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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 3

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 3

जी हां दोस्तो इस्लामी धर्मों विशेषकर इस्लाम धर्म में त्याग और बलिदान को बहुत अधिक महत्व प्राप्त है।

मूल रूप से बलिदान और दूसरों को माफ़ कर देने का अर्थ ईश्वरीय शब्दकोष में अलग और उसकी विशेष व्याख्या है। शहादत, त्याग और बलिदान का चरम है और जो भी इसकी ओर जाता है वह अनदेखी संसार और परलोक पर विश्वास रखता है।

पवित्र क़ुरआन की अनेक आयतों में उन लोगों को बहुत अधिक उल्लेख है जो अपनी जान व माल से जेहाद करते हैं। इस प्रकार के लोग ईश्वर से मामला करते हैं, इसीलिए बड़ा पारितोषिक मिलता है, हमेशा स्वर्ग में रहते हैं और ईश्वर हमेशा से उनसे प्रसन्न रहता है।

ईश्वर सूरए तौबा की आयत संख्या 111 में इस प्रकार के लोगों को शुभ सूचना देते हुए कहता है कि निसंदेह अल्लाह ने ईमान वालों से उनके जान व माल को स्वर्ग के बदले ख़रीद लिया है कि यह लोग ईश्वर के मार्ग में जेहाद और संघर्ष करते हैं और दुश्मनों को क़त्ल करते हैं और फिर ख़ुद भी क़त्ल हो जाते हैं, यह सच्चा वादा तौरैत, इंजील और पवित्र क़ुरआन हर जगह उल्लेख हुआ है और ईश्वर से ज़्यादा अपने वचनों को पूरा करने वाला कौन होगा तो अब तुम लोग अपने इस व्यापार पर ख़ुशियां मनाओ जो तुमने ईश्वर से किया है कि यही सबसे बड़ी सफलता है।

 

पवित्र क़ुरआन की आयतें, बहुत ही सुन्दर ढंग से पैग़म्बरे इसलाम को शुभ सूचना देती है। यही शुभ सूचना धीरे धीरे मुसलमानों तक पहुंची और उनकी सफलता और कामियाबी का रास्ता प्रशस्त किया। जिस आयत का अनुवाद आपने सुना है उसमें ईश्वर के मार्ग में संघर्ष करने वालों को शुभ सुचना दी गयी है।

इस्लाम धर्म के उदय काल में ईश्वर के मार्ग में संघर्ष, उच्च मानवीय चरण तक पहुंचने और उच्च स्थान को हासिल करने के लिए एक पुल है। शहादत, प्रतिष्ठा और इज़्ज़त की मौत का नाम है जिसका ईमान वाले इंन्सानों की ओर से भरपूर स्वागत किया जाता है। इसीलिए शहादत को मनुष्य के जीवन का सबसे बेहतरीन पल क़रार दिया जा सकता है। यह उस प्रकाश की भांति जो अंधकार में डूब समाज को नया जीवन और प्रकाशमान करता है, मुर्दा दिलों को ताज़गी प्रदान करता है। यहां तक कहा जाता है कि शहीद, मानवता के मार्गदर्शन की मशाल है।

शहीद का महत्व इतना अधिक है कि वह समस्त सीमाओं को तोड़ते हुए न्याय और सत्य की स्थापना के लिए अन्याय और अत्याचार से संघर्ष करते हैं,यही कारण है कि शहीदों को मानवाधिकारों का रक्षक और हीरो कहा जाता है। शहीद उच्च उमंगों और विचारों से संपन्न होत हैं और उनका अमल केवल अल्लाह ही के लिए होता है। ईश्वर के मार्ग पर संघर्ष करने वाले का ईश्वर के निकट बहुत ऊंचा स्थान होता है और यही वजह है कि मुसलमानों पर उनका सम्मान अनिवार्य किया गया है। यह सम्मान जेहाद के महत्व की वजह से है जिससे इस्लाम का शिखर कहा जाता है और मुजाहेदीन को ईश्वर का निकट साथी कहा जाता है।  हज़रत अली अलैहिस्सलाम मुजाहिदों की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि जेहाद, स्वर्ग के दरवाज़ों में से एक है जो अल्लाह अपने विशेष बंदों के लिए खोलता है।

