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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 6

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 6

दोस्तो अतीत से लेकर आज तक बहुत से लोग यह सवाल करते हैं कि नमाज़ और रोज़ा जैसे धार्मिक आदेशों की वजह क्या हैं, इसके पीछे रहस्य क्या हैं?

कुछ कार्यक्रमों में हम इस प्रकार के प्रश्न करने के साथ- साथ उनके जवाब भी देने का प्रयास करेंगे। कृपया सदा की भांति आज भी कार्यक्रम में हमारे साथ बने रहें।

धार्मिक आदेशों का रहस्य जानने व बयान करने से पहले एक चीज़ को बयान कर देना ज़रूरी है और वह यह है कि जब कोई बुद्धिमान इंसान कोई काम अकारण नहीं करता तो क्या महान व सर्वसमर्थ ईश्वर किसी रहस्य के बिना कोई कार्य अंजाम दे सकता है जबकि उसने इंसानों को परिपूर्णता के शिखर पर पहुंचाने के लिए धार्मिक आदेशों को बनाया है उसका कोई भी आदेश और कार्य तर्करहित और अकारण नहीं है तो सवाल यह पैदा होता है कि हम इंसानों की बुद्धि और ज्ञान सीमित है उसके बावजूद हमें यह सवाल करने का अधिकार है कि इन धार्मिक आदेशों के पीछे क्या रहस्य हैं? विभिन्न पहलुओं से इस प्रश्न का जवाब दिया जा सकता है। इस सवाल का एक जवाब यह दिया जा सकता है कि महान ईश्वर ने समस्त इंसानों को पैदा किया है और उसने इंसान को सोचने-समझने और चिंतन- मनन की शक्ति प्रदान की है जिसे बुद्धि कहा जाता है और बुद्धि बहुत बड़ी नेअमत है और इसी नेअमत व अनुकंपा की वजह से महान ईश्वर ने इंसान को सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनाया है। महान ईश्वर ने इंसान को जो बुद्धि और चिंतन- मनन की शक्ति प्रदान की है अगर इंसान सही तरह से सोचे तो यह समझ जायेगा कि महान ईश्वर का कोई भी आदेश तर्करहित व अकारण नहीं हो सकता और उसका कोई न कोई रहस्य ज़रूर है। इस आधार पर धार्मिक आदेशों के बारे में सवाल करना न केवल कोई बुरी बात नहीं है बल्कि अगर इंसान उनके रहस्यों व कारणों को जान जायेगा तो अधिक उत्साह के साथ उन्हें अंजाम देगा। इसी कारण हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने एक निष्ठावान साथी व अनुयाई कुमैल से कहा” कोई कार्य नहीं है किन्तु उसे जानने व पहचाने की ज़रूरत है।"

हर चीज़ का जानना व पहचानना यद्यपि महत्वपूर्ण है परंतु धार्मिक मामलों व आदेशों के बारे में जानकारी बहुत महत्वपूर्ण है और चिंतन- मनन किये बिना किसी भी आदेश के महत्व और उसके कारण को नहीं समझा जा सकता। चिंतन -मनन के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम का एक कथन है कि एक घंटा चिंतन- मनन 60 साल की उपासना से बेहतर है।

जब कोई इंसान सोच- विचार के साथ किसी कार्य को अंजाम देता है तो उसमें वह मज़बूती होती है जो बिना सोच- समझ कर अंजाम दिये गये अमल में नहीं होती है। हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम फरमाते हैं" अधिक नमाज़ और रोज़ा उपासना नहीं है बल्कि ईश्वर के आदेश और उसकी रचना के बारे में चिंतन- मनन उपासना है।"

इंसान की बुद्धि इस बात का आदेश देती है कि जिस चीज़ के बारे में हमें ज्ञान नहीं है उसके बारे में उस व्यक्ति या विद्वान से पूछना चाहिये जिसको उसके बारे में जानकारी हो। पवित्र कुरआन के सूरे नहल में आया है कि अगर तुम नहीं जानते हो तो उन लोगों से पूछो जिसके पास ज्ञान है।

अगर इंसान पवित्र कुरआन का अध्ययन करे, पैग़म्बरों, ईश्वरीय दूतों और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों की जीवनी पढ़े तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि उन्होंने कभी भी किसी को धार्मिक या ग़ैर धार्मिक सवाल करने से मना नहीं है और उसका जवाब दिया है। यह इस बात का दूसरा जवाब है कि धार्मिक आदेशों के बारे में सवाल करना सही है।

