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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 2

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 2

पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि पवित्र कुरआन समस्त मानवता के मार्गदर्शन की किताब है और ईश्वरीय दूतों ने इंसानों के मार्गदर्शन के लिए शुभसूचना देने और डराने दोनों शैलियों का प्रयोग किया है यानी अगर इंसान अच्छा काम करेंगे तो महान ईश्वर उन्हें स्वर्ग प्रदान करेगा जहां वे हमेशा -हमेशा रहेंगे और उसमें उनको कभी भी मौत नहीं आयेगी।

इस बात की शुभसूचना महान ईश्वर के दूतों ने इंसानों को दी है। इसी प्रकार इन दूतों ने बुरा कार्य करने वाले इंसानों को ईश्वरीय प्रकोप से डराया है और कहा है कि जो लोग बुरा कार्य करेंगे महान ईश्वर उन्हें नरक में डालेगा जहां वे हमेशा- हमेशा रहेंगे। सारांश यह कि जो इंसान लोक- परलोक का कल्याण चाहता है उसे धार्मिक मूल्यों के प्रति कटिबद्ध रहना चाहिये। क्योंकि सिद्धांतिक रूप से पवित्र कुरआन के नाज़िल करने का एक उद्देश्य इंसानों को अज्ञानता, अनेकेश्वरवाद, कुफ्र और समस्त उन कार्यों से मुक्ति दिलानी है जो धर्म विरोधी हैं और वे कार्य इंसान और समाज के पतन का कारण बनते हैं। ईश्वर ने अपने दूतों को भेजा ताकि वे इंसानों का मार्गदर्शन ज्ञान के प्रकाश, एकेश्वरवाद और उन समस्त मूल्यों की ओर करें जो लोक- परलोक में उनकी मुक्ति का कारण बनें। पवित्र कुरआन में महान ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहता हैः यह कितान मैंने आप पर उतारी है ताकि ईश्वर के आदेश से समस्त इंसानों को अंधेरे से निकालें और प्रकाश की ओर उनका मार्गदर्शन करें”

पवित्र कुरआन के अनुसार इंसान ऐसा प्राणी है जो परिपूर्णता के चरणों को तय करके शिखर पर पहुंच और पूरी दुनिया को अपने नियंत्रण में कर सकता है। इसी तरह इंसान अनैतिक व ग़लत कार्यों को अंजाम देकर पतन की खाई में भी जा सकता है। यह इंसान है जिसे अपना भविष्य निर्धारित करना चाहिये। पवित्र कुरआन ने इंसान को ज़मीन पर महान ईश्वर का प्रतिनिधि बताया है। महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे अनआम की 165वीं आयत में कहता हैः वह वही है जिसने तुम्हें ज़मीन पर अपना प्रतिनिधि बनाया और कुछ को कुछ पर श्रेष्ठता प्रदान की ताकि जो चीज़ें तुम्हें दे रखा है उसके माध्यम से वह तुम्हारी परीक्षा ले।“ इस आधार पर महान ईश्वर ने इंसान को अपनी बहुत सी रचनाओं पर श्रेष्ठता प्रदान की है और उसे एक प्रतिष्ठित प्राणी बनाया है। महत्वपूर्ण यह है कि महान ईश्वर ने इंसान को जो प्रतिष्ठा प्रदान की है उसे वह समझे और अपने कार्यों से ज़मीन को आबाद करे और स्वयं अपने अधिकार से मुक्ति व कल्याण का मार्ग चयन करे और उसकी दिशा में क़दम बढ़ाये।

पवित्र कुरआन के सूरे ज़ोमर की 17वीं- 18वीं आयतों में महान ईश्वर उन इंसानों को शुभसूचना देता है जो स्वतंत्र चिंतन- मनन से ईमान का रास्ता चुनते हैं। महान ईश्वर इन आयतों में कहता है” हे पैग़म्बर हमारे उन बंदों को शुभसूचना दे दीजिये जो बातों को सुनते हैं और उनमें से अच्छी बातों का अनुसरण करते हैं, ये वे लोग हैं जिनका ईश्वर ने मार्गदर्शन किया है और वे बुद्धिमान लोग हैं।“