 

ईश्वर इन आयतों में उन लोगों को अपने माल और जान से अल्लाह के मार्ग में संघर्ष करते हैं निश्चित स्वर्ग का वादा करता है और कहता है कि निसंदेह अल्लाह ने ईमान वालों से उनके जान व माल को स्वर्ग के बदले ख़रीद लिया है कि यह लोग ईश्वर के मार्ग में जेहाद और संघर्ष करते हैं और दुश्मनों को क़त्ल करते हैं और फिर ख़ुद भी क़त्ल हो जाते हैं, यह सच्चा वादा तौरैत, इंजील और पवित्र क़ुरआन हर जगह उल्लेख हुआ है और ईश्वर से ज़्यादा अपने वचनों को पूरा करने वाला कौन होगा।

ईश्वर ने इस वचन का चित्रण पेश कर दिया और इसे ख़रीदने और बचने के समान क़रार दिया, अर्थात ख़ुद को ख़रीददार और मोमिनों को विक्रेता क़रार दिया और इन लोगों की जान व माल को ख़रीदी और बेची जाने वाली वस्तु क़रार दिया और स्वर्ग को उसकी क़ीमत और मूल्य क़रार दिया है और तौरैत, इन्जील और क़ुरआन को इसका प्रमाण क़रार दिया है। अंत में ईश्वर इस सुन्दर की मिसाल द्वारा मोमीनों को इस मामले की शुभसूचना देता है और उनको बड़ी सफलता की बधाई देता है।

इस्लाम धर्म का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु जेहाद और संघर्ष की संस्कृति है। जेहाद का भी केवल अर्थ रणक्षेत्र में उपस्थित होना नहीं है बल्कि दुश्मनों के मुक़ाबले में हर प्रकार का प्रयास, जेहाद और संघर्ष कहलाता है। वास्तव में ईश्वर उन जानों, प्रयासों, कोशिशों और संघर्षों का ख़रीदने वाला है जो उसके मार्ग में अंजाम दिए जाते हैं। यह वही कोशिश और प्रयास है जो सत्य, आज़ादी और न्याय को लागू करने तथा अत्याचारियों, काफ़िरों और भ्रष्टाचारियों के चंगुल से मुसलमानों को आज़ाद कराने के लिए होती है।

 

यहां पर ईश्वर इस मामले को महत्व को दिखाने के लिए कहता है कि ईश्वर से ज़्यादा सच्चा और कौन हो सकता है। अर्थात इस मामले का पारितोषिक यद्यपि तुरंत नहीं दिया जाता किन्तु ईश्वर अपनी शक्तिऔर क्षमता के अनुसार, किसी से भी अपने वचनों और वादों में अधिक सच्चा और निष्ठावान है।

रोचक बात यह है कि इस ख़रीददारी और यह मामला हो जाने के बाद, जैसा कि व्यापारियों के बीच प्रचलित है कि वह सौदा होने के बाद सामने वाले पक्ष को बधाई देता है, उसके लिए अधिक से अधिक लाभ दायक मामले की कामना और इच्छा करता है, मैं आपको इस लाभदायक और अच्छे मामले पर बधाई देता हूं। यह तुम सब के लिए एक बड़ी जीत और कामयाबी है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई इस शुभसूचना देने वाली आयत के बारे में कहते हैं कि शहादत एक अजीबो ग़रीब अर्थ का स्वामी शब्द है। शहादत अर्थात ईश्वर के साथ व्यापार, बिना चिंता के ईश्वर के साथ एक द्विपक्षीय मामला, वस्तु भी मालूम है, वस्तु की क़ीमत भी पता है, वस्तु जान है, जान अर्थात इस भौतिकवादी दुनिया में हर इंसान की मुख्य पूंजी, इस वस्तु को आपके हवाले कर रहा है और इसके बदले में क्या ले रहा है? इसके बदले में हमेशा का कल्याण, अमर जीवन और ईश्वरीय अनुकंपाओं और विभातियों को हासिल करता है।