रोचक बिन्दु यह है कि महान हस्तियों द्वारा धार्मिक प्रश्नों का जवाब इस बात का कारण बना कि जो उनके अनुयाई नहीं थे वे भी उनके अनुयाई बन गये और जो पहले से उनके अनुयाई थे उनकी आस्था पहले से अधिक मज़बूत हो गयी।

यहां एक बिन्दु बयान करना ज़रूरी है वह यह है कि इंसान का ज्ञान जितना भी अधिक हो परंतु पवित्र कुरआन के अनुसार इंसान का ज्ञान बहुत कम व सीमित है और वह महान ईश्वर के असीमित ज्ञान के समस्त आयामों को कदापि नहीं समझ सकता और इंसान को इस बात का पूरा विश्वास होना चाहिये कि धार्मिक आदेशों को महान ईश्वर ने अपने पैग़म्बरों और दूतों के माध्यम से इंसानों तक पहुंचाया है और इन आदेशों के अनुपालन में ही इंसानों की भलाई नीहित है। ऐसा नहीं है कि अगर धार्मिक आदेशों का इंसान पालन न करे तो महान ईश्वर को इससे कुछ नुकसान हो जायेगा। पूरी दुनिया मिलकर उसकी अवज्ञा करे या पूरी दुनिया का हर इंसान उसकी उपासना करे तो इससे महान ईश्वर को कोई लाभ या नुकसान नहीं होगा। धार्मिक आदेशों के अनुपालन में इंसान की ही भलाई है और न करने में इंसान का ही नुकसान है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम महान ईश्वर के आदेशों के समक्ष पूरी तरह नतमस्तक बंदे हैं वह महान ईश्वर को संबोधित करते हुए कहते हैं” मेरे गर्व के लिए यही काफी है कि मैं तेरा बंदा रहूं और मेरे लिए यही बड़ाई और प्रतिष्ठा काफी है कि तू मेरा पालनहार है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम यह बयान करने के लिए कि जो कुछ उन्होंने कहा है वह दिल की गहराइयों से है, कहते हैं" हे ईश्वर तू इस प्रकार है कि मैं तुझे दोस्त रखता हूं तो तू मुझे ऐसा बना जैसा तू चाहता है।

बहरहाल यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम महान ईश्वर के समस्त आदेशों की गहराईयों को समझें और लोगों के सवालों का जवाब दें। हां हमें एक चीज़ याद रखनी चाहिये वह यह कि हम उसके बंदे हैं, हमारी बुद्धि और ज्ञान सीमित है हम उसके समस्त आदेशों के नीहित समस्त आयामों को नहीं समझ सकते और हमें इस बात का पूरा विश्वास होना चाहिये कि महान ईश्वर का कोई भी आदेश अकारण नहीं है उसमें कोई न कोई रहस्य अवश्य नीहित है। अतः पूरी तनमयता के साथ हमें उसके समक्ष नतमस्तक होना चाहिये।

दोस्तो अब हम आपको यह बतायेंगे कि उपासना में निष्ठा ज़रूरी है, ज़रूरी नहीं बल्कि अनिवार्य है। निष्ठा उपासना की जान है। जिस तरह से अगर किसी इंसान के अंदर जान न हो तो उसे निर्जीव या मुर्दा कहा जाता है ठीक उसी तरह अगर कोई उपासना निष्ठा के बिना अंजाम दी जाये तो वह उपासना नहीं बल्कि उपासना का स्वरूप है और इस प्रकार की उपासना का वह लाभ नहीं है जो होना चाहिये। संक्षेप में यह कि हमारे हर कार्य में निष्ठा होनी चाहिये और हर कार्य को महान ईश्वर के लिए अंजाम देना चाहिये। इस संबंध में हज़रत इमाम जाफ़र सादिक अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” जो ईश्वर के लिए किसी को दोस्त रखे और ईश्वर के लिए क्रोधित हो और ईश्वर के लिए ज़रूरतमंदों को दान दे तो वह व्यक्ति उन लोगों की पंक्ति में शामिल है जिनका ईमान परिपूर्ण हो चुका है।"

उपासना में निष्ठा का एक विशेष महत्व व स्थान है। इस संबंध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं" पालनहार मैं तेरी उपासना नरक के भय से नहीं करता और न ही स्वर्ग की लालच में करता हूं बल्कि मैंने तुझे उपासना के योग्य पाया तो तेरी उपासना करता हूं।"