महान ईश्वर पवित्र कुरआन की इन आयतों में सबसे पहले शुभ सूचना देता है और उन लोगों का परिचय मोमिन के रूप में कराता है जो किसी प्रकार के भेदभाव या पक्षपात के बिना बात सुनते हैं और अपनी बुद्धि से सोचते हैं कि कौन सी बात सही व अच्छी है उसके बाद उसका अनुसरण करते हैं। इस आयत में एक रोचक बिन्दु यह है कि जो लोग बात सुनते हैं और उनमें से जो सही व अच्छी होती है उसका अनुसरण करते हैं यानी पहले उसे स्वीकार करते हैं फिर उसका अनुसरण करते हैं। यानी वे अपनी ही बात के सही होने की रट नहीं लगाते हैं बल्कि जिसकी भी बात सही होती है उसे वे खुले मन से स्वीकार और उसका अनुसरण करते हैं। महान ईश्वर इस प्रकार के लोगों को बुद्धिमान कहता है और वास्तव में वे बुद्धिमान हैं और वे सत्य के जिज्ञासु होते हैं जहां भी उन्हें सत्य प्राप्त होता है उसे अपने पूरे अस्तित्व के साथ स्वीकार करते हैं। पवित्र कुरआन की इन आयतों में कुछ बिन्दुओं का उल्लेख किया गया है जिन पर ध्यान देना ज़रूरी है। पहला बिन्दु बातों को सुनना और उनमें जो सबसे अच्छी हो उसे स्वीकार करना ज़रूरी है। दूसरा बिन्दु यह है कि जो बातें अच्छी व सही नहीं हैं उन्हें सुनना उचित व शोभित कार्य नहीं है। तीसरा बिन्दु यह है कि इंसान के अंदर सही व ग़लत में विश्लेषण करने की क्षमता मौजूद है क्योंकि अगर उसके अंदर विश्लेषण की क्षमता मौजूद न होती तो वह विभिन्न बातों व आस्थाओं को सुनने के बाद किस प्रकार सही बात को समझ पाता और उनमें जो सबसे अच्छी होती उसका चयन व अनुसरण करता। पवित्र कुरआन की इन आयतों में एक महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि बुद्धिमान लोग अंधा अनुसरण नहीं करते हैं और जो सबसे अच्छी बात होती है वे उसी का अनुसरण करते हैं। इस आधार पर पवित्र कुरआन उन लोगों की निंदा करता है जो सच बात को सुनते हैं और जानते हैं कि सच क्या है उसके बावजूद असत्य का अनुपालन करते हैं। यही नहीं इस प्रकार के लोग खुद तो असत्य का अनुसरण करते हैं और दूसरों को भी उसी के अनुसरण के लिए प्रोत्साहित करते हैं। पवित्र कुरआन की सूरे नूह की आठवीं आयत में हम पढ़ते हैं जिसमें हज़रत नूह अलैहिस्सलाम महान ईश्वर से शिकायत करते हुए कहते हैं” पालनहार मैंने जब भी उन लोगों को आमंत्रित किया और प्रार्थना की कि तू उन लोगों को क्षमा कर दे तो उन लोगों ने अपनी उंगलियों को अपने कानों में डाल ली और अपने वस्त्रों को लपेट दिया, वे अपनी गुमराही पर आग्रह कर रहे हैं और वे बड़े अहंकारी हैं।“

 यहां एक रोचक बात यह है कि जो इंसान अहंकारी होता है उसका अहंकार सच को स्वीकार करने की दिशा में बहुत बड़ी बाधा होता है। पैग़म्बरे इस्लाम के काल में भी कुछ लोग पैग़म्बरे इस्लाम की आवाज़ और पवित्र कुरआन की आयतों की आवाज़ से बचने के लिए अपने कानों में उंगलियां डाल  लेते थे ताकि सत्य बात उनके कानों में न पहुंच सके किन्तु चूंकि पैग़म्बरे इस्लाम काफिरों, अनेकेश्वरवादियों और पथभ्रष्ट लोगों के लिए मार्गदर्शन के लिए बहुत चिंतित व व्याकुल रहते थे इसलिए उन्होंने लोगों के मार्गदर्शन के लिए बहुत प्रयास किया और इस दिशा में उन्होंने बहुत कठिनाइयां सहन कीं। सूरे ज़ोमर की 19वीं आयत में महान ईश्वर इस वास्तविकता को बयान करता है कि यह दुनिया आज़ादी और परीक्षा की जगह है। हर इंसान अच्छे या बुरे रास्ते के चयन में पूर्ण स्वतंत्र है। महान ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम को दिलासा देते हुए कहता है कि क्या आप उस व्यक्ति को बचा सकते हैं जिसके भाग्य में ईश्वर का प्रकोप लिख दिया गया है, क्या जो इंसान नरक की आग में है उसे आप पकड़ कर बाहर ला सकते हैं?

