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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 5

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 5

जी हां दोस्तो पवित्र रमज़ान का महीना, मोमिन बंदों के धैर्य और उनकी सफलता की शुभसूचना देने का महीना है।

रमज़ान, ईश्वरीय दया और कृपा के महासागर में ग़ोता लगाने का महीना है। रमज़ान का महीना, पवित्र क़ुरआन की बसंत और ईश्वर की असीम कृपा का महीना है, इस महीने में रोज़ा रखने वाले बंदों और ईश्वर से मुलाक़ात की इच्छा रखने वाले बंदों को शुभ सूचना दी जाती है। इस महीने में मुसलमानों के इरादे मज़बूत होते हैं और वे आंतरिक ज़ंजीरों से स्वतंत्र हो जाते हैं।

वास्तव में रोज़ेदार व्यक्ति न केवल खाने पीने की वस्तुओं से परहेज़ करता है बल्कि वह अपनी आंतरिक इच्छाओं से भी युद्ध करता है और अपनी आंतरिक इच्छाओं के मुक़ाबले में प्रतिरोध करता है। इस कार्यक्रम में हम ईश्वर की ओर से रोज़ेदारों को दी गयी एक अन्य शुभसूचना के बारे में बताते हैं, हमारे साथ रहिए।

इंसान को जो चीज़ पंसद होती है और जो चीज़ नापसंद होती है इस्लामी नैतिकता उसका बहुत ही सुन्दर ढंग से चित्रण करती है और इस्लाम धर्म अपने अनुयायियों को इस प्रकार के मूल्यवान गुणों से सुसज्जित होने का अह्वान करता है।  ईश्वर पवित्र क़ुरआन के सूरए हज की आयत संख्या 34 और 35 में इस बारे में फ़रमाता हैः तो जान लो कि तुम्हारा पूज्य अनन्य ईश्वर ही है अतः उसी का अनुपालन करो और (हे पैग़म्बर!) विनम्रता अपनाने वालों को शुभ सूचना दे दीजिए, ये वे लोग हैं जब ईश्वर को याद किया जाता है तो उनके दिल कांप जाते हैं और जो मुसीबत उन पर आती है उस पर धैर्य से काम लेते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से दान करते हैं।

यह आयतें ईश्वरीय आदेशों के समक्ष निष्ठा के साथ नतमस्तक रहने पर बल देती हैं और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से कहती हैं कि वह ईश्वर के लिए निष्ठा के साथ कर्म करने वालों को शुभ सूचना दे दें। सूरए हज की 35वीं आयत कहती है कि वे सदैव धार्मिक दायित्वों के पालन में कमी की ओर से चिंतित एवं भयभीत रहते हैं और ईश्वर के नाम की महानता और उसके आदेश उनके अस्तित्व पर इस प्रकार छा जाते हैं कि उनके दिल दहल जाते हैं और वे कांपने लगते हैं।

इस्लाम धर्म में विनम्रता और इसको अपनाने वालों को बहुत अधिक महत्व दिया गया है। सवाल यह पैदा होता है कि विनम्र लोग कौन हैं और उनकी क्या विशेषताएं हैं? ईश्वर विनम्र लोगों को शुभ सूचना देने के बाद विनम्र लोगों के चार गुण बयान करता है। इन विशेषताओं के अध्यात्मिक और मानसिक, दो आयाम हैं जबकि दो शारीरिक आयाम भी होते हैं।

 

आयत सबसे पहले यह कहती है कि वे सदैव धार्मिक दायित्वों के पालन में कमी की ओर से चिंतित एवं भयभीत रहते हैं और ईश्वर के नाम की महानता और उसके आदेश उनके अस्तित्व पर इस प्रकार छा जाते हैं कि उनके दिल दहल जाते हैं और वे कांपने लगते हैं, इसलिए नहीं कि ईश्वर के क्रोध से डरते हों, न इसलिए कि उसकी कृपा और दया में संदेह करते हैं, बल्कि यह भय ईश्वर के महान स्थान का ज्ञान प्राप्त होने की वजह से है कि इंसान ईश्वर की वैभवता के समक्ष, भयभीत हो जाता है और उन ज़िम्मेदारियों की वजह से जो उसके कंधों पर हैं और शायद उसको अंजाम देने में लापरवाही बरती हो, इसीलिए भयभीत होता है।

पवित्र क़ुरआन के प्रसिद्ध व्याख्याकार अल्लाह तबातबाई ईमान वालों के इस गुण के बारे में लिखते हैं कि ईमान का प्रकाश धीरे- धीरे इंसान के दिलों में दमकता है, यह ईमान का प्रकाश धीरे- धीरे ज़्यादा और मज़बूत होता है और दिन- प्रति परिपूर्ण होता जाता है और ईमान के उस चरण पर पहुंच जाते हैं जब उनके सामने अल्लाह का नाम लिया जाता है तो उनके दिल पर भय के साथ एक विशेष प्रकार की स्थिति पैदा हो जाती है।

इस्लामी नैतिकता में विनम्रता का एक विशेष स्थान है। विनम्रता अल्लाह के निकट एक प्रिय विशेषता है और हर व्यक्ति इस पवित्र महीने में इस विशेषता और गुण को अपने भीतर मज़बूत कर सकता है। विनम्रता दिलों को नर्म और इंसान को दूसरों से निकट करती है और प्रेम, स्नेह, दोस्ती और मुहब्बत का रहस्य है। विनम्रता वह बगीचा है जहां भाईचार, प्रेम, स्नेह और मुहब्बत के सुन्दर और सुगंधित फूल खिलते हैं। यही वह चीज़ है जो इंसान को उसका सही स्थान दिखाती है। 