महान ईश्वर की उपासना के बारे में केवल वही लोग इस प्रकार की बात कर सकते हैं जो पहुंचे हुए रहस्यवादी हों या वे लोग जिन्होंने महान ईश्वर के प्रेम के अथाह सागर में स्वयं को विलिन कर दिया हो। यह वह स्थान है जिस पर बहुत कम ही लोग पहुंच पाते हैं। जो लोग महान ईश्वर की उपासना करते हैं उनमें से बहुत से लोग एक दूसरे से भिन्न कारणों व उद्देश्यों से उपासना करते हैं। इस संबंध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं" लोगों का एक गिरोह नरक के भय से ईश्वर की उपासना करता है यह दासों की उपासना है जबकि उपासना करने वालों का एक दूसरा गिरोह है जो स्वर्ग की लालच में उपासना करता है यह व्यापारियों की उपासना है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इसी प्रकार फरमाते हैं" ईश्वर की उपासना करने वालों का एक गिरोह ऐसा है जो ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी नेअमतों का शुक्र अदा करने के लिए उपासना करता है और यह आज़ाद इंसानों की उपासना है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम के इस मूल्यवान कथन की रोशनी में कह सकते हैं कि उपासना दो प्रकार की है एक उपासना का स्वरूप होता है और वह किसी न किसी उद्देश्य से की जाती है इस प्रकार की उपासना से वह चीज़ हासिल नहीं होती है जो उपासना का मुख्य उद्देश्य है और एक वास्तविक उपासना होती है और उसका मुख्य उद्देश्य महान ईश्वर का सामिप्त प्राप्त करना होता है। जो लोग इस प्रकार की उपासना करते हैं वे उपासना से अनगिनत लाभ उठाते हैं और उन्हें इस प्रकार की उपासना में वह आनंद आता है, वह मिठास प्राप्त होती है जो किसी भी दूसरी वस्तु में नहीं होती। महान ईश्वर के प्रेम के अथाह सागर में डूबकर की जाने वाली उपासना की मिठास वही समझ सकता है जो इस प्रकार की उपासना करता है। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम अपनी एक दुआ में कहते हैं कि हे पालनहार! अपनी उपासना की मिठास हमें चखा। इमाम के कथन से यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि उपासना में एक विशेष प्रकार की मिठास होती है जिसकी कामना इमाम कर रहे हैं। अगर महान ईश्वर की उपासना में मिठास न होती तो इमाम इस प्रकार की कामना कभी न करते। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कुछ रोज़ा रखने वाले और रातों को जाग कर उपासना करने वाले दो गुटों का चित्रण इस प्रकार करते हैं" कितने रोज़ा रखने वाले ऐसे हैं जिन्हें भूख-प्यास सहन करने के अलावा रोज़े का कोई लाभ नहीं मिलता। इसी प्रकार कितने ऐसे लोग हैं जो रातों को जागकर उपासना करते हैं किन्तु कष्ट उठाने के सिवा उन्हें कुछ नहीं मिलता। इसके बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम उस गुट के बारे में कहते हैं जो गूढ़ जानकारी और निष्ठा के साथ उपासना करता है"  कितना अच्छा है जागरुक व होशियारी लोगों का सोना और उनका इफ्तार करना।

लोगों के जिस गुट को कोई भी चीज़ महान ईश्वर की याद से निश्चेत नहीं कर सकती, पवित्र कुरआन उस गुट का चित्रण इस प्रकार करता है ऐसे लोग हैं जिन्हें कोई व्यापार, क्रय- विक्रय ईश्वर की याद करने और नमाज़ पढ़ने और ज़कात देने से निश्चेत नहीं करता, वे उस दिन से डरते हैं जिस दिन दिल और आंखें अभिभूत हो जायेंगी। इस गुट का सारा ध्यान महान ईश्वर होता है और वह ध्यान से अपने कार्यों को अंजाम देता है। इसी प्रकार पवित्र कुरआन उस गुट की ओर संकेत करता है जो इस्लाम के उदयकाल में मौजूद था और जब कोई व्यापार या खेल दिखाई देता था तो पैग़म्बरे इस्लाम को नमाज़ की हालत में छोड़ कर चला जाता था। इस प्रकार के गुट के बारे में महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे जुमा की 11वीं आयत में कहता हैः जब वे कोई व्यापार, क्रय- विक्रल या खेल देखते हैं तो उसकी तरफ आपको नमाज़ की हालत में छोड़कर चले जाते हैं हे पैग़म्बर आप उनसे कह दीजिये कि ईश्वर के पास जो कुछ है वह खेल और व्यापार से बेहतर है और ईश्वर बेहतरीन आजीविका प्रदान करने वाला है।"

बहरहाल महान ईश्वर ने इस प्रकार की घटनाओं और कहानियों को हमें सीख लेने के लिए बयान किया है ताकि हम उससे पाठ लेकर वर्तमान और भावी पीढ़ी के लिए आदर्श बन सकें।

 


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