता है जिसे एश वेडनेस डे कहा जाता है, इसका मतलब होता है धूल वाला बुधवार या प्रायश्चित वाला बुधवार। इस दिन ईसाई लोगों को चर्चों में पवित्र किया जाता है, इस प्रकार से कि पादरी हर व्यक्ति के माथे पर एक क्रास की मिट्टी लगाता है। मिट्टी मौत और पापों से पछतावे का प्रतीक है। धर्म पर आस्था रखने वालों को चाहिए कि इन चालीस दिनतं में अर्थात छह सप्ताह में ईस्टर के आने तक विशेष प्रकार के परहेज़ करें।

कैथोलिक समुदाय के लोग एश वेडनेस डे से ईस्टर तक रोज़ा रखते हैं। इसके अतिरिक्त धर्म पर वास्तविक विश्वास रखने वाले, चालीस दिन के बीच पड़ने वाले हर शुक्रवार को जो प्रायश्चित और तौबा का दिन है, मांस खाने से परहेज़ करते हैं। कैथोलिक समुदाय को सदियों तक शुक्रवार के दिन मांस खाने से मना किया गया था किन्तु 1960 के दशक में शुक्रवारों अर्थात लेन्ट के दिनों में मांस खाने से बचने को लोगों पर छोड़ दिया गया था कि यदि उनका मन चाहे तो खाएं और न चाहे तो न खाएं।

चालीस दिन के रोज़े के दौरान कैथोलिक लोगों को केवल दो प्रकार के खाने खाने होते हैं एक सादा और मामूली खाना किन्तु उन्हें मांस खाने की अनुमति नहीं हुआ करती थी। हर शुक्रवार को रोज़ा रखना व्यक्ति पर निर्भर होता था कुछ कैथोलिक रोज़ा रखने के बजाए शुक्रवार को प्राश्चित करने के लिए विशेष प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

ऑर्थोडॉक्स समुदाय कैथोलिक समुदाय से बहुत निकट होता है, इस समुदाय में रोज़ा इस प्रकार रखा जाता है कि पूर्वी ऑर्थोडॉक्स चर्च के अनुयायी रोज़ा और परहेज़ के लिए विभिन्न चरणों का आयोजन करते हैं और ईस्टर से पहले परहेज़ के चालीस दिन के दौरान APOSTELS अर्थात ईश्वरीय दूतों का रोज़ा, हज़रत मरियम के आसमान पर जाने के दिन का रोज़ा DORMITION और NATIVITY हज़रत ईसा मसीह के शुभ जन्म दिन का रोज़ा।

इसमें रोज़ा इस प्रकार रखा जाता है कि सामन्य रूप से मांस, दूध से बनी चीज़ें और अंडों से परहेज़ किया जाता है। ऑर्थोडॉक्स समुदाय को वैध दिनों में मछलियां खाने की अनमुमति हैं किन्तु कुछ दिनों में मना किया गया है। उनका यह मानना है कि रोज़े की वजह से लोग लालच और पेट पूजा के सामने प्रतिरोध कर सकता है और ईश्वर कृपा का पात्र बन सकता है।


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