कुछ धर्मों के मानने वाले अपने धर्म के अनुयाइयों को दूसरे धर्मों की बातों को सुनने और किताबों के अध्ययन से मना करते हैं क्योंकि उन्हें अपने धर्म की कमज़ोरियों से भय होता है कि अगर यह इंसान सच्चाई से अवगत हो गया तो हमारे धर्म का अनुपालन छोड़ देगा और हमारे धर्म से दूसरे धर्म के मानने वाले की संख्या अधिक हो जायेगी और उसका धर्म हमारे धर्म पर हावी हो जायेगा परंतु पवित्र कुरआन ने इस संबंध में सबके समक्ष द्वार खोल रखा है और कहा है कि जो लोग अच्छी बातों को सुनते हैं और उनमें जो सबसे अच्छी बात होती है उसका अनुसरण करेंगे। इस प्रकार के द्वार का खोल देना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि ईश्वरीय शिक्षाओं में किसी प्रकार का कोई खोट नहीं है और किसी भी धर्म की शिक्षा ईश्वरीय धर्म इस्लाम की शिक्षाओं से बेहतर नहीं है। यही नहीं जो लोग बातों को सुनने हैं और अच्छी बातों का चयन करते हैं उन्हें महान ईश्वर बुद्धिमान कहता है।

वास्तव में जिस इंसान की बात में किसी प्रकार का खोट नहीं होता है उसे इस बात की चिंता ही नहीं होती है कि उसकी बात की वास्तविकता सामने आ जायेगी क्योंकि उसकी बात में किसी प्रकार का खोट ही नहीं होता है। ठीक उसी तरह जिस धर्म में किसी प्रकार की अतार्किक बात ही नहीं है वह धर्म दूसरों की बातों और उनके द्वारा किये जा रहे प्रश्नों से भयभीत नहीं होगा बल्कि वे इंसान या उस धर्म के मानने वाले डरेंगे जिनकी बातें अतार्किक होंगी और उनकी बातों में कमज़ोरियां होंगी। जो लोग दूसरों की बातों को आंख बंद करके स्वीकार कर लेते हैं पवित्र कुरआन की वह आयत एसे लोगों को बुद्धिमान लोगों की पंक्ति से निकाल देती है जिसमें महान ईश्वर कहता है कि हे पैग़म्बर उन बंदों को शुभसूचना दे दीजिये जो बातों को सुनते हैं और उनमें जो सबसे अच्छी होती है उसका अनुसरण करते हैं। यानी वह बातों को परखते हैं जो सही होती है उसका अनुपालन करते हैं और आंख बंद करके दूसरे की बातों को स्वीकार नहीं करते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति की एक निशानी यह है कि जब उसके समक्ष सत्य स्पष्ट हो जाता है तो वह उसके समक्ष नतमस्तक हो जाता है और उसे स्वीकार करता है और यह स्वयं बुद्धि का चिन्ह है। पवित्र कुरआन के शब्दों में ये वे लोग हैं जिनका मार्गदर्शन ईश्वर ने किया है और वे बुद्धिमान लोग हैं।

अच्छी और बुरी चीज़ का पता लगाने के लिए बुद्धि इंसान की बेहतरीन पूंजी है। जो इंसान बुद्धि से काम लेता है और अपने कार्यों का आधार बुद्धि को करार देता है वह अतार्तिक बातों पर किसी प्रकार का आग्रह किये बिना तार्किक बातों को स्वीकार करता है। जो लोग सत्य की जिज्ञासा में रहते हैं जहां भी उन्हें सत्य मिलता है उसे स्वीकार करते हैं। जी हां यह एक सच्चे व अच्छे इंसान का चिन्ह है। ईश्वर के बंदे बातों को सुनते हैं और उनमें जो सबसे अच्छी होती है उसे स्वीकार करते और उसका अनुसरण करते हैं। दूसरे शब्दों में महान ईश्वर और उसके पैग़म्बर के निमंत्रण से श्रेष्ठ कोई बात नहीं है और अच्छा इंसान इस निमंत्रण को स्वीकार करता और इस निमंत्रण की बातों पर अमल करता है। दोस्तो आज के कार्यक्रम का समय यहीं पर समाप्त होता है।


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