ईश्वर के मार्ग में संघर्ष के बदले जो कुछ मिलता है, इसके बदले में ईश्वर जो कुछ देता है, या ईश्वर के मार्ग में जान व माल के बदले जो कुछ उसे हासिल होता है वह स्वर्ग है और ईश्वरीय प्रसन्नता है। यह सच्चा वादा है जो ईश्वर ने तुमसे किया है, यह तुम्हारे धर्म से विशेष नहीं है, इस रास्ते को ईश्वर पहले ही अपनी पूर्ववर्ती किताबों में बयान कर चुका है। इन लोगों की जान व माल को ख़रीदी और बेची जाने वाली वस्तु क़रार दिया और स्वर्ग को उसकी क़ीमत और मूल्य क़रार दिया है और तौरैत, इन्जील और क़ुरआन को इसका प्रमाण क़रार दिया है।

शहादत यह है कि उसका विदित जो दिखाई देता है, बहुत ही दर्दनाक और कटु है लेकिन उसके भीतर क्या है? आंतरिक रूप से एक ख़राब और बर्बाद होने वाली वस्तु को अच्छी और बेहतरीन क़ीमत पर बेच देना, जो लोग शहीद होते हैं तो ईश्वर उन पर अपनी अधिक कृपा दृष्टि करता है।

 

इतिहास गवाह है कि इन्सान चाहे या न चाहे उसे बहुत ही विध्वंसक जंगों का सामना रहा है। जब भी इन्सान उग्र होता है और सत्ता की वजह से उसके हाथ मज़बूत हो जाते हैं, तो वह दूसरे और कमज़ोर राष्ट्रो को अपने अकारण हमलों का निशाना बनाते हैं और अत्याचार और अन्याय से दुनिया को उजाड़ देता है।

कुछ लोगों के मन में यह सवाल पैदा हो सकता है कि इस्लाम धर्म जिसके नियम कृपा और दया पर आधारित हैं क्यों हमको जेहाद और संघर्ष की ओर ले जाता है कऔर इस्लाम को विरोधियों का दमन करने की बात करता है। वास्तव में इस्लाम मुसलमानों से यह चाहता है कि हमेशा से युद्ध के लिए तैयार रहें, हमेशा दुश्मनों से टक्कर लेने को तैयार रहें, दुश्मनों पर हमले करने में पहल न करें और यदि दुश्मनों ने हमला कर दिया तो उन्हें सैन्य और क्षमता की दृष्टि से तैयारी के चरम पर होना चाहिए, उसको युद्ध ख़त्म करने पर मजबूर कर दे और शांति का ध्वज लहराए।

यह एसी हालत में है कि मुसलमान भी युद्ध से हाथ रोक लेगा और युद्ध को जारी नहीं रखेगा। वास्तव में इस्लाम धर्म की नज़र में युद्ध और सुलह के बारे में कुछ ख़ास नज़रिया है और यह उसका राष्ट्रों की स्वाधीनता और हमलावरों के अपराधों को रोकने पर आधारित है। इसी के साथ अगर युद्ध हो जाए तो इस्लाम सलाह देता है कि युद्ध विराम के लिए अवसरों से भरपूर लाभ उठाएं। इस्लाम ने कभी भी मुसलमानों को सीमा विस्तार या दूसरों पर वर्चस्व जमाने के लिए युद्ध शुरु न करे, इस्लामी इतिहास में आया है कि इस्लाम ने कभी भी युद्ध शुरु नहीं किया बल्कि दुश्मनों ने युद्ध शुरु किया और  उसने अपने बचाव के लिए युद्ध किया।


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