विनम्रता, एक आंतरिक प्रक्रिया है जो इंसान के चाल चलन से स्पष्ट होती है। एक विनम्र इंसान दूसरों के सामने मुस्कुराता हुआ नज़र आता है और जब वह उनके साथ उठता- बैठता है तो उसके चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट रहती है। इंसान में जब यह विशेषता पायी जाती है तो उस पर ईश्वर की दया होती है। विनम्र व्यक्ति ईश्वर के समक्ष नतमस्तक रहता है और बहुत ही प्रेम और ईमान के साथ उसकी उपासना करता है, इसीलिए कहा जाता है कि यह वह मज़बूत क़िला है जिसमें दुश्मन की घुस पैठ नहीं हो सकती और यह वह गौरवपूर्ण ताज है जो अल्लाह के ख़ास बंदों के सिर की शोभा बढ़ाता है।

विनम्र लोगों की एक अन्य निशानी यह है कि वह कटु घटनाओं के समय धैर्य करते हैं और संयम से काम लेते हैं। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि घटना चाहे जितनी भी बड़ी हो, वे धैर्य और संयम से काम लेते हैं और उसके सामने घुटने नहीं टेकते, संयम का दामन हाथ से निकलने नहीं देते, मैदान छोड़कर नहीं भागते, मुंह पर कभी बुरी बातें या अनेकेश्वरवाद की बातें नहीं लाते, क्योंकि उनको पता है कि ईश्वर सबसे अधिक दयावान और कृपालु है। उनको यह पता है कि जो कुछ उनके जीवन में घटा है वह पाठ है जो उन्हें जीवन में ज़्यादा तैयार और ईश्वर के मार्ग में अधिक मज़बूती के साथ आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करता है।

 

ईश्वर विनम्र लोगों की दो अन्य विशेष बयान करता है कि वे नमाज़ पढ़ते हैं और ईश्वर के मार्ग में दूसरों पर पैसे ख़र्च करते हैं। नमाज़ क़ायम करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से दान करते हैं। एक ओर नमाज़ को उसी तरह पढ़ते हैं जिस तरह अल्लाह ने उन्हें आदेश दिया है, नमाज़ को उसके समय पर और सही ढंग से पढ़ते हैं और संसार के पैदा करने वाले ईश्वर से उनके संबंध मज़बूत होते हैं। 

दूसरी ओर ईश्वर के साथ उनके संबंध मज़बूत होते हैं और कभी भी वे अपनी धन संपत्ति की कमी पर भयभीत नहीं होते और ईश्वर की मर्ज़ी हासिल करने के लिए अपने पैसे ख़र्च करते हैं और ज़रूरतमंदों में अपना माल बांट देते हैं। इस ब्योरे से अच्छी तरह पता चल गया कि विनम्रता, ईश्वर के ख़ास बंदों की निशानी है, इसके केवल आंतरिक और भीतरी आयाम नहीं हैं बल्कि इसके प्रभाव उसके कर्म में भी दिखाई देते हैं।

वास्तव में विनम्र वे लोग होते हैं जो हमेशा ईश्वर की उपासना में व्यस्त होते हैं और एक क्षण के लिए भी उसकी उपासना से निश्चेत नहीं रहते। हज़रत अली अलैहिस्सलाम विनम्र लोगों की विशेषता बयान करते हुए कहते हैं कि धर्मपरायणता में मज़बूत, नर्म दिल और तत्वदर्शी होते हैं, उनके ईमान विश्वास से भर हुए होते हैं, ज्ञान की प्राप्ति के लिए वे उत्सुक होते हैं, ज्ञान से संपन्न होने के बावजूद विनम्र, संतुलित और मध्यमार्गी, उपासन में विनम्र, परेशानियों में ख़ुश, कठिनाइयों में संयमी, हलाल आजीविका प्राप्त करने में प्रयासरत, ईश्वर के मार्ग पर ख़ुश और लाचल से बचने वाले होते हैं।

ईश्वरीय दूत हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम विनम्र लोगों की जीती जागती निशानी हैं। वे ईश्वरीय आदेश के समक्ष नतमस्तक हो गये, हज़रत इब्राहीम और उनके पुत्र हज़रत इस्माईल ने जब काबे का निर्माण किया तो उन्होंने ईश्वर से दुआ कि वे उसके आदेशों के समक्ष हमेशा नतमस्तक रहें और उनकी पीढ़ी मुसलमानों में हो। जब ईश्वर ने उनसे कहा कि नतमस्तक हो जाओ तो उन्होंने कहा कि मैं नतमस्तक हो गया। वह और उनके बेटे इस्माईल दोनों ही ईश्वर के आदेश के समक्ष नतमस्तक हो गये।

एक बार उन्होंने सपने में दिखा कि वे अपने बेटे को ईश्वर के मार्ग में क़ुरबान कर रहे हैं, उन्होंने अपना सपना अपने बेटे हज़रत इस्माईल को बताया, हज़रत इस्माईल ने कहा कि हे पिता जी आपको जो आदेश मिला है उस पर अमल करें, हज़रत इस्माईल को भी पता था कि ईश्वरीय दूत का सपना, आदेश होता है, सपना नहीं, अर्थात उन्हें ईश्वर की ओर से अपने बेटे की क़ुर्बानी का आदेश दिया गया है। हज़रत इब्राहीम इस परीक्षा में भी सफल हुए और उन्होंने ईश्वरीय आदेश पर अमल करते हुए अपने बेटे के गले पर चाक़ू चला दिया लेकिन ईश्वर का कुछ और ही इरादा था। जी हां दोस्त यही कहा जाता है कि ईश्वर के आदेश के समक्ष नतमस्तक होना सबसे बड़ा स्थान है जो उसके नेक बंदे ही हासिल कर पाते हैं।

